विशाखापत्तनम को आंध्र प्रदेश की राजधानी घोषित करके क्या साध रहे हैं जगनमोहन रेड्डी
विशाखापत्तनम को आंध्र प्रदेश की राजधानी बनाने को लेकर चल रही चर्चाओं को मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी के उस बयान से बढ़ावा मिला है जिसमें उन्होंने कहा कि अगले कुछ महीनों में वे इस समुद्रतटीय नगर से काम करना शुरू कर देंगे.
तेलंगाना के अलग होने के बाद से यानी 4 जून, 2014 से ही आंध्र प्रदेश की राजधानी कहां होगी इसको लेकर चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) और जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के बीच खींचतान देखने को मिली है.
तेलुगू देशम पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री रहे चंद्रबाबू नायडू ने अमरावती को राज्य की राजधानी बनाने की घोषणा की थी, लेकिन जगनमोहन रेड्डी ने एक साथ तीन शहरों को राज्य की राजधानी का दर्जा देकर नया इतिहास बनाया.
उन्होंने कार्यपालिका के लिए विशाखापत्तनम, विधायिका के लिए अमरावती और हाईकोर्ट वाले शहर कर्नूल को न्यायिक मामलों की राजधानी बनाया.
तीन राजधानियां उचित हैं?
तकनीकी रूप से आंध्र प्रदेश की तीन राजधानियों की अवधारणा को आंध्र प्रदेश विकेंद्रीकरण और सभी क्षेत्रों के समावेशी विकास अधिनियम, 2020 नामक विवादास्पद क़ानून में निहित किया गया था.
लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या तीन राजधानियों का होना उचित है क्योंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है.
जगनमोहन रेड्डी ने ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट की तैयारियों को लेकर सोमवार को दिल्ली में आयोजित बैठक के दौरान कहा, "मैं आप लोगों को विशाखापत्तनम आमंत्रित कर रहा हूं जो आने वाले दिनों में राजधानी बनने जा रहा है. आने वाले महीनों में मैं विशाखापत्तनम शिफ़्ट हो रहा हूं."
राज्य में ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट का आयोजन तीन और चार मार्च को होना है.
बहरहाल जगनमोहन रेड्डी के बयान को बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि 175 सदस्यीय आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है.
राजधानी को लेकर झगड़ा
तेलंगाना के मौजूदा मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के लंबे विरोध प्रदर्शन के बाद दूसरे तेलुगूभाषी राज्य के तौर पर तेलंगाना का गठन हुआ है.
अलग राज्य गठन करने की राव की मांग कोई अनोखी मांग नहीं थी.
साल 1953 से 1956 के बीच भारत में मौजूद रहा हैदराबाद राज्य ही तेलंगाना बना है. 1956 में पुराने मद्रास प्रांत से हटा कर बना आंध्रा ही, 2014 के बाद नया आंध्र प्रदेश है.
1956 में जब भाषाई आधार पर राज्यों की सीमा का निर्धारण हो रहा था तब पुराने हैदराबाद और पुराने आंध्रा को मिलाकर आंध्र प्रदेश का गठन हुआ था.
तेलंगाना के गठन ने रायलसीमा क्षेत्र के लोगों की आंकाक्षाओं को बढ़ा दिया था.
उन्हें उम्मीद थी कि भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से पहले आंध्रा की राजधानी रही कर्नूल को फिर से राजधानी का दर्जा हासिल होगा.
लेकिन न तो नायडू और न ही जगनमोहन रेड्डी ने रायलसीमा क्षेत्र को राज्य की राजधानी के रूप में तरजीह दी जबकि वे दोनों इसी क्षेत्र से आते हैं.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि रायलसीमा को आंध्र प्रदेश के शक्तिशाली समुदायों में से एक रेड्डी का गढ़ माना जाता था.
नायडू ने दी अमरावती को तरजीह
नायडू ने अमरावती को प्राथमिकता दी जिसे आंध्र प्रदेश के अन्य शक्तिशाली समुदाय, कम्मों का गढ़ माना जाता है.
लेकिन जल्द ही नायडू पर अमरावती शहर के बड़े हिस्से या क़रीब 33 हज़ार एकड़ ज़मीन की बिक्री को लेकर गंभीर आरोप लगे.
जगनमोहन रेड्डी ने उन पर अपने लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए इनसाइडर ट्रेडिंग में लिप्त होने का आरोप लगाया.
