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क्या अबकी बार बंगाल में दीदी के गढ़ को हिला पाएगी बीजेपी? समझिए जमीनी हालात

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नई दिल्ली- पश्चिमी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं के सामने राज्य की सभी 42 लोकसभा सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। जबकि, भारतीय जनता पार्टी इस बार राज्य की 27 सीट तक झटकने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है। 2009 में बीजेपी ने राज्य में 1 सीट जीती थी और 2014 में उसने अपना आंकड़ा बढ़ाकर 2 कर लिया। लेकिन, पार्टी के लिए ज्यादा बेहतर स्थिति ये रही कि इन पांच वर्षों में उसका वोट शेयर 6.1% से बढ़कर 16.8% तक पहुंच गया। हालांकि, 2016 के विधानसभा चुनाव में उसका वोट शेयर कुछ कम जरूर हुआ, लेकिन पिछले साल के स्थानीय निकाय चुनावों में वह खुद को टीएमसी के मुकाबले दूसरे स्थान पर स्थापित करने में सफल रही। बीजेपी को पूरा भरोसा है कि दीदी की दबंगता और कांग्रेस एवं वामपंथियों के सिमटते जनाधार के दम पर वह इस बार अपनी स्थिति में ऐतिहासिक बदलाव करने में सक्षम रहेगी। समझिए जमीनी हालात क्या कहते हैं?

बंगाल में दीदी का दबदबा बरकार

बंगाल में दीदी का दबदबा बरकार

वैसे सरसरी तौर पर पश्चिम बंगाल में हुए पिछले चुनावों में टीएमसी के प्रदर्शन को देखते हुए लगता है कि बीजेपी की राह आसान नहीं है। 2014 में पार्टी ने राज्य में 42 में से 34 सीटें जीत ली थीं और 2016 के विधानसभा चुनावो में राज्य के 294 सीटों में से 211 पर उसके उम्मीदवार विजय रहे थे। इन दोनों चुनावों में ममता की पार्टी का वोट शेयर बढ़ा था। मसलन, 2009 के लोकसभा चुनाव में उसे 31.2% वोट मिले थे, तो 2014 में उसने 39.9% वोट हासिल की थी। 2011 के विधानसभा में पार्टी को 38.8% वोट मिले थे, जबकि 2016 में उसने इसे बढ़ाकर 45.6% कर लिया था। निकाय चुनावों में भी उसका प्रदर्शन दूसरी पार्टियों से कहीं ज्यादा बेहतर था। आज की जमीनी हालात की बात करें तो राज्य में बाहुबल और जनाधार दोनों ही आधार पर दीदी दूसरों से कहीं ज्यादा दबंग नजर आती हैं।

कांग्रेस-लेफ्ट के पिछड़ने से फायदा किसको?

कांग्रेस-लेफ्ट के पिछड़ने से फायदा किसको?

वैसे पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ चुनावों का विश्लेषण करें तो सबसे ज्यादा नुकसान में वामपंथी दल रहे हैं। उनके बाद कांग्रेस की लोकप्रियता का ग्राफ भी तेजी से नीचे गिरा है। जैसे-2016 में लेफ्ट को राज्य में 30.1% वोट मिले थे, लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव में वो 10 फीसदी गिरकर 20.1% तक पहुंच गया था। लोकसभा चुनाव की बात करें तो 2009 में इन पार्टियों को 33.1% वोट मिले थे, लेकिन 2014 तक आते-आते वह 22.7% तक पहुंच गया था। यानी वामपंथी दलों की लोकप्रियता राज्य में तेजी से घटती गई है और उनके मतदाता या तो बीजेपी में या तो टीएमसी की ओर जा चुके हैं। जहां तक कांग्रेस की बात है तो 2016 के चुनाव में उसका वोट शेयर 12.4% रहा, जबकि 2011 में उसने सिर्फ 9.1% वोट हासिल किए थे। लेकिन, जब बात लोकसभा चुनाव की आई, तो राज्य के मतदाताओं ने उससे मुंह मोड़ना शुरू कर दिया था। मसलन 2009 में उसे 13.4% वोट मिले थे, जो कि 2014 में गिरकर सिर्फ 9.6% ही रह गया था।

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बीजेपी का कैसे होगा बेड़ा पार?

बीजेपी का कैसे होगा बेड़ा पार?

आज की तारीख में बंगाल में एक बात साफ है। चुनावी लड़ाई सीधे-सीधे बीजेपी और टीएमसी के बीच है। इसलिए राहुल गांधी चाहे दीदी की जमीन पर उन्हें कुछ भी कहकर चले जाएं, ममता उन्हें बच्चा कहकर माफ करने में ही भलाई समझ रही हैं। क्योंकि, उन्हें चुनौती कांग्रेस या लेफ्ट से नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी से मिल रही है। टीएमसी सुप्रीमो हर एक राजनीतिक लड़ाई को सीधे मोदी से जोड़ रही हैं, ताकि राज्य में खुद को मोदी-विरोधी वोट का एकमात्र दावेदार के रूप में पेश कर सकें। उन्हें अंदाजा है कि अगर मोदी-विरोधी वोट का बंटाधार हुआ, तो कमल की संख्या बढ़नी निश्चित है।

दूसरी ओर बीजेपी को बालाकोट और ममता की कथित तुष्टिकरण की नीति पर विश्वास है, जिसके सहारे वह बहुसंख्यक मतदाताओं को अपने पाले में करने के सपने संजो रही है। पंचायत चुनाव के बाद तो यह बात और भी स्पष्ट हो चुकी है कि पार्टी ने कई इलाकों को कांग्रेस और लेफ्ट से झटक लिया है। आज की हालात में अगर दीदी की दबंगता के खिलाफ उसकी आक्रामक चुनावी रणनीति सटीक बैठ गई तो, वह टीएमसी को जोर का झटका दे दे तो इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होनी चाहिए। तथ्य यह भी है कि मोदी लहर में पार्टी ने कई चुनाव क्षेत्रों में 20% से अधिक वोट हासिल किए थे। ऐसे में इस बार वह यहां क्या गुल खिलाएगी अभी से इसका विश्लेषण करना चुनावी पंडितों के लिए भी आसान नहीं है।

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English summary
WEST Bengal:Will the BJP’s gambit rattle mamta in her bastion?
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