सारी मर्यादा हुई तार-तार! किस गंभीर संवैधानिक संकट की ओर बढ़ रहा है पश्चिम बंगाल?
पश्चिम बंगाल बहुत ही बड़े संवैधानिक संकट की ओर बढ़ता दिख रहा है। यहां राज्य की चुनी हुई महिला मुख्यमंत्री के खिलाफ प्रदेश के राज्यपाल ने कलकत्ता हाइकोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर किया है।
पिछले एक दशक से ज्यादा समय से शायद ही पश्चिम बंगाल में कभी राजभवन और राज्य सरकार के ताल्लुकात बहुत ही सौहार्दपूर्ण रहे हों। लेकिन, पिछले कुछ महीनों में देश ने दोनों के संबंधों में गिरावट का जो स्तर देखा है, वह शायद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कभी नहीं देखा गया।

ममता के खिलाफ गवर्नर ने किया मानहानि का केस
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कुछ टीएमसी नेताओं के खिलाफ उनकी कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के विरोध में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जस्टिस कृष्ण राव गुरुवार को इसपर सुनवाई करने वाले हैं।
लेकिन, एक राज्यपाल ने प्रदेश की महिला मुख्यमंत्री पर जो आधारहीन आरोप लगाने दावे किए हैं, वह प्रदेश की बहुत ही चिंताजनक हालातों को बयां कर रहा है। बोस ने ममता के खिलाफ मानहानि का यह मुकदमा 28 जून को दाखिल किया है।
ममता ने किया महिलाओं के राजभवन जाने से डरने का दावा
क्योंकि, इससे एक दिन पहले सीएम ममता ने दावा किया था कि महिलाओं ने उनसे शिकायत की है कि राजभवन की गतिविधियों की वजह से वे वहां जाने से डरती हैं।
न्यूज एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबाकि 27 जून को प्रदेश सचिवालय में प्रशासनिक बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था, 'महिलाओं ने मुझे बताया है कि वे राजभवन में हुई हालिया घटनाओं की वजह से वहां जाने से डरती हैं।'
गलत और बदनामी वाली धारणाएं न बनाएं- राज्यपाल
सीएम की इस टिप्पणी पर राज्यपाल ने कहा था कि जनप्रतिनिधियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे 'गलत और बदनामी वाली धारणाएं' न बनाएं।
एक अस्थायी महिला कर्मचारी ने राज्यपाल पर लगाया था आरोप
इससे पहले बीते 2 मई को लोकसभा चुनावों के दौरान राजभवन की एक अस्थाई महिला कर्मचारी ने राज्यपाल के खिलाफ छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। इसके बाद कोलकाता पुलिस ने इसकी तहकीकात शुरू की थी।
संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत पद पर रहते हुए राज्यपाल के खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं शुरू की जा सकती। ममता ने जो कुछ कहा है वह उस महिला के आरोपों के संदर्भ में ही जोड़कर देखा जा रहा है।
संदेशखाली बवाल के बीच रिपोर्ट हुई थी राजभवन वाली घटना
बहुत ही बड़ा संयोग ये भी है कि जिस समय 2 मई की घटना सामने आई थी, उस समय टीएमसी सरकार संदेशखाली में पार्टी के स्थानीय नेता शाहजहां शेख (बाद में पार्टी से निकालना पड़ा) के खिलाफ पार्टी की अनेकों महिला कार्यकर्ताओं के यौन उत्पीड़न और जमीन हड़पने के आरोपों में घिरी हुई थी। विपक्षी भाजपा ने इसे बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था।
राज्यपाल ने वित्तीय संकट का भी किया है दावा
अभी हाल ही में राज्यपाल ने यह भी दावा किया है कि बंगाल में 'वित्तीय संकट की स्थिति' है। उन्होंने कैबिनेट की आपात बैठक बुलाकर 'श्वेत पत्र' जारी करने को भी कहा था।
बंगाल में सीधे दखल क्यों नहीं दे रहा है केंद्र?
सवाल है कि राज्यपाल के खिलाफ राज्य सरकार और सीधे मुख्यमंत्री की ओर से जो आरोप लगाए जा रहे हैं, उसपर केंद्र सरकार ध्यान क्यों नहीं दे रही है? अगर ममता बनर्जी और उनकी सरकार के दावों और आरोपों में जरा भी दम है, तो फिर आनंद बोस को राजभवन में बनाए रखने की क्या मजबूरी है?
ममता केंद्र से समाधान निकालने की कोशिश क्यों नहीं कर रहीं?
अगर मुख्यमंत्री अपने दावों और आरोपों को लेकर इतनी गंभीर हैं तो वह सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से बात करके कोई समाधान निकालने की कोशिश क्यों नहीं कर रहीं?
ये कैसी लाचारी?
लेकिन, अगर राज्यपाल जैसे संवैधानिक और मर्यादित पद की प्रतिष्ठा जानबूझकर एक दूसरे संवैधानिक पद पर बैठीं मुख्यमंत्री के द्वारा तार-तार की जा रही है तो केंद्र के पास दूसरे संवैधानिक विकल्प भी मौजूद हैं। लेकिन, सवाल है कि फिर उसे इस्तेमाल नहीं कर पाने की उसकी क्या मजबूरी है? क्योंकि, दो संवैधानिक संस्थाओं के टकराव से राज्य बहुत ही बड़े संवैधानिक संकट में फंस सकता है, जहां संविधान के अनुसार शासन चलाना मुश्किल हो सकता है!












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