सरल शब्दों में कहें तो जगनमोहन ने नायडू पर आरोप लगाया कि अमरावती को राज्य की राजधानी बनाए जाने की जानकारी उन्होंने कथित तौर पर 'अपने दोस्तों और रिश्तेदारों' को लीक की ताकि वे सरकार द्वारा भुगतान की गई मुआवज़े की राशि से लाभान्वित हो सकें.
आंध्र की राजनीति पर नज़र रखने वाले एक वरिष्ठ राजनीतिक पर्यवेक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "जगनमोहन रेड्डी को वहां तो अपना पार्टी कार्यालय स्थापित करने के लिए ज़मीन भी नहीं मिली. इसी वजह से जगनमोहन रेड्डी ने नायडू के ख़िलाफ़ अभियान शुरू किया और यह अभियान चल निकला."
इस अभियान को पर्यावरणविदों का साथ भी मिला क्योंकि अमरावती कृष्णा नदी के तट पर बसी है और राजधानी को राज्य की सबसे उपजाऊ मिट्टी पर बसाया जा रहा था. इस अभियान के चलते ही 2019 में जगनमोहन रेड्डी सत्ता में आ गए.
- ये भी पढ़ें - आंध्र प्रदेश की तीन राजधानियां, कैसे होगा काम?
विशाखापत्तनम का महत्व
जगनमोहन रेड्डी ने राज्य की राजधानी को विकेंद्रीकृत करने की कल्पना की और उसे हक़ीक़त में जामा पहनाने के लिए क़ानून भी लाए.
लेकिन तीन राजधानी की इस कल्पना को आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया और अमरावती को ही राज्य की राजधानी बनाए रखने का आदेश दिया.
हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक़, उच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर इस बात पर ज़ोर दे रहा था कि कौन सा शहर राजधानी होगा.
उसी समय, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय की स्थापना पर राज्य सरकार कोई फ़ैसला नहीं ले सकती. हाईकोर्ट के फ़ैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी.
लेकिन, राजधानी के रूप में तटीय शहर विशाखापत्तनम में ऐसी ख़ास बात क्या है?
जाने माने राजनीतिक अर्थशास्त्री और संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य केएस चल्लम ने बताया, "विशाखापत्तनम सम्राट अशोक के समय से अस्तित्व में है. यह मूलरूप से कलिंग है जिसमें विशाखापत्तनम और गंजम के पुराने ज़िले शामिल हैं. यही कारण है कि ब्रिटिश और डच दोनों के शासन के दौरान शिपिंग के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा था."
"वास्तव में, अशोक अन्य दक्षिण एशियाई देशों के साथ व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कलिंग को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाना चाहते थे. आज, विशाखापत्तनम के पास एक औद्योगिक आधार है जो राज्य के घरेलू उत्पाद में पांच लाख करोड़ रुपये प्रदान करता है."
चल्लम ने यह भी बताया, "स्टील प्लांट, पेट्रोकेमिकल्स प्लांट, बंदरगाह और नौसेना बेस की मौजूदगी से होने वाले आर्थिक लाभ, विशाखापत्तनम, विजयनगरम और श्रीकाकुलम जैसे उत्तरी आंध्र ज़िलों की अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी की 90 प्रतिशत आबादी तक नहीं पहुंचे हैं. यदि विशाखापत्तनम राज्य की पूर्ण राजधानी बन जाता है, तो आर्थिक रूप से वंचित वर्गों तक लाभ पहुंचेगा."
वहीं इस बहस की दूसरी तरफ़ अमरावती है जहां 33,000 एकड़ भूमि एक तरह से खाली पड़ी हुई है. ना तो सभी निर्माण कार्य पूरे हो पाए हैं और ना ही ज़मीन किसानों के लिए खेती योग्य है.
राजनीतिक विश्लेषक गाली नागराजा ने बताया, "मूल रूप से, जगनमोहन रेड्डी, चंद्रबाबू नायडू के साथ हिसाब बराबर करना चाहते हैं. वह अमरावती पर लगे नायडू के टैग को मिटाना चाहते हैं. यह एक राजनीतिक खेल है."
नाम न छापने की शर्त पर एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक ने बीबीसी को बताया, "विधानसभा के चुनाव अगले साल होने वाले हैं. जगनमोहन रेड्डी विशाखापत्तनम में लोगों को आश्वस्त कर रहे हैं कि वहां राजधानी स्थापित की जाएगी. राजधानी को लेकर हो रही यह राजनीति दरअसल रेड्डी बनाम कम्मा जाति संघर्ष की अभिव्यक्ति है."
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