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पश्चिम बंगाल: क्या तथागत रॉय की वापसी से निकलेगा भाजपा की सत्ता का रास्ता ?

नई दिल्ली- करीब 5 साल बाद मेघालय के पूर्व गवर्नर तथागत रॉय की सक्रिय राजनीति में वापसी हो रही है। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले उनकी वापसी भाजपा के लिए ही नहीं, प्रदेश की राजनीति के लिए महत्ववूर्ण मानी जा रही है। 2015 में राज्यपाल बनने के बाद से वो 3 उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह संवैधानिक पद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। लेकिन, प्रदेश में चुनाव से कुछ महीने पहले अगर वे सक्रिय राजनीति में लौट रहे हैं तो इसके पीछे कोई न कोई सोच जरूर होगी।

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    तथागत रॉय की बंगाल वापसी के मायने ?

    तथागत रॉय की बंगाल वापसी के मायने ?

    आने वाले एक-दो दिनों में तथागत रॉय फिर से औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर लेंगे। अगर पश्चिम बंगाल में उनके पूर्व के सियासी करियर को देखें तो वह 2002 से 2006 तक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और 2002 से 2015 तक पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे हैं। ऐसे समय में जब राजनीतिक गलियारों में इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि ममता बनर्जी के मुकाबले बंगाल में भाजपा किसे अपना सीएम उम्मीदवार बनाएगी, उनका मेघालय छोड़कर आना इसी संभावना की ओर इशारा करता है। क्योंकि, पार्टी को दीदी के मुकाबले एक ऐसा चेहरा चाहिए जो उनकी राजनीतिक हैसियत और करिश्मे को चुनौती दे सके और बंगाल के लोगों को वह स्वीकार्य भी हो सके।

    यहां से पार्टी को कहां तक ले जा सकेंगे रॉय?

    यहां से पार्टी को कहां तक ले जा सकेंगे रॉय?

    हकीकत ये है कि जबसे रॉय बंगाल छोड़कर नॉर्थ-ईस्ट गए थे, तब से लेकर अबतक प्रदेश की राजनीति में भाजपा की हैसियत और दबदबे में आकाश और पाताल का अंतर आ चुका है। रॉय के समय में भाजपा को 5 फीसदी वोटरों का समर्थन प्राप्त था। लेकिन, 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़कर 40.64 हो चुका है और उसे 42 में से 18 लोकसभा सीटों में जीत मिली है। जबकि, सत्ताधारी टीएमसी सिर्फ 3 वोटों यानि 43.69 फीसदी से आगे थी। पार्टी को यह सफलता तब मिली जब दिलीप घोष के हाथों में प्रदेश की कमान है। ऐसे में सवाल उठेगा कि दिलीप घोष और मुकुल रॉय के बीच पार्टी के अंदर पहले से जारी खेमेबंदी में रॉय की एंट्री से पार्टी की अंदरूनी खींचतान पर रोक लगेगी या इसमें और इजाफा होने का डर है। ऊपर से राहुल सिन्हा, बाबुल सुप्रियो, लॉकेट चटर्जी, अर्जुन सिंह और स्वपन दासगुप्ता की मौजूदगी अलग है।

    दो लोकसभा चुनाव हार चुके हैं रॉय

    दो लोकसभा चुनाव हार चुके हैं रॉय

    इतना ही नहीं, रॉय के जाने के बाद से राज्य में भाजपा का प्रदर्शन तो लगातार बेहतर हुआ ही है, खुद रॉय का अपना चुनावी रिकॉर्ड भी कोई चमकता हुआ नहीं है। 2009 में उत्तरी कोलकाता से और 2014 के मोदी लहर में दक्षिण कोलकाता से वह लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। वैसे खुद को लेकर जारी सियासी अटकलों के बीच तथागत रॉय ने न्यूज18 से कहा है कि, 'जब एक बार मैं पार्टी में शामिल हो जाऊंगा, तब मैं कोई भी रोल निभाने के लिए तैयार हूं जो पार्टी मुझे सौंपेगी। मैं पार्टी की इच्छा के मुताबिक ही गवर्नर बना। अब मैं वही करूंगा जो वो मुझसे चाहेंगे.....यह बंगाल हो सकता है, यह राज्य के बाहर भी कहीं हो सकता है....' हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि, 'हालांकि, मैं मुख्य रूप से बंगाल पर फोकस करना चाहूंगा।'

    तथागत रॉय का गैर-राजनीतिक करियर

    तथागत रॉय का गैर-राजनीतिक करियर

    वैसे बंगाल की चुनावी राजनीति में रॉय का अबतक का चाहे जो भी रिकॉर्ड हो, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता ये है कि वह प्रदेश के सबसे शिक्षित राजनेताओं में से एक हैं। उन्होंने प्रतिष्ठित बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज, शिबपुर (अब IIEST) से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री ली। वो जादवपुर यूनिवर्सिटी में कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग विभाग के संस्थापक रह चुके हैं। जबकि, इसके पहले वो मेट्रो रेलवे, कोलकाता के साथ महाप्रबंधक, RITES, भारतीय रेलवे और मुख्य अभियंता, डिजाइन के रूप में काम कर चुके हैं। यानि पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए उनकी शख्सियत में कुछ ऐसी बातें हैं, जो 2011 में 'पोरिबोर्तन' का स्वाद चख चुके बंगाली मतदाताओं के बीच कोई नया गुल भी खिला सकता है।

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