सबरीमाला: बीते साल 4-1 से आया था ऐतिहासिक फैसला, किस जज ने क्या कहा था
नई दिल्ली। आज (गुरुवार) सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला फैसले की पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला सुनाएगा। कोर्ट अपने ही पिछले साल दिए फैसले की समीक्षा के बाद ये फैसला सुनाएगा। बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी थी लेकिन इसके विरोध में समीक्षा याचिका दायर की गई थीं।

साल 2018 में सितंबर माह में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने सबीरमाला मामले पर फैसला सुनाया था। 5 सदस्यों की संवैधानिक पीठ ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था। फैसले में हैरान करने वाली बात ये थी कि पांच जजों की बेंच के चार पुरुष सदस्यों ने जहां महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के पक्ष में फैसला सुनाया, वहीं महिला जज इंदु मल्होत्रा ने असहमति दिखाई थी। चलिए जानते हैं कि इस फैसले में पांच जजों में से किसने क्या कहा था-

जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर-
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर ने महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के पक्ष में फैसला सुनाया था। इन्होंने कहा था कि भक्ति में लिंगभेद नहीं हो सकता है। भगवान अयप्पा के सभी भक्त हिंदू हैं, ऐसे में अलग धार्मिक संप्रदाय ना बनाएं। दीपक मिश्रा ने कहा था कि धर्म जीवन जीने का एक तरीका है, जो जीवन को आध्यात्म से जोड़ता है। उन्होंने कहा था कि मासिक धर्म जैसी शारीरिक क्रिया के आधार पर भेदभाव असंवैधानिक है। पितृसत्तात्मक धारणा को भक्ति में समानता को कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर ने कहा था कि पूजा में लैंगिक भेदभाव नहीं चल सकता।
इन्होंने कहा था कि इस देश में महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है। एक निश्चित आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश ना करने देना धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। केरल मंदिर प्रवेश अधिनियम के 3 (बी) के तहत, जो 10 से 50 वर्ष की उम्र के बीच की महिलाओं को पूजा करने का अधिकार नहीं देता है, हिंदू धर्म में पूजा की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है। समान रूप से पूजा करने का अधिकार पुरुषों और महिलाओं दोनों को है। प्रतिबंध धार्मिक पितृसत्ता है।

जस्टिस नरीमन-
जस्टिस नरीमन ने भी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में फैसला सुनाया था। उन्होंने कहा था कि अयप्पा के भक्त अलग से संप्रदाय नहीं बना सकते। सभी उम्र की महिलाएं भगवान अय्यप्पा की समान उपासक हैं और इसलिए उन्हें केवल इस वजह से मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता कि उन्हें मासिक धर्म होता है। जस्टिस नरीमन ने कहा था कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुकूल नहीं है। पूजापाठ में महिलाओं का भी बराबर का अधिकार है। सभी आयु वर्ग के लोग भगवान अयप्पा के भक्त हैं और लिंग मंदिर में प्रवेश से रोकने का आधार नहीं हो सकता।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़-
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने भी मंदिर में महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया था। उन्होंने कहा था कि किसी भी धार्मिक परंपरा के तहत महिलाओं को उनके शरीर की वजह से प्रवेश करने से रोकना उनकी गरिमा का उल्लंघन है और यह असंवैधानिक है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि मासिक धर्म के कारण महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न करने देना असंवैधानिक है। अदालतों को ऐसी धार्मिक प्रथाओं को वैधता प्रदान नहीं करनी चाहिए, जो महिलाओं को अपमानित करती हैं।

जस्टिस इंदू मल्होत्रा-
सबरीमाला फैसले में पांच जजों की पीठ में केवल इंदू मल्होत्रा ही ऐसी थीं, जिन्होंने मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को सही ठहराया था। पीठ में शामिल अकेली महिला जज ने कहा था कि देश में धर्मनिरपेक्ष माहौल को बनाए रखने के लिए गहरे धार्मिक मामलों से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि देश में विविध धार्मिक प्रथाएं हैं। संविधान सभी को अपने धर्म के प्रचार करने और उसका अभ्यास करने की अनुमति देता है। ऐसे में अदालतों को इस तरह की धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए भले ही फिर यह भेदभावपूर्ण क्यों न हो।
जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा था कि भगवान अयप्पा के भक्तों ने अलग तरह का धार्मिक मूल्य बना लिया है। 10-50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न करने देना उनकी खास धार्मिक परंपरा है जिसे संविधान के तहत रक्षा मिली हुई है। अदालत किसी देवता की पूजा पर अपनी नैतिकता या तार्किकता को नहीं थोप सकती है।
उन्होंने कहा था कि ऐसा करना किसी को उसकी धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित करने जैसा होगा। अगर किसी खास मंदिर में लंबे समय से कोई परंपरा चली आ रही है तो इसे उस मंदिर की अनिवार्य धार्मिक परंपरा के रूप में लेना चाहिए। कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। मल्होत्रा ने कहा था कि सबरीमाला मंदिर का मामला इस आधार पर खास है कि यहां भगवान की पूजा करने की शताब्दियों पुरानी परंपरा चली आ रही है। इसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप भक्तों की मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं पर असर डालेगा।
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