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क्‍या होता है अविश्‍वास प्रस्‍ताव, जाएगी मोदी सरकार या हारेगा विपक्ष? पढ़ें पूरा गणित

नई दिल्‍ली। संसद का मॉनसून सत्र बुधवार को शुरू हो गया। उम्‍मीद के मुताबिक पहले ही दिन विपक्ष ने भीड़ द्वारा की गई हत्‍याओं के मुद्दे पर सरकार को घेरा। तेलुगू देश पार्टी (टीडीपी) ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव पेश कर दिया, जिसे लोकसभा स्‍पीकर सुमित्रा महाजन ने स्‍वीकार कर लिया। अविश्‍वास प्रस्‍ताव को 2014 में पूर्ण बहुमत से आई मोदी सरकार की पहली अग्निपरीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर लोकसभा में शुक्रवार को बहस होगी। इस बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सोनिया गांधी ने कहा कि कौन कहता है कि हमारे पास नंबर नहीं हैं? दूसरी ओर मोदी सरकार की ओर से अनंत कुमार ने मोर्चा संभाला। उन्‍होंने कहा कि मोदी सरकार के पास पर्याप्‍त हैं, इसलिए उन्‍हें किसी बात की चिंता नहीं है। बहरहाल, नंबर गेम को लेकर तो हर जगह बात चल ही रही है और आगे भी चलती रहेगी, लेकिन पहले यह समझने की जरूरत है कि आखिर अविश्‍वास प्रस्‍ताव होता क्‍या है? इसकी प्रक्रिया क्‍या है? विपक्ष किस तरीके से अविश्‍वास प्रस्‍ताव को हथियार के तौर पर प्रयोग करता है।

क्‍या होता है अविश्‍वास प्रस्‍ताव, जाएगी मोदी सरकार या हारेगा विपक्ष? पढ़ें पूरा गणित

अविश्वास प्रस्ताव सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों की तरफ से रखा जाता है। यह केवल लोकसभा में ही रखा जा सकता है, राज्यसभा में नहीं। जब मुख्‍य विपक्षी दलों को लगता है कि सरकार के पास अब बहुमत नहीं रह गया है तब इस प्रस्‍ताव को रखा है। अविश्‍वास प्रस्‍ताव को पेश करने के लिए कम से कम 50 लोकसभा सदस्‍यों के समर्थन की जरूरत होती है। इसके बाद अविश्‍वास प्रस्‍ताव लोकसभा अध्‍यक्ष के सामने पेश किया जाता है। स्‍पीकर की मंजूरी के 10 दिनों के अंदर अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर चर्चा होती है। स्‍पीकर अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर वोटिंग कर सकते हैं।

सरकार बने रहने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का गिरना यानी नामंजूर होना जरूरी है। अगर अविश्वास प्रस्ताव को सदन ने मंजूर कर लिया तो समझो सरकार गिर गई। अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित नियम 198 के तहत व्यवस्था है कि कोई भी सदस्य लोकसभा अध्यक्ष को सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है। यहां समझने की जरूरत है अविश्‍वास प्रस्‍ताव सदन में विपक्ष की ओर से लाया जाता है, जबकि विश्‍वास प्रस्‍ताव सत्‍ता पक्ष की ओर से। अटल बिहारी वाजपेयी ने दो बार सदन में विश्‍वास मत हासिल करने का प्रस्‍ताव पेश किया था और दोनों बार वह हार गए थे। 1996 में तो उन्‍होंने वोटिंग से पहले ही इस्‍तीफा दे दिा था, जबकि 1998 में 1 वोट से उनकी सरकार गिर गई थी।

पहली बार पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाया गया था। वह साल था अगस्‍त 1963 और अविश्‍वास प्रस्‍ताव पेश करने वाले नेता थे जेबी कृपलानी। पहला अविश्‍वास प्रस्‍ताव लोकसभा में पास नहीं हो सका था, क्‍योंकि इसके पक्ष में केवल 62 वोट ही पड़े थे, जबकि विरोध में मतलब सरकार के समर्थन में 347 वोट पड़े थे। 1978 में मोरारजी देसाई की सरकार अविश्‍वास प्रस्‍ताव के कारण गिर गई थी। 1993 में नरसिम्‍हा राव सरकार भी अविश्‍वास प्रस्‍ताव के कारण गिरने वाली थी, लेकिन मामूली अंतर से बच गई थी।

भारतीय संसद के अब तक इतिहास में सबसे ज्‍यादा 15 बार इंदिरा गांधी के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाया गया। लाल बहादुर शास्‍त्री की सरकार के समय 3 बार, नरसिम्‍हा राव सरकार के समय 3 बार। मोदी सरकार के 4 साल के कार्यकाल में यह पहला अविश्‍वास प्रस्‍ताव है। 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। पार्टी ने मोदी लहर के दम पर अब तक सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए 282 लोकसभा सीटें हासिल की थीं। सहयोगियों को मिलाकर एनडीए का आंकड़ा 300 पार पहुंच गया था, लेकिन एक के बाद एक लोकसभा उपचुनाव में हार के चलते बीजेपी का आंकड़ा कम हो गया। अब तक बीजेपी के पास लोकसभा में 272 सीटें बची हैं। मोदी सरकार के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव की बात करें तो इस समय लोकसभा में 535 सदस्‍य हैं। बहुमत साबित करने के लिए मोदी सरकार को 268 वोट चाहिए। इस लिहाज बीजेपी के पास अकेले ही 272 सदस्‍य हैं।

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