Polygraph Test in Hindi: सामने आएगा कोलकाता रेप का सच, मुख्य आरोपी का होगा पॉलीग्राफ टेस्ट

What is Polygraph Test: कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला ट्रेनी डॉक्टर के साथ रेप के बाद हत्या मामले में मुख्य आरोपी संजय रॉय का पॉलीग्राफ टेस्ट होगा। इस मामले की जांच कर रही सीबीआई को संजय रॉय पर पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की अनुमति मिल गई है, जिसकी वजह से कोर्ट की सुनवाई 29 अगस्त तक के लिए टल गई है।

बता दें कि संजय रॉय पर ट्रेनी डॉक्टर पर हमला करने का आरोप है। सीसीटीवी फुटेज में कथित तौर पर रॉय को घटना के दिन सुबह 4 बजे ब्लूटूथ डिवाइस के साथ आपातकालीन भवन में प्रवेश करते हुए देखा गया। वह 40 मिनट बाद बिना ब्लूटूथ डिवाइस के ही बाहर चला गया। बाद में यह डिवाइस पीड़िता के शव के पास मिली।

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इसके साथ ही केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष का भी पॉलीग्राफ टेस्ट कराने पर विचार कर रही है। दरअसल इस पूरे मामले में पूर्व प्रिंसिपल की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जिस तरह से उनपर इस मामले को दबाने का आरोप है, उसके बाद सीबीआई उनका भी पॉलीग्राफ टेस्ट कराना चाहती है।

झूठ पकड़ने में मददगार

पॉलीग्राफ टेस्ट, जिसे आमतौर पर झूठ पकड़ने वाले टेस्ट के रूप में जाना जाता है। जिस व्यक्ति पर यह टेस्ट किया ता है उसकी शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापने के लिए एक मशीन का प्रयोग किया जाता है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार, इस परीक्षण का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया है या नहीं।

हालांकि इस टेस्ट से व्यक्ति की ईमानदारी को नहीं मापा जा सकता है। इस टेस्ट के जरिए शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापा जाता है जिसके आधार पर व्याख्या की जाती है कि आदमी सच बोल रहा है या झूठ।

19वीं सदी में पहली बार हुआ टेस्ट

पॉलीग्राफ टेस्ट की प्रभावशीलता और सटीकता को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, इसे 100 फीसदी सही नहीं माना जाता है। पहला पॉलीग्राफ परीक्षण कथित तौर पर 19वीं सदी में इतालवी अपराध विज्ञानी सेसरे लोम्ब्रोसो द्वारा किया गया था, जिन्होंने पूछताछ के दौरान संदिग्ध अपराधियों के रक्तचाप में होने वाले बदलावों को मापा था।

कैसे होता है पॉलीग्राफ टेस्ट
पॉलीग्राफ मशीन हृदय गति, सांस लेने के पैटर्न, पसीना, रक्तचाप में उतार-चढ़ाव, नाड़ी की दर और रक्त प्रवाह जैसी विभिन्न शारीरिक प्रतिक्रियाओं की निगरानी करती है।

परीक्षण किए जा रहे व्यक्ति के शरीर में कार्डियो-कफ या संवेदनशील इलेक्ट्रोड जैसे उपकरण लगाए जाते हैं। प्रत्येक प्रतिक्रिया को एक संख्यात्मक मान दिया जाता है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि व्यक्ति सच बोल रहा है, धोखा दे रहा है या कुछ नहीं कहा जा सकता है।

पॉलीग्राफ टेस्ट रॉय के बयान की पुष्टि करने में मदद कर सकता है। सवालों के जवाब देते समय हृदय गति और रक्तचाप में होने वाले बदलावों जैसी शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापकर, जांचकर्ता संभावित धोखे की पहचान कर सकते हैं।

हालांकि पॉलीग्राफ के नतीजे हमेशा अदालत में स्वीकार्य नहीं होते, फिर भी वे जांचकर्ताओं को इससे काफी अहम जानकारी मिल सकती है। इस परीक्षण के साथ-साथ रॉय और अन्य आरोपियों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन भी किया जा रहा है।

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