क्या है बंगाल की लड़ाई में 'मतुआ समुदाय' का महत्त्व, TMC-BJP दोनों डाल रहे हैं डोरे

West Bengal assembly elections 2021:ऐसे समय में जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल के 'मतुआ समुदाय' (Matua community)को अपने साथ एकजुट रखने के लिए सारे सियासी घोड़े छोड़ रखे हैं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करना नहीं छोड़ा है। गौर करने वाली बात ये है कि भाजपा पर इस समुदाय के नेता इसी कानून को जल्द लागू करने का दबाव बनाए हुए हैं। लेकिन, सोमवार को रानाघाट में मुख्यमंत्री ने यह कहकर कि इस कानून के लागू होते ही यह समुदाय अपनी 'जमीन और पहचान दोनों खो देंगे', उनके मन में उस कानून को लेकर आशंका पैदा करने की कोशिश की है, जिसकी वो दशकों से मांग कर रहे हैं। जाहिर है कि मतुआ वोट बैंक भाजपा और तृणमूल दोनों के लिए अहम है। दोनों की उसपर नजरें भी हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में ये भाजपा के पाले में झुके दिखे थे तो अब ममता नया पैंतरा देने की कोशिश कर रही हैं।

'मतुआ समुदाय' को 'ममता' का पाठ

'मतुआ समुदाय' को 'ममता' का पाठ

नागरिकता संशोधन कानून(CAA) का शुरू से विरोध कर रहीं ममता बनर्जी ने सोमवार को मतुआ समुदाय (Matua community)को इस कानून के बारे में कुछ इस तरह से समझाने की कोशिश की- 'मैं अपने मतुआ भाइयों और बहनों से कह रही हूं......आप बंगाल में कितने समय से रह रहे हैं? आप इस सरकार में कुशल और सुरक्षित हैं। मतुआ तो पहले से ही नागरिक हैं। तब, बीजेपी नागरिकता बिल को 'मोआ मिठाई' (बंगाल की एक मिठाई) की तरह (आपको) क्यों खिलाएगी। नागरिकता विधेयक लागू होगा और आपके पास कोई जमीन और कोई पहचान नहीं बचेगी।' उन्होंने यहां तक दावा किया कि जब तक टीएमसी सत्ता में है, इस राज्य में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को बीजेपी को गैर-नागरिक घोषित करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। यानि टीएमसी नेता नागरिकता संशोधन कानून पर मतुआ को एक अलग ही पाठ पढ़ा रही हैं, जो कि भाजपा के मंसूबों पर पलीता लगाने की कोशिश दिख रही है।

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    अमित शाह फिर कर सकते हैं मतुआ नेताओं से मुलाकात

    अमित शाह फिर कर सकते हैं मतुआ नेताओं से मुलाकात

    इसके ठीक उलट केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के 30 जनवरी को बनगांव(Bongao) जाने का कार्यक्रम है, जहां वह मतुआ समुदाय के मुख्यालय में भी जा सकते हैं। माना जा रहा है कि इस दौरान वो मतुआ समुदाय के उन नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं, जो अब तक नागरिकता संशोधन कानून नहीं लागू किए जाने को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यानि तृणमूल नेत्री जो कुछ कह रही हैं, हालात उसके विपरीत नजर आ रहे हैं। यानि टीएमसी की परेशानी ये है कि वो ना तो सीएए के लिए हामी भर सकती है और ना ही मतुआ वोट बैंक को ही यूं ही बीजेपी के पल्ले में जाते देख सकती है। सीएए लागू करने में हो रही देरी की वजह से भाजपा के लिए भी मतुआ समुदाय को अपने साथ बनाए रखने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। पिछले 6 नवंबर को भी अमित शाह एक मतुआ परिवार के घर जाकर भोजन कर चुके हैं और पार्टी समाज से सीएए लागू करने को लेकर धैर्य रखने को कह रही है।

    सीएए लागू करने के लिए केंद्र पर है मतुआ समाज का दबाव

    सीएए लागू करने के लिए केंद्र पर है मतुआ समाज का दबाव

    गौरतलब है कि बनगांव के भाजपा सांसद शांतनु ठाकुर (Shantanu Thakur) मतुआ समाज के एक प्रमुख नेता हैं। वह केंद्र सरकार पर सीएए लागू करने को लेकर लगातार दबाव बनाए हुए है। पिछले दो महीनों में दो-दो चिट्ठियां भी लिख चुके हैं। पिछली यात्रा के दौरान गृहमंत्री ने भरोसा दिया था कि कोरोना वैक्सीन लगने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इसे लागू किया जाएगा और उन्होंने देरी का ठीकरा भी कोविड-19 पर ही फोड़ा था। इसके उलट ममता बनर्जी अब मतुआ समुदाय को उनके लिए किए काम गिनाने में लग गई हैं। नदिया (Nadia) जिले की सभा में उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने मतुआ समाज को पानी, शिक्षा और बिजली मुहैया करवाई है।

