क्या है 'नफरत' पर पीएम मोदी को खुली चिट्ठी लिखने के पीछे की मंशा ? जानिए

नई दिल्ली, 1 मई: देश के सम-सामयिक मसलों पर कुछ पूर्व नौकरशाही और कुछ बुद्धिजीवियों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'चिंता' जताते हुए चिट्ठियां लिखने का हाल में एक ट्रेंड सा बन चुका है। पिछले महीने के आखिर में भी करीब 100 पूर्व नौकरशाहों ने देश में कथित रूप से मुसलमानों के खिलाफ नफरत को लेकर अपनी चिंता पीएम मोदी तक पहुंचाई गई थी। लेकिन, अब करीब 200 पूर्व जज, पूर्व नौकरशाह और सशस्त्र सेना के भी पूर्व दिग्गजों ने एक जवाबी चिट्ठी लिखी है और पीएम मोदी को लिखी गई पहली चिट्ठी के पीछे की मंशा को उजागर करने का दावा किया है।

'नफरत' पर चिंता, जवाबी चिट्ठी से पलटवार

'नफरत' पर चिंता, जवाबी चिट्ठी से पलटवार

पिछले 26 अप्रैल को 108 पूर्व नौकरशाहों के एक ग्रुप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन पन्नों की खुली चिट्ठी भेजी थी। इस चिट्ठी में देश में कथित रूप से विभिन्न 'बीजेपी-शासित राज्यों में' 'अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर के मुसलमानों के खिलाफ हिंसा बढ़ने' को लेकर चिंता जताई गई थी। इस चिट्ठी में आरोप लगाया गया था कि इन मामलों में लगता है कि राज्य सरकारों (भाजपा शासित) की मिलीभगत है, जो कि संवैधानिक भावना के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। अब देश के करीब 200 प्रमुख नागरिकों ने प्रधानमंत्री को इस तरह की चिट्ठी लिखने वालों की मंशा पर सवाल उठा दिया गया है। इसमें रिटायर्ड जज, पूर्व नौकरशाहों से लेकर सेना के दिग्गज भी शामिल हैं।

चिट्ठी ईमानदार भावना से प्रेरित नहीं- जवाबी खत

चिट्ठी ईमानदार भावना से प्रेरित नहीं- जवाबी खत

पीएम मोदी को पहले लिखी गई चिट्ठी के जवाब में अब 197 वरिष्ठ और प्रमुख नागरिकों ने जो खुली चिट्ठी लिखकर जवाब दिया है, उसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया है, 'हमें भरोसा नहीं है कि नफरत की राजनीति को खत्म करने के लिए एक स्वयंभू संवैधानिक आचरण समूह (सीसीजी) की ओर से प्रधानमंत्री को एक और खुला पत्र लिखना ईमानदार भावना से प्रेरित है।' नफरत की राजनीति को लेकर पीएम मोदी को घेरने के कथित 'इरादे' से लिखे गए 'बुद्धिजीवियों' की मंशा पर सवाल उठाने वाली ताजा जवाबी चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वालों में सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस परमोद कोहली, राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व जज आरएस राठौर, और केरल हाई कोर्ट के पूर्व जज पीएन रविंद्रण जैसी शख्सियतें शामिल हैं। संवैधानिक आचरण समूह (सीसीजी) को जवाब देने वालों में कई रिटायर्ड जजों के अलावा पूर्व सिविल सर्वेंट और सेना के दिग्गज भी शामिल हैं। मसलन, इनमें पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल शशांक, पूर्व रॉ चीफ संजीव त्रिपाठी (2014 में भाजपा में शामिल हुए थे), महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी प्रवीण दीक्षित, दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी भी शामिल हैं।

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    'एजेंडा के तहत राजनीतिक बयान'

    'एजेंडा के तहत राजनीतिक बयान'

    इन्होंने शनिवार को पीएम मोदी को लिखी अपनी जवाबी चिट्ठी में दावा किया है कि, यह जनता की राय को आकार देने और 'अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने' के लिए 'मोदी सरकार-विरोधी कोशिशों' का हिस्सा है। ताजा चिट्ठी लिखने वालों में 8 पूर्व जज, 97 पूर्व नौकरशाह और सशस्त्र सेना से रिटार 92 अफसर शामिल हैं। इनके मुताबिक पहले वाला ग्रुप सिर्फ 'एजेंडा के तहत राजनीतिक बयान' जारी करता है। ताजा चिट्ठी में कहा गया है, 'कुछ समस्याएं जिससे अब वे उत्तेजित हो रहे हैं, वे हमारे देश में स्थानिक हो चुकी हैं, जिसने विभाजन, जिहादी आतंकवाद और धर्मनिरपेक्षता की तोड़ी-मरोड़ी गई व्याख्या को देखा है। इन रिटायर्ड सिविल सर्वेंट को इन बीमारियों को दूर करने की अपनी नाकामियों का कुछ आत्मनिरिक्षण करना चाहिए, जो अपने ऑफिस से बाहर रहकर वे अब करना चाहते हैं।'

    'अपनी हताशा को निकालने का एक तरीका है'

    'अपनी हताशा को निकालने का एक तरीका है'

    दूसरा वाला ग्रुप पश्चिम बंगाल में हुई राजनीतिक हिंसा के खिलाफ भी बयान जारी कर चुका है और विदेश नीति पर सरकार का बचाव भी कर चुका है। अब इनका कहना है कि 'यह उनके लिए अपनी हताशा को निकालने का एक तरीका है, क्योंकि जनता की राय प्रधानमंत्री मोदी के पीछे ठोस रूप से कायम है जैसा कि हाल के प्रदेश चुनावों ने दिखाया है। उनका गुस्सा और उनकी तकलीफ न सिर्फ एक खाली-दिखावा है, बल्कि, वास्तव में वे नफरत की राजनीति को हवा दे रहे हैं, और वर्तमान सरकार के खिलाफ नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पहले पीएम मोदी को जो चिट्ठी लिखी गई थी, उसपर हस्ताक्षर करने वाले 108 लोगों में जूलियो रिबेरो, रवि बुद्धिराजा, वीपी राजा, मीरन बोरवंकर औरअन्ना धनी जैसे कुछ पूर्व नौकरशाह शामिल हैं। उनका कहना था, 'देश में नफरत भरी बर्बादी के उन्माद में सिर्फ मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्य ही बलि की वेदी नहीं हैं, बल्कि खुद संविधान भी है।'

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