‘सोशल मीडिया से हमें जावेद की लाश का पता चला’

‘सोशल मीडिया से हमें जावेद की लाश का पता चला’

"मैं रो नहीं रही हूँ बल्कि मैं तो दूल्हे बेटे के लिए गा रही हूँ. मेरा दूल्हा मुझसे छीना गया. आ मेरे बेटे. आए मेरे गुलाब तुझ पर मेरी जान निछावर हो. तुम क्यों छोड़कर भाग गए."

रोते-बिलखते यह बात जावेद अहमद डार की माँ आशिया पूछ रही थीं.

आशिया अपने दो मंज़िला मकान के एक कमरे में निढाल बैठी हैं. उनके इर्द-गिर्द कई महिलाएं हैं जो उन्हें दिलासा देने और उन्हें चुप कराने की कोशिशें कर रही हैं.

दूसरे कोने में जावेद की एक बहन शबरोज़ चीख़-चीख़कर अपने भाई के लिए आंसू बहा रही हैं. मैं जब उनके पास गया तो वो ज़ार-ज़ार रोने लगीं.

वो कहती हैं, "हमें ये जिंदगी नहीं चाहिए. हमारा भाई हमसे बहुत प्यार करता था, जिन्होंने हमारे भाई को हमसे छीना उनका भी ऐसा ही हश्र होना चाहिए, उनके साथ भी ख़ुदा ऐसा ही करे. जिस पार्टी ने भी उनको मारा उनसे कहना कि इनके घरवाले कह रहे हैं कि हमें मार डालो. वो ग़द्दार नहीं था. हमें अपने भाई की पवित्रता का पता है कि वह कितना पवित्र था. उनके पाक और साफ़ होने का सर्टिफिकेट हमारे पास है."


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पांच साल पहले पुलिस में गए थे

गुरुवार को 24 साल के जावेद अहमद डार का संदिग्ध चरमपंथियों ने भारत- प्रशासित कश्मीर के ज़िला शोपियां के वेहेल गांव से रात के साढ़े आठ बजे अपहरण कर लिया था और अगले दिन सुबह कुलगाम के पारिवन में उनकी लाश मिली थी.

जावेद अहमद जम्मू-कश्मीर पुलिस में कॉन्स्टेबल के पद पर कार्यरत थे. वो पांच साल पहले पुलिस में भर्ती हुए थे और पांच दिनों की ड्यूटी के बाद अपने वेहेल गांव आए हुए थे.

श्रीनगर से वेहेल गांव की दूरी क़रीब 70 किलोमीटर है.

शुक्रवार को शोपियां पुलिस लाइन्स में जावेद अहमद को श्रद्धांजलि दी गई. दिन में 11 बजे उन्हें गांव में ही दफ़नाया गया.

जावेद अहमद की अभी शादी नहीं हुई थी. वह अपने पीछे माँ, बाप और बहन को छोड़कर गए हैं. उनकी दो बहनों और बड़े भाई की पहले ही शादी हो चुकी है.

उनके पिता अब्दुल हमीद अपने मकान की दूसरी मंज़िल के एक कमरे में बैठे थे. आते-जाते लोग उन्हें दिलासा दे रहे थे.

अब्दुल हमीद कहते हैं, "एक बेटे की मौत से बाप पर क्या गुज़रती है? मैं तो यही कहूंगा कि एक बेटे की मौत से बाप के दोनों कंधे निकल जाते हैं और मैं क्या कह सकता हूँ."

दोस्तों से मिलने गए थे जावेद

जावेद अहमद के चचