पायल का 'पराक्रम' : डॉक्टरों ने खड़े किए हाथ, हौसला नहीं टूटा, प्रेरणा बनी ये दिव्यांग किशोरी
पश्चिम बंगाल में एक दिव्यांग किशोरी ने तमाम अड़चनों के बावजूद शानदार छलांग लगाई है। 10वीं कक्षा की परीक्षा में टॉपर बनी पायल करोड़ों युवाओं की प्रेरणा हैं। West Bengal Board Class X topper Balurghat divyaang payel pal
कोलकाता, 29 अगस्त : अनुपम काव्यात्मक कृति रश्मिरथी के एक अंश में कवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है 'मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।' ये पंक्ति पश्चिम बंगाल की दिव्यांग किशोरी ने साबित कर दिखाई है। 15 साल की किशोरी पायल पाल ने तमाम बाधाओं को मात दी। 10वीं की परीक्षा में टॉपर बनी ये लड़की करोड़ों ऐसे लोगों के प्रेरणा है जो अड़चनों के कारण हताश होते हैं और प्रयास करना भी छोड़ देते हैं।

लाखों में एक ! 15 साल की किशोरी का कमाल
साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने 117 साल पहले 'एकला चलो रे...' लिखा लेकिन शायद उन्हें भी यह भान नहीं रहा होगा कि उनकी इस पंक्ति से प्रेरणा पाकर एक 15 साल की किशोरी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाएगी। इस प्रेरक दास्तां में बयान ऐसी जीवट किशोरी का जो खुद चल नहीं सकती, लेकिन छलांग ऐसी लगाई कि करोड़ों लोगों को प्रेरणा मिल रही है।

बच्ची का धैर्य और दृढ़ संकल्प
15 वर्षीय किशोरी का नाम पायल पाल है। जब पायल पाल ने इस साल पश्चिम बंगाल बोर्ड की 10वीं कक्षा की परीक्षा में अपने स्कूल में टॉप किया, तो सुर्खियों में आईं। इस बच्ची का धैर्य और दृढ़ संकल्प इस बात का शानदार उदाहरण है कि विपत्तियों पर काबू पाना इंसान के वश में है। शायद ऐसे ही किसी लम्हे पर दिनकर ने लिखा;
सच है विपत्ति जब आती है
कायर को ही दहलाती है
सूरमा नहीं विचलित होते
क्षण एक नहीं धीरज खोते
विघ्नों को गले लगाते हैं
कांटों में राह बनाते हैं

रवींद्रनाथ की घरती पर 'पराक्रमी पायल'
पायल भी उसी धरती से आती हैं जिसे आज भौगोलिक दृष्टिकोण से गुरुदेव की कर्मभूमि- पश्चिम बंगाल कहा जाता है। उत्तर दिनाजपुर के बालुरघाट जिले में कुर्मैल सोनौला हाई स्कूल में पढ़ने वाली पायल ने बोर्ड परीक्षा में 80 प्रतिशत अंक हासिल किए। पायल का सपना एक प्रशासनिक अधिकारी बनने का है ताकि वह गरीबों की सेवा कर सकें।
यहां देखें 'पराक्रमी पायल' की तस्वीर--

बड़े होकर गरीबों की सेवा करेंगी
दिव्यांग पायल पाल की सफलता पर न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में पायल के हवाले से कहा गया, 'मैंने अभी-अभी अपने लक्ष्य की पहली बाधा पार की है। मेरे पास आगे एक लंबा रास्ता है। आज मैंने जो कुछ भी हासिल किया है वह मेरी मां की वजह से है।'' उन्होंने कहा कि वह गरीबों की सेवा के लिए सिविल सेवा में शामिल होना चाहेंगी। पायल बालुरघाट जिला मुख्यालय रायगंज के एक स्कूल में पढ़ना चाहती हैं।

डॉक्टरों ने खड़े किए हाथ, पायल का हौसला जीता
पायल के पिता डिगेन पाल बालुरघाट के बाजार में एक छोटी सी सिलाई की दुकान चलाते हैं। उन्होंने बताया, बचपन से ही वह चल नहीं सकती। चार लोगों का हमारा परिवार मेरी छोटी सी दुकान से होने वाली कमाई पर निर्भर है। हम उसे कई डॉक्टरों के पास ले गए, लेकिन सभी ने कहा कि वह अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएगी। पायल के पिता बताते हैं कि डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए, लेकिन उनकी बेटी ने पढ़ने की ठान ली थी और कमाल कर दिखाया।

हायर स्टडीज में भूगोल पढ़ने का सपना
पायल के दृढ़ संकल्प पर मां प्रभाती बताती हैं कि उसके पैर के अलावा पायल के हाथ भी कमजोर हैं। उन्होंने कहा, पायल अपने हाथ का उपयोग करके केवल लिख सकती है। परिवार ने पायल के सपनों को पूरा करने में कैसे साथ दिया ? इस पर प्रभाती बताती हैं कि पायल को गोद में उठाकर स्कूल और ट्यूशन क्लास में ले जाती थीं। पायल ने लाइफ साइंस और भूगोल में 95-95 नंबर हासिल किए। गणित में पायल को 80 अंक मिले। हायर स्टडीज के सवाल पर पायल कहती हैं कि वह आगे की पढ़ाई भूगोल में करना चाहती हैं।

होनहार बिटिया के पिता को सरकार से मदद की आस
पिता डिजेन अपनी बेटी के परिणामों से उत्साहित हैं, लेकिन साथ ही उसकी भावी की पढ़ाई को लेकर चिंतित भी हैं। उन्होंने कहा, छोटी दुकान से होने वाली आमदनी से अपने परिवार के लिए भोजन जुटाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। पायल जिला मुख्यालय रायगंज के एक बेहतर स्कूल में पढ़ना चाहती हैं। भावी आर्थिक योजनाओं को लेकर चिंतित पिता कहते हैं, "मुझे नहीं पता कि मैं खर्चों का प्रबंधन कैसे करूंगा ?" उन्होंने कहा, वे पायल की पढ़ाई के लिए स्थानीय प्रशासन से मदद मांगेंगे। 'वह शत-प्रतिशत विकलांग है... जिला प्रशासन की मदद मांगूंगा ताकि पायल उच्च शिक्षा हासिल कर सके।'












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