West Bengal Election: क्या प्रशांत किशोर के बिना भी जीतेगी ममता बनर्जी? ‘PK फैक्टर’ TMC के लिए कितना जरूरी
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में जब भी चुनाव की आहट होती है, तो हवाओं में 'खेला होबे' की गूंज सुनाई देने लगती है। साल 2026 का विधानसभा चुनाव करीब है और बंगाल की सियासी बिसात बिछ चुकी है। लेकिन इस बार का मुकाबला 2021 से थोड़ा अलग है। सतह पर तो वही पुरानी लड़ाई दिख रही है, ममता बनर्जी बनाम नरेंद्र मोदी, तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाम भाजपा। लेकिन पर्दे के पीछे एक बहुत बड़ा नाम गायब है और वो नाम है 'प्रशांत किशोर' यानी पीके।
सवाल बड़ा है क्या रणनीति के चाणक्य कहे जाने वाले प्रशांत किशोर के बिना ममता बनर्जी अपना किला बचा पाएंगी? क्या आई-पैक (I-PAC) आज भी उतनी ही असरदार है जितनी पीके के नेतृत्व में थी? 'PK फैक्टर' इस चुनाव को दिलचस्प भी बनाता है और अनिश्चित भी। आइए समझने की कोशिश करते हैं बंगाल के इस 'सियासी पावर गेम' को।

बंगाल में चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को होने हैं, जबकि नतीजे 4 मई को आएंगे। ममता बनर्जी ने पहले ही बड़ा दावा कर दिया है, 226 से ज्यादा सीटें जीतने का। पार्टी 294 में से 291 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और तीन सीटें सहयोगी दल को दी गई हैं। भवानीपुर से ममता बनर्जी खुद मैदान में होंगी, जहां उनका सीधा मुकाबला भाजपा के सुवेंदु अधिकारी से है।
प्रशांत किशोर का 'मैजिक' और 2021 की वो जीत
2021 के चुनाव को याद कीजिए। भाजपा पूरी ताकत झोंक चुकी थी, 'अबकी बार 200 पार' का नारा गलियों में गूंज रहा था। उस वक्त टीएमसी बैकफुट पर दिख रही थी। तब प्रशांत किशोर ने मोर्चा संभाला। उन्होंने टीएमसी को सिर्फ एक राजनीतिक दल से बदलकर एक 'कॉर्पोरेट इलेक्शन मशीन' बना दिया।
पीके ने 'दीदी के बोलो' (Didi Ke Bolo) जैसा अभियान शुरू किया, जिसने आम जनता की शिकायतों को सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचाया। उन्होंने डेटा और भावना का ऐसा मेल तैयार किया कि ममता बनर्जी की छवि 'बंगाल की बेटी' के रूप में निखर कर आई। नतीजा? भाजपा 77 सीटों पर सिमट गई और ममता बनर्जी 213 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत से वापस आईं। पीके ने चुनाव से पहले ही कह दिया था कि भाजपा 100 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी, और उनकी ये भविष्यवाणी सच साबित हुई।
TMC के एक नेता ने बिना नाम लिए दावा किया था कि 2021 का चुनाव प्रशांत किशोर के लिए "मीठा बदला" था। BJP ने पूरी ताकत झोंकी थी PM मोदी, अमित शाह, केंद्रीय मंत्री, सब बंगाल में थे। लेकिन TMC ने 294 में से 213 सीटें जीतीं। 2021 में चुनाव परिणाम आए और TMC ने जीत दर्ज की और प्रशांत किशोर ने सबको चौंकाते हुए न केवल I-PAC बल्कि पूरी चुनाव रणनीतिकारी भूमिका छोड़ने का ऐलान कर दिया।

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2026 का रण: बिना सेनापति के मैदान में टीएमसी?
आज स्थिति बदल चुकी है। प्रशांत किशोर अब बिहार की राजनीति में अपनी 'जन सुराज' पार्टी के साथ व्यस्त हैं। हालांकि, उनकी बनाई संस्था I-PAC अभी भी टीएमसी के साथ जुड़ी हुई है और प्रतीक जैन इसके रणनीतिक कार्यों को देख रहे हैं, लेकिन पीके का वो पर्सनल टच अब गायब है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या आई-पैक बिना पीके के उसी आक्रामकता और सटीकता के साथ काम कर पाएगी? 2026 का चुनाव केवल सीटों का गणित नहीं है, बल्कि यह ममता बनर्जी की अपनी राजनीतिक सूझबूझ की परीक्षा भी है। क्या 'दीदी' अब खुद ही अपनी सबसे बड़ी रणनीतिकार बन चुकी हैं?
