जानिए, EVM पर सवाल उठाने वाले AAP विधायक ने प्रचंड जीत के बाद क्या कहा ?

नई दिल्ली- लोकसभा चुनाव से पहले तक चीख-चीख कर ईवीएम पर सवाल उठाने वालों में आम आदमी पार्टी से मुखर थी। पार्टी ने तो इसके लिए दिल्ली विधानसभा में एक विशेष सत्र तक बुला लिया था। ईवीएम में कथित तौर पर कोई कैसे छेड़छाड़ कर सकता है, इसके दावे के लिए लाइव प्रसारण हुआ। लेकिन, चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इन दलीलों को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। अलबत्ता, विपक्ष की चिंता को देखते हुए कुछ और सतर्कता के कदम और उठाए गए, जिसके तहत बड़े पैमाने पर वीवीपैट मशीनों का इस्तेमाल हुआ। दिल्ली विधानसभा में ईवीएम के साथ टेंपर होने के दावे के लाइव टेलीकास्ट के बाद आम आदमी विधायक सौरभ भारद्वाज ईवीएम विरोधी दलीलों के सबसे चर्चित चेहरे बन गए। इसलिए दिल्ली चुनाव के बाद उनकी राय पर गौर फरमाना बहुत ही जरूरी हो गया है।

हाल के चुनाव परिणामों के बाद ईवीएम पर शांति

हाल के चुनाव परिणामों के बाद ईवीएम पर शांति

आम आदमी पार्टी और उसके विधायक सौरभ भारद्वाज हमेशा से ईवीएम को लेकर सवाल उठाते रहे थे। लेकिन, बावजूद इसके चुनाव आयोग ने उनके तर्कों को तथ्यों के आधार पर बार-बार खारिज कर दिया गया। पार्टी नेता लोकसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट तक गए, लेकिन अदालत ने उनका रिव्यू पिटीशन खारिज कर दिया। आम आदमी पार्टी समेत 21 विपक्षी दल कम से कम ईवीएम और वीवीपीएटी के मिलान को 50 फीसदी तक करने की मांग कर रहे थे। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सिर्फ प्रति विधानसभा 5 ईवीएम की ही मिलान करने के निर्देश दिए। उसके बाद से ईवीएम पर सवाल उठाने का विपक्ष का मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। लोकसभा चुनाव के बाद कई राज्यों में चुनाव हुए, हरियाणा छोड़कर सभी प्रमुख राज्यों में बीजेपी की सत्ता चली गई। लेकिन, विपक्ष ने कभी ईवीएम पर सवाल नहीं उठाया।

जेब कतरे और डाकू में बड़ा फर्क होता है- भारद्वाज

जेब कतरे और डाकू में बड़ा फर्क होता है- भारद्वाज

अब दिल्ली चुनाव में भी आम आदमी पार्टी ने ईवीएम के जरिए ही भारी जीत हासिल करके सत्ता में दोबारा लौटी है। ऐसे में ईवीएम पर उंगली उठाने वाले आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े चेहरे सौरभ भारद्वाज की राय जानना जरूरी है। एक टीवी चैनल ने मौका लगते ही भारद्वाज के सामने ये सवाल दाग दिया। उन्होंने इसका जो जवाब दिया, वह बहुत ही दिलचस्प है। उन्होंने कहा है, 'मैं आज भी ये मानता हूं कि ईवीएम से जो चुनाव है, वो सही प्रक्रिया नहीं है। जिन देशों से हम माइक्रोचिप खरीदते हैं ईवीएम की, वो देश भी ईवीएम से चुनाव नहीं कराते। वे भी बैलट पेपर से चुनाव कराते हैं, हम भले ही जीत गए....मैं आपको एक उदाहरण बताता हूं। हमारे घर के सामने से एक बस गुजरती है 419 नंबर। अंबेडकर नगर से पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन जाती है। उसके अंदर मैं चढ़ा, मेरी जेब कट गई। मेरे पिताजी चढ़े, दस दिन बाद उनकी जेब कट गई...तो मोहल्ले वालों ने कहना शुरू कर दिया कि 419 में जेब कतरे बैठते हैं। जेब कटने की पूरी संभावना है 419 में। पांडे जी (दिलीप पांडे) उसमें चढ़े और पांडे जी की जेब नहीं कटी। तो पांडे जी ये नहीं कह सकते कि सौरभ भारद्वाज झूठ बोल रहे हैं। जेब कतरे और डाकू में बड़ा फर्क होता है.....' हालांकि भारद्वाज से ये सवाल नहीं पूछा गया कि 'डाकू' कहने से उनका मतलब बैलट पेपर के जमाने में होने वाली बूथ लूट की घटनाओं से तो नहीं था?

11 फरवरी को ईवीएम से ही जीता लोकतंत्र

11 फरवरी को ईवीएम से ही जीता लोकतंत्र

गौरतलब है 9 मई, 2017 को दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर केजरीवाल सरकार ने अपने विधायक सौरभ भारद्वाज की दलीलों से देश के चुनाव आयोग और उसके विशेषज्ञों को चुनौती देने की कोशिश की थी। सौरभ भारद्वाज ने ईवीएम टेंपरिंग का डेमो दिल्ली विधानसभा में दिया था। वह वाक्या दिल्ली विधानसभा की रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुका है। दुनिया की बेहतरीन और पूरी तरह से टेंपर-प्रूफ मानी जाने वाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को एक सीक्रेट कोड के जरिए खिल्ली उड़ाने की कोशिश की थी। दिलचस्प बात ये है कि जब 8 फरवरी को वोटिंग के बाद अगले दिन भी मतदान का फाइनल आंकड़ा देने में चुनाव आयोग से देरी हो रही थी तो आम आदमी पार्टी के नेताओं को ईवीएम में ही छेड़छाड़ का शक महसूस होने लगा था। लेकिन, 11 फरवरी को एक बार फिर उनका शक बेकार साबित हुआ और भारतीय लोकतंत्र की बड़ी जीत दुनिया ने देखी।

दिल्ली में हारी कांग्रेस, लेकिन ईवीएम पर दोष नहीं

दिल्ली में हारी कांग्रेस, लेकिन ईवीएम पर दोष नहीं

ईवीएम को लेकर सवाल उठाने वालों में कांग्रेस भी आगे थी। पार्टी के बड़े-बड़े वकील चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लोकसभा चुनाव से पहले भाग-दौड़ मचाए हुए थे। लोकसभा चुनाव में देश के मतदाताओं ने उसके पसीने छुड़ा दिए। लेकिन, उसी ईवीएम से हुई वोटिंग के बाद महाराष्ट्र में हार के बावजूद उसे सत्ता मिल गई और हरियाणा में भी उसका प्रदर्शन काफी बेहतर हुआ। झारखंड में भी गुरुजी के आशीर्वाद से उसे सत्ता सुख भोगने का मौका मिला है। वहां भी चुनाव ईवीएम से ही हुए थे। लेकिन, दिल्ली में एक बार फिर से वह गच्चा खा चुकी है। लेकिन, राहत की बात ये है कि दिल्ली में आए परिणाम को लेकर भी उसका कोई नेता ईवीएम पर ठीकरा नहीं फोड़ रहा है। यहां तो पार्टी में ही बलि के बकरे की खोज शुरू हो चुकी है। बस मौके की दरे है। वैसे, लगता है कि जब तक बीजेपी-विरोधी विपक्ष की कोई बड़ी हार नहीं होती, तबतक ईवीएम थोड़ी राहत की सांस जरूर ले सकता है!

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