African Swine fever क्या है ? इसके बारे में ये 10 बातें आपको जाननी चाहिए
नई दिल्ली, 22 जुलाई: केरल के वायनाड में अफ्रीकन स्वाइन फीवर का पता चलने के बाद 300 सुअरों को मारने के आदेश जारी किए गए हैं। इससे पहले देश के कुछ और हिस्सों से भी सुअरों में अफ्रीकन स्वाइन फीवर फैलने की खबरें आ चुकी हैं। कुछ दिन पहले ही केंद्र सरकार ने इस खतरे को लेकर केरल को सभी तरह की सावधानियां बरतने के लिए आगाह किया था। आइए जानते हैं कि यह बीमारी है क्या? क्या इंसानों को भी इससे खतरा है ? यह अर्थव्यवस्था के लिए क्यों चुनौती है? दुनिया में इसका वायरस कहां तक फैल चुका है और भारत में किन राज्यों से इसको लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

केरल में अफ्रीकी स्वाइन फीवर फैलने के बाद सुअरों को मारने के आदेश
केरल के वायनाड जिले के दो सुअर फार्म में अफ्रीकी स्वाइन फीवर की पुष्टि की गई है। भोपाल स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीजेज में भेजे गए सैंपल की जांच के बाद इसकी वायरस की पुष्टि की गई है। पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा है कि एक फार्म में कई सुअरों की मौत के बाद सैंपल परीक्षण के लिए भेजे गए थे। अधिकारी ने बताया कि 'अब जब जांच रिपोर्ट में संक्रमण की पुष्टि हुई है। तो दूसरे फार्म के 300 सुअरों को मारने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं।' पशुपालन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यह बीमारी और भयानक रूप न ले ले, इसके लिए कदम उठाए जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने इसी महीने बिहार और कुछ उत्तरी-पूर्वी राज्यों में अफ्रीकी स्वाइन फीवर की जानकारी मिलने के बाद बायो-सिक्योरिटी से सबंधित कदम उठाने के लिए अलर्ट जारी किए थे।

अफ्रीकी स्वाइन फीवर क्या है ?
1) अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक अफ्रीकी स्वाइन फीवर (एएसएफ) बहुत ही ज्यादा संक्रामक और घातक बीमारी है, जो फार्म में विकसित होने वाले और जंगली सुअरों दोनों को ही संक्रमित कर सकता है।
2)अफ्रीकी स्वाइन फीवर में मृत्यु दर 100% तक हो सकती है। अफ्रीकी स्वाइन वायरस एक संक्रमित सुअर से दूसरे सुअरों के सीधे संपर्क में शारीरिक द्रव के जरिए तेजी से फैल सकता है।

क्या अफ्रीकी स्वाइन फीवर की वैक्सीन है ?
3)अफ्रीकी स्वाइन फीवर की अभी तक कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि इसका वायरस सुअरों की बड़ी आबादी को एक झटके में साफ कर सकता है, जिससे सुअर पालन से जुड़े लोगों की अर्थव्यवस्था चौपट हो सकती है।
4) अफ्रीकी स्वाइन वायरस कपड़ों, जूते, पहियों और ऐसी ही अन्य चीजों पर लंबे वक्त तक जीवित रह सकता है। यह अलग-अलग पोर्क उत्पादों, जैसे कि हैम, सॉसेज या बेकन में भी जिंदा रह सकता है।

एहतियाती कदम उठाने क्यों हैं जरूरी ?
5) इंसानों का बर्ताव इस वायरस के फैलने में अहम रोल अदा कर सकता है और यदि जरूरी एहतियाती कदम नहीं उठाए गए, तो यह जल्द ही बड़े क्षेत्रीय दायरे में संक्रमण को पहुंचा सकता है।
6) हाल के वर्षों में अफ्रीकी स्वाइन फीवर ने पोर्क उद्योग को काफी तबाह किया है, क्योंकि इससे सुअरों की बड़ी आबादी का सफाया हो जाता है।

जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन पर असर
7) जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में भी इस बीमारी ने गंभीर संकट खड़ा किया है। क्योंकि, यह सिर्फ फार्म में पलने वाले सुअरों को ही नहीं तबाह करता है, बल्कि जंगली सुअरों का भी सत्यानाश करता है, जिससे देसी नस्लों की बर्बादी का खतरा पैदा हो रहा है।
8) अफ्रीकी स्वाइन फीवर ने अब दुनिया के बड़े क्षेत्र को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। एशिया, कैरिबियन, यूरोप और प्रशांत क्षेत्र कोई भी इससे अछूता नहीं रहा है, जहां इससे घरेलू या जंगली दोनों तरह के सुअर प्रभावित ना हो रहे हों।

इंसानों में नहीं फैलता अफ्रीकी स्वाइन फीवर
9) केरल के अलावा यूपी के बरेली में भी अफ्रीकी स्वाइन फीवर के केस सामने आने की जानकारी है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक इंडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट के ज्वाइंट डायरेक्टर डॉक्टर पी सिंह ने गुरुवार को कहा कि मिजोरम, त्रिपुरा और असम के बाद बरेली में भी अफ्रीकी स्वाइन फीवर के मामले सामने आए हैं।
10) राहत की बात ये है कि अफ्रीकी स्वाइन फीवर इंसानों में नहीं फैलता है। लेकिन, मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सुअरों की मौत की जानकारी मिलने के बाद एहतियात के तौर पर लखनऊ जिला प्रशासन ने पोर्क मीट और उससे जुड़े उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाए दिए हैं। (तस्वीरें-सांकेतिक)
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