TMC, प्रशांत किशोर और I-PAC: बंगाल की चुनावी राजनीति का पूरा खेल
🔷 शुरुआत कैसे हुई - 2019 का टर्निंग पॉइंट
जब TMC के नेताओं ने 2019 में प्रशांत किशोर से संपर्क किया, तो उनकी टीम को पता था कि यह कोई आसान काम नहीं होगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने बंगाल में 18 सीटें जीती थीं - यह TMC के लिए एक खतरे की घंटी थी। BJP की इस नाटकीय बढ़त ने ममता बनर्जी को I-PAC की मदद लेने पर मजबूर किया, क्योंकि वोट शेयर में थोड़ी और बढ़त भी 2021 में BJP की जीत करा सकती थी।
6 जून 2019 को अभिषेक बनर्जी प्रशांत किशोर के साथ हावड़ा के नबान्ना भवन में ममता बनर्जी से मिलने गए। यह TMC और I-PAC के बीच एक सफल साझेदारी की शुरुआत थी।
🔷 I-PAC ने बंगाल में किया क्या - ग्राउंड लेवल काम
I-PAC की पहली टीम जुलाई 2019 में कोलकाता में अपना दफ्तर स्थापित करने के लिए पहुंची। TMC के अभियान पर किशोर की छाप हर जगह थी। "दीदी को बोलो" (Tell Didi) और "दुआरे सरकार" (Government at Your Doorstep) जैसी जन-केंद्रित योजनाएं, और आकर्षक नारे यह सब किशोर की खासियत थी।
300 से अधिक I-PAC के मेंबर ने राज्य भर में, जिलों से लेकर ब्लॉक और गांवों तक, जमीनी हकीकत जानने के लिए कैंप किया। "दीदी को बोलो" अभियान के जरिए लोग फोन या ईमेल से अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते थे।
I-PAC की खासियत और हथियार
- नैरेटिव इंजीनियरिंग - "बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय" (बंगाल अपनी बेटी को चाहता है) का नारा तब लॉन्च हुआ जब दिल्ली से BJP नेता बंगाल की सांस्कृतिक विरासत की बात करने लगे। इससे 'बाहरी बनाम भीतरी' का जो नैरेटिव बना, वह जनता के दिल को छू गया।
- योजनाओं को चुनावी वादों में बदलना - I-PAC की हर कैंपेन की एक खास पहचान रही है - बिहार में 'Nitish Ke 7 Nishchay', पंजाब में 'Captain De 9 Nukte' और आंध्र में 'Navratnalu' की तरह मतदाताओं की सबसे ज्वलंत समस्याओं पर ठोस वादे। बंगाल में यही फॉर्मूला "दीदी-R 10 Ongikar" (दीदी के 10 वादे) के रूप में सामने आया।
- डेटा और टेक्नोलॉजी - I-PAC की डेटा और टेक टीम सभी कैंपेन डेटा का विश्लेषण करती है, जानती है कि कौन सी तरफ आ रहे हैं, कौन अभी दूर हैं। डिजिटल मीडिया टीम सोशल मीडिया और पार्टी का खुद का ऐप चलाती है।
🔷 PK के जाने के बाद - I-PAC का नया अवतार
यहां से कहानी बहुत दिलचस्प होती है। 2021 की जीत के बाद TMC ने I-PAC के साथ अपनी साझेदारी 2026 के अगले विधानसभा चुनाव तक बढ़ा ली। I-PAC लेकिन PK खुद इसमें नहीं थे।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर की टीम पार्टी के दो गुटों के बीच फंस गई एक ममता के करीबी पुराने नेता, और दूसरी तरफ उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का गुट। तनाव तब से सुलग रहा था जब से I-PAC की सलाह पर अभिषेक को TMC का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया था। प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी को मैसेज किया कि I-PAC बंगाल, त्रिपुरा और मेघालय में TMC के साथ काम नहीं करना चाहता। लेकिन I-PAC का काम जारी रहा वो भी प्रशांत किशोर के बिना।
