कोरेगांव में मराठों और महारों के बीच हुआ क्या था
महाराष्ट्र में दलितों और मराठा समुदाय के बीच कई जगह हिंसक झड़पें होने की ख़बरें हैं. इन झड़पों की शुरुआत कोरेगांव भीमा, पाबल और शिकरापुर से हुई, जहां बवाल में कथित रूप से एक व्यक्ति की मौत हो गई.
कोरेगांव भीमा में 1 जनवरी 1818 को पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश सैनिकों की जीत की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी, जब ये हिंसा भड़की. इस मौक़े पर कई वाहन फूंके जाने की भी ख़बर है.
दलित नेता ब्रिटिश फ़ौज की इस जीत का जश्न इसलिए मनाते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जीतने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़ी टुकड़ी में ज़्यादातर महार समुदाय के लोग थे, जिन्हें अछूत माना जाता था.
इसे कोरेगांव की लड़ाई भी कहा जाता है. जानकार बताते हैं कि पेशवा बाजीराव द्वितीय की अगुवाई में 28 हज़ार मराठा पुणे पर हमला करने की योजना बना रहे थे.
रास्ते में उन्हें 800 सैनिकों से सजी कंपनी फ़ोर्स मिली, जो पुणे में ब्रिटिश सैनिकों की ताक़त बढ़ाने के लिए जा रही थी. पेशवा ने कोरेगांव में मौजूद कंपनी फ़ोर्स पर हमला करने के लिए अपने 2 हज़ार सैनिक भेजे.
कप्तान फ्रांसिस स्टॉन्टन की अगुवाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की इस टुकड़ी ने क़रीब 12 घंटे तक अपनी पोज़ीशन संभाले रखी और मराठों को कामयाब नहीं होने दिया. बाद में मराठों ने फ़ैसला बदला और कदम खींच लिए.
क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि जनरल जोसफ़ स्मिथ की अगुवाई में बड़ी ब्रिटिश टुकड़ी वहां पहुंच जाएगी जिससे मुकाबला आसान नहीं होगा.
इस टुकड़ी में भारतीय मूल के जो फ़ौजी थे, उनमें ज़्यादातर महार दलित थे और वो बॉम्बे नेटिव इनफ़ैंट्री से ताल्लुक रखते थे. ऐसे में दलित कार्यकर्ता इस घटना को दलित इतिहास का अहम हिस्सा मानते हैं.
मराठों को टक्कर
जेम्स ग्रांट डफ़ ने अपनी किताब 'ए हिस्टरी ऑफ़ द मराठाज़' में इस लड़ाई का ज़िक्र किया है. इसमें लिखा है कि रात भर चलने के बाद नए साल की सुबह दस बजे भीमा के किनारे पहुंचे जहां उन्होंने करीब 25 हज़ार मराठों को रोके रखा.
वो नदी की तरफ़ मार्च करते रहे और पेशवा के सैनिकों को लगा कि वो पार करना चाहते हैं लेकिन जैसे ही उन्होंने गांव के आसपास का हिस्सा कब्ज़ाया, उसे पोस्ट में तब्दील कर दिया.
हेनरी टी प्रिंसेप की किताब हिस्टरी ऑफ़ द पॉलिटिकल एंड मिलिट्री ट्रांजैक्शंस इन इंडिया में इस लड़ाई में महार दलितों से सजी अंग्रेज़ टुकड़ी के साहस का ज़िक्र मिलता है.
इस किताब में लिखा है कि कप्तान स्टॉन्टन की अगुवाई में जब ये टुकड़ी पूना जा रही थी, तो उस पर हमला होने की आशंका थी. खुली जगह पर फंसने के डर से बचने के लिए इस टुकड़ी ने कोरेगांव में पहुंचकर उसे अपना किला बनाने का फ़ैसला किया. अगर ये टुकड़ी खुले में फंस जाती तो मराठों के हाथों बुरे हालात में फंस सकती थी.
अलग-अलग इतिहासकारों के मुताबिक इस लड़ाई में 834 कंपनी फ़ौजियों में से 275 मारे गए, घायल हुए या फिर लापता हो गए. इनमें दो अफ़सर भी शामिल थे. इंफ़ैंट्री के 50 लोग मारे गए और 105 ज़ख़्मी हुए.
ब्रिटिश अनुमानों के मुताबिक पेशवा के 500-600 सैनिक इस लड़ाई में मारे गए या घायल हुए.
अस्मिता की लड़ाई
जो इतिहासकार महारों और पेशवा फ़ौजों के बीच हुए इस युद्ध को विदेशी आक्रांता अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारतीय शासकों के युद्ध के तौर पर देखते हैं, तथ्यात्मक रूप से वो ग़लत नहीं हैं. लेकिन जानकार मानते हैं कि महारों के लिए ये अँग्रेज़ों की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी.
अंत्यजों यानी वर्णव्यवस्था से बाहर माने गए 'अस्पृश्यों' के साथ जो व्यवहार प्राचीन भारत में होता था, वही व्यवहार पेशवा शासकों ने महारों के साथ किया.
इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके 'प्रदूषित और अपवित्र' पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ.
उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण 'प्रदूषित और अपवित्र' न हो जाए. वो सवर्णों के कुएँ या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.
''मराठा नहीं ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ थी लड़ाई''
इतिहासकार और आलोचक प्रो. रुषिकेश काम्बले कोरेगांव भीमा का दूसरा पक्ष भी बताते हैं. उनका दावा है कि कि महारों ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों को हराया था. ब्राह्मणों ने छुआछूत जबरन दलितों पर थोप दिया था और वो इससे नाराज़ थे. जब महारो ने ब्राह्मणों से इसे ख़त्म करने को कहा तो वे नहीं माने और इसी वजह से वो ब्रिटिश फ़ौज से मिल गए.
ब्रिटिश फ़ौज ने महारों को ट्रेनिंग दी और पेशवाई के ख़िलाफ़ लड़ने की प्रेरणा दी. मराठा शक्ति के नाम पर जो ब्राह्मणों की पेशवाई थी ये लड़ाई दरअसल, उनके ख़िलाफ़ थी और महारों ने उन्हें हराया. ये मराठों के ख़िलाफ़ लड़ाई तो कतई नहीं थी.
काम्बले कहते हैं कि महारों और मराठों के ख़िलाफ़ किसी तरह का मतभेद या झगड़ा था, ऐसा इतिहास में कहीं नहीं है. अगर ब्राह्मण छुआछूत ख़त्म कर देते तो शायद ये लड़ाई नहीं होती.
वो कहते हैं कि मराठों का नाम इसमें इसलिए लाया जाता है क्योंकि ब्राह्मणों ने मराठों से पेशवाई छीनी थी. ये आखिरी पेशवा ताकत थी और ब्रिटिश उन्हें हराना चाहते थे. इसीलिए ब्रितानी फ़ौज ने महारों को साथ लिया और पेशवा राज ख़त्म कर दिया.
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