    बोरो मां से पीएम मोदी ने लिया था आशीर्वाद

    बोरो मां से पीएम मोदी ने लिया था आशीर्वाद

    बंगाल की सियासी लड़ाई में मतुआ समाज की अहमियत समझनी हो तो ऐसे समझिए कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनगांव (Bongao) सीट के ठाकुरनगर से ही प्रचार अभियान की शुरुआत की थी। इससे पहले उन्होंने तब 100 वर्षीय बीनापानी देवी से मिलकर उनका आशीर्वाद भी लिया था, जिन्हें मतुआ समाज के लोग प्यार से बोरो मां कहकर बुलाते थे। वह इस समाज की कुलमाता थीं और भाजपा सांसद शांतनु ठाकुर (Shantanu Thakur) उन्हीं के पोते हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा का यह मंत्र काम कर गया था और वह पहली बार बनगांव सीट जीत गई। जाहिर है कि वह किसी भी सूरत में मतुआ समाज अपने साथ बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी, भले ही बोरो मां अब इस दुनिया में नहीं हों।

    मतुआ समुदाय कितना बड़ा वोट बैंक?

    मतुआ समुदाय कितना बड़ा वोट बैंक?

    मतुआ पूर्वी बंगाल (या पूर्वी पाकिस्तान) या बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी हैं। मतुआ समाज नामासुद्रा ( Namasudras ) के तौर पर भी जाने जाते हैं, जो कि एक अनुसूचित जाति है। बंगाल की अनुसूचित जातियों में इनकी आबादी करीब 17.4 फीसदी है, जो कि राज्य की दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति जनसंख्या है। वैसे समुदाय के लोगों का दावा है कि उनकी जनसंख्या करीब 3 करोड़ है। बता दें कि राज्य में अनुसूचित जाति की कुल जनसंख्या 1.8 करोड़ है। लेकिन, इतना तय है कि कम से कम 6 संसदीय क्षेत्रों में ये अच्छी-खासी तादाद में हैं। भाजपा के लिए यह कितने मायने रखते हैं, इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि राज्य की 42 लोकसभा सीटों में 10 अनुसूचित जातियों के लिए रिजर्व हैं, जिनमें से भाजपा 4 सीटें पिछली बार जीती थी। ये हैं- कूचबेहार, जलपाईगुड़ी, बिष्णुपुर और बनगांव। वैसे मतुआ समुदाय मूल रूप से उत्तर और दक्षिण 24 परगना में बसा हुआ है, लेकिन नदिया, हावड़ा, कूचबेहार, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर और मालदा में भी इनकी काफी जनसंख्या मौजूद है।

    भारत में मतुआ समाज का सियासी इतिहास

    भारत में मतुआ समाज का सियासी इतिहास

    मतुआ समाज शुरू में कांग्रेस समर्थक था। 1977 के बाद वह लेफ्ट फ्रंट के साथ चला गया, लेकिन जल्द ही नागरिकता और जमीन के अधिकारों के मुद्दे पर इनका वामपंथियों से मोहभंग हो गया। जब ममता बनर्जी लेफ्ट फ्रंट के खिलाफ संघर्ष कर रही थीं तो उन्हें बोरो मां का साथ मिला, जिन्होंने टीएमसी सुप्रीमो को मतुआ महासभा का मुख्य संरक्षक बना दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में बोरो मां के एक बेटे कपिल कृष्णा ठाकुर बनगांव सीट से टीएमसी के टिकट पर चुनाव जीत गए। उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी ममता ठाकुर वहीं से पार्टी की सांसद चुनी गईं। लेकिन, बोरो मां के दूसरे बेटे मंजुल कृष्णा ठाकुर का परिवार पहले ही भाजपा के साथ आ चुका था। मंजुल पहले ममता सरकार में मंत्री भी रह चुके थे और शांतनु ठाकुर उन्हीं के बेटे हैं।

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