क्या है मोदी की 'दूसरी नोटबंदी' की ख़बरों का सच?

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर ये चर्चा शुरू हुई है कि मोदी सरकार नया क़ानून लाने जा रही है. कुछ लोग इसे 'दूसरी नोटबंदी' तक क़रार दे रहे हैं.

इन ख़बरों का आधार वो मीडिया रिपोर्ट्स हैं, जिनमें फ़ाइनेंशियल रेज़ोल्यूशन एंड डिपॉज़िट इंश्योरेंस बिल FRDI) को लेकर कई तरह के शक़ ज़ाहिर किए जा रहे हैं.

कहा ये भी जा रहा है कि इस बिल के पास होने के बाद बैंकों के डूबने की स्थिति में जमाकर्ताओं की बैंक में जमा रकम को लेकर जो पुराना नियम है, उसे बदला जा सकता है.

मौजूदा नियम के मुताबिक, अगर कोई सरकारी बैंक दिवालिया होता है, तो किसी भी खाताधारक को सरकार कम से कम एक लाख रुपये लौटाने के लिए प्रतिबद्ध है. यानी अगर किसी व्यक्ति का बैंक में दो लाख रुपये जमा है तो बैंक के दिवालिया होने की सूरत में उसे कम से कम एक लाख रुपये तो मिलने की गारंटी है.

ये बिल मॉनसून सत्र में पेश किया गया था, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों को लेकर विशेषज्ञों से लेकर सांसदों तक की राय इसके हक़ में नहीं थी, लिहाजा सरकार को एफ़आरडीआई बिल का मसौदा पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजना पड़ा.

अब कहा जा रहा है कि शीतकालीन सत्र में ये कमेटी अपनी रिपोर्ट जमा कर सकती है.

बैंक

तो आख़िरकार इस विधेयक में ऐसा क्या है, जिसे लेकर जानकारों को आपत्ति थी और सोशल मीडिया में मोदी सरकार के इस फ़ैसले को दूसरी नोटबंदी तक कहा जा रहा है.

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार प्रंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ''इस फ़ैसले से लोगों का यक़ीन बैंकों से उठेगा. नोटबंदी भारतीय समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग के लिए बेहद ख़राब रहा. सरकार ने जो दावे किए, वो ग़लत साबित हुए. नोटबंदी जैसे जनहित के ख़िलाफ़ थी, मैं समझता हूं उसी तरह ये भी एक तरह की नोटबंदी है.''

किस वजह से शक के घेरे में है ये बिल?

इस बिल में एक प्रावधान है बेल-इन. इस प्रावधान के बारे में ठाकुरता कहते हैं, ''बेल-इन को यूं समझिए कि बैंक का घाटा अगर ज़्यादा बढ़ जाता है तो वो आम लोगों की पूंजी से अपने नुकसान की भरपाई करें और ख़ुद को बचाने की कोशिश करें.''

वहीं आर्थिक मामलों के जानकार एमके वेणु कहते हैं, ''बेल-इन को लेकर सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स में सबसे ज़्यादा असमंजस की स्थिति है. बेल इन को लेकर लोगों का शक़ जायज़ है. ये प्रावधान कहता है कि जमाकर्ता का पैसा कुछ वक्त के लिए सरकार रोक सकती है. नोटबंदी की वजह से सरकार की लोगों के बीच जो छवि बनी थी और डर पैदा हुआ था, वैसा ही इस बेल-इन को लेकर हो रहा है. वजह है इस मसौदे की भाषा. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी आने वाले वक्त में स्पष्टीकरण देने की बात कही है.''

बेल-इन की बारीकियों को लेकर सरकार की तरफ से स्पष्टता न होने की बात ठाकुरता भी स्वीकार करते हैं.

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'अंबानी, माल्या का कर्ज़ आम लोग चुकाएँ!'

वेणु कहते हैं, ''अभी जो मसौदा है, संभव है कि वित्तीय संकट की स्थिति में सरकार ग्राहकों से कह सकती है कि वे बैंक में जमा अपनी रकम को कुछ वक्त के लिए न निकालें. ऐसे में लोगों को दिक्कत हो सकती है. सरकार को आने वाले वक्त में इस बिल के प्रावधानों पर अपने इरादे साफ़ करने चाहिए.''

वहीं, ठाकुरता ने कहा, ''इस बिल को लाने की कोशिश बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. अपनी ग़लतियों के लिए बैंक आम लोगों से वसूलने की जो तैयारी कर रही है, सरकार को इसे वापस लेना चाहिए. बैंकों ने लोगों को कर्ज़ दिए और ये वापस नहीं आए.''

''ये पैसा बैंकों ने कॉर्पोरेट घरानों के मालिकों को दिए, जिससे नॉन परफॉर्मिंग असेट्स(एनपीए) बढ़े. इनमें अंबानी, अदाणी, जेपी और विजय माल्या जैसे बड़े पूंजीपतियों के नाम हैं. बैंकों ने कर्ज़ इन रइसों को दिया और इसके लिए आम लोगों की मेहनत के पैसों को दांव पर लगा रहे हैं. ये बेहद अनैतिक है.''

वैसे, सरकार भी इस बात से वाकिफ़ है कि बेल-इन को लेकर लोगों के बीच कुछ कन्फ्यूजन की स्थिति है.

शायद यही वजह रही कि वित्त मंत्रालय ने गुरुवार को एक बयान जारी कर कहा, ''बेल इन को लेकर मीडिया में कुछ संदेह जताए जा रहे हैं. बिल में जमाकर्ताओं की रकम को लेकर जो प्रावधान हैं, उसमें सुरक्षा के लिहाज़ से अतिरिक्त सुरक्षा और पारदर्शिता मुहैया कराई गई है.''

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी बुधवार को ट्वीट किया था, ''एफ़आरडीआई इंश्योरेंस बिल 2017 को लेकर सरकार का मक़सद वित्तीय संस्थानों और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना है. सरकार इस मक़सद को लेकर प्रतिबद्ध है.''

अरुण जेटली

क्या है FRDI बिल?

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2016-17 बजट भाषण में इस बिल का पहली बार ज़िक्र किया था. वित्त मंत्रालय का दावा है कि ये बिल वित्तीय संकट की स्थिति में ग्राहकों और बैंकों के हितों की रक्षा करेगा.

  • बैंक के डूबने की स्थिति में रेज़ोल्यूशन कॉर्पोरेशन एक तय सीमा तक जमा रकम की रक्षा करेगी. हालांकि मौजूदा बिल के मसौदे में इसको लेकर स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया है.
  • किसी वित्तीय संस्थान के 'संकटग्रस्त' क़रार दिए जाने पर प्रबंधन का ज़िम्मा संभालकर एक साल के भीतर संस्थान को फिर से खड़ा करने की रेज़ोल्यूशन कॉर्पोरेशन कोशिश करेगा.
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कहा ये भी जा रहा है कि अगर इस बिल को मंजूरी मिलती है, तब बैंक के डूबने की स्थिति में ग्राहकों के पैसे का इस्तेमाल कैसे करना है, इसका फ़ैसला वित्तीय संकट से जूझ रहा संस्थान करेगा.

हालांकि इस बात को लेकर सरकार ने स्पष्ट तौर पर अब तक ये नहीं बताया है कि एक लाख रुपये के सुरक्षा कवर की सीमा को बढ़ाया जाएगा या ख़त्म कर दिया जाएगा.

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