जब प्रशांत किशोर ने I-PAC छोड़ा, तो प्रतीक जैन ने कमान संभाली। उनकी भूमिका अब सिर्फ चुनाव से आगे सरकारी संदेश, सार्वजनिक योजनाओं की प्राथमिकता, और उम्मीदवारों के चयन तक हो गई थी।
2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में I-PAC के एक शीर्ष अधिकारी ने स्वीकार किया कि "जब भी हम किसी परिस्थिति में फंसते हैं, हम बिहार में PK से मिलने जाते हैं। बंगाल के लोकसभा कैंपेन को आकार देने के लिए हम बिहार में PK से मिले और उन्होंने हमारा मार्गदर्शन किया। वे अभी भी हमारे मेंटर हैं।" 2024 के लोकसभा चुनाव में I-PAC ने 8 targeted modules के जरिए 9 करोड़ से अधिक लोगों से सीधे संपर्क किया और TMC ने 42 में से 29 सीटें जीतीं।
जब ममता बनर्जी ने 4 जून की जीत के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की, तो उन्होंने प्रतीक जैन की टीम का खास जिक्र किया - "मैं I-PAC की पूरी टीम को धन्यवाद देती हूं" - और साफ किया कि यह "नई टीम" है और "वो दूसरा आदमी" (किशोर) अब उनके साथ नहीं है।
🔷 Prashant Kishor के 'फॉर्मूले' के बिना ममता की जीत संभव या मुश्किल?
I-PAC की टीम इस चुनाव में भी ममता बनर्जी के साथ है। लेकिन ममता बनर्जी की टीएमसी के सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं।
- 15 साल की सत्ता-विरोधी लहर-2026 में TMC के खिलाफ 15 साल की एंटी-इनकंबेंसी, भ्रष्टाचार के आरोप, महिला सुरक्षा और रोजगार के मुद्दे प्रमुख हैं।
- हिंदू ध्रुवीकरण: बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों और बंगाल में अवैध घुसपैठ जैसे मुद्दों से हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण BJP के पक्ष में हो सकता है। यह काउंटर करना इस बार कठिन है।
- ED रेड का नुकसान: I-PAC के ऑफिस डेटा और strategy documents के बारे में अनिश्चितता 2026 कैंपेन को कमजोर कर सकती है।
🔷 I-PAC पर रेड: क्या रणनीति चुराने की कोशिश हुई?
चुनाव से ठीक पहले जनवरी 2026 में आई-पैक के दफ्तरों पर ईडी (ED) की छापेमारी ने इस लड़ाई को और दिलचस्प बना दिया है। जनवरी 2026 में ED ने प्रतीक जैन के कोलकाता स्थित घर और I-PAC के ऑफिस पर छापे मारे। यह कोयला तस्करी मामले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच का हिस्सा बताया गया।
ममता बनर्जी ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार और अमित शाह पर आरोप लगाया कि यह छापेमारी भ्रष्टाचार की जांच के लिए नहीं, बल्कि टीएमसी की चुनावी रणनीति और उम्मीदवारों की लिस्ट चुराने के लिए की गई है।
ममता का यह दांव मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। उन्होंने इसे 'बंगाली अस्मिता' और 'दिल्ली के हस्तक्षेप' से जोड़ दिया है। बंगाल की राजनीति में जब भी बाहरी बनाम भीतरी की लड़ाई हुई है, ममता को फायदा मिला है। इस बार भी वह इस रेड को 'राजनीतिक प्रतिशोध' बताकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रही हैं।
क्या पीके फैक्टर के बिना टीएमसी कमजोर होगी?
इसका जवाब इतना सरल नहीं है। प्रशांत किशोर ने टीएमसी को एक 'सिस्टम' दे दिया है। बूथ लेवल एजेंट (BLA) को एक्टिव करना, 'लक्ष्मी भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाओं का प्रचार करना और घर-घर तक पहुंच बनाना-यह सब अब टीएमसी के डीएनए में शामिल हो चुका है।
लेकिन, पीके की कमी तब खलती है जब संकट का समय आता है। पीके 'क्राइसिस मैनेजमेंट' के उस्ताद थे। जब कोई बड़ा विवाद होता था, तो वह रातों-रात नैरेटिव (विमर्श) बदलने की क्षमता रखते थे। अब देखना यह होगा कि क्या आई-पैक का नया नेतृत्व किसी भी विपरीत परिस्थिति में ममता बनर्जी को वही सुरक्षा कवच प्रदान कर पाएगा।
बीजेपी का बदला हुआ तेवर: '200 पार' नहीं, अब टारगेट 170
पिछले चुनाव में भाजपा ने '200 पार' का भारी-भरकम नारा दिया था, जो उन पर ही भारी पड़ गया। इस बार भाजपा फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। अमित शाह ने इस बार कोलकाता की रैली में बहुत ही सधे हुए अंदाज में 170 सीटों का लक्ष्य रखा है। भाजपा का पूरा जोर इस बार 'एंटी-इंकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर है।
भाजपा को लगता है कि 15 साल के टीएमसी शासन के बाद जनता बदलाव चाहती है। संदेशखाली जैसी घटनाएं और रोजगार के मुद्दे भाजपा के लिए हथियार बन रहे हैं। भाजपा इस बार 'डर से आजादी' और 'सुशासन' के नारे के साथ शहरी और हिंदू बहुल इलाकों में ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है।

मैदान के दो सबसे बड़े योद्धा: ममता बनाम सुवेंदु
2026 का सबसे दिलचस्प मुकाबला फिर से भवानीपुर और नंदीग्राम के इर्द-गिर्द सिमट सकता है। सुवेंदु अधिकारी, जो कभी ममता के खास सिपहसालार थे, अब उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं। सुवेंदु ने 2021 में नंदीग्राम में ममता को हराकर अपनी ताकत दिखाई थी।
ममता बनर्जी ने इस बार पहले ही घोषणा कर दी है कि वह भवानीपुर से चुनाव लड़ेंगी और उन्होंने भाजपा को चुनौती दी है कि टीएमसी इस बार 226 से ज्यादा सीटें जीतेगी। ममता का आत्मविश्वास उनके उम्मीदवारों के चयन में भी दिखता है, 52 महिलाएं और 95 एससी/एसटी उम्मीदवारों को टिकट देकर उन्होंने एक बड़े वोट बैंक को साधने की कोशिश की है।
2026 का असली 'खेला'
ममता बनर्जी के लिए PK की व्यक्तिगत रचनात्मकता और "Midas Touch" के बिना 2026 जीतना नामुमकिन नहीं, लेकिन निश्चित रूप से ज्यादा मुश्किल है। I-PAC ने डेटा, ग्राउंड मैनेजमेंट और डिजिटल स्ट्रेटजी में खुद को साबित किया है। लेकिन PK वह "big picture narrative genius" थे जो BJP जैसी विशाल मशीन के खिलाफ एक ऐसी भावनात्मक लहर बना सकते थे जो हर जाति, वर्ग और इलाके को छू ले। 2026 का असली इम्तिहान यह है कि I-PAC 15 साल की की एंटी-इंकम्बेंसी के खिलाफ वो नैरेटिव खड़ा कर पाए जो कभी PK ने 2019 की हार के बाद महज 2 साल में खड़ा किया था।
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 इस बात का फैसला करेगा कि क्या ममता बनर्जी का 'कल्याणकारी मॉडल' (Welfare Model) भाजपा के 'विकास और ध्रुवीकरण' के मॉडल पर भारी पड़ता है। प्रशांत किशोर भले ही पर्दे पर न हों, लेकिन उनकी बनाई रणनीति की परछाई अभी भी टीएमसी के हर कदम पर दिखती है।
अंततः, चुनाव जनता के भरोसे पर जीता जाता है। ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी 'जमीनी नेता' की छवि है। अगर वह जनता को यह समझाने में सफल रहीं कि भाजपा एक 'बाहरी' पार्टी है और आई-पैक ने बिना पीके के भी डेटा का सही इस्तेमाल किया, तो 226 सीटों का उनका सपना हकीकत बन सकता है। लेकिन अगर भाजपा ने भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के मुद्दे पर टीएमसी को घेर लिया, तो 2026 में बंगाल की सत्ता का समीकरण बदल भी सकता है।
यह चुनाव सिर्फ एक मुख्यमंत्री चुनने के लिए नहीं है, यह बंगाल की आत्मा और भविष्य की दिशा तय करने वाला महासंग्राम है। और जैसा कि बंगाल में कहा जाता है- "एबार खेला आरो जोमबे!" (इस बार खेल और जमेगा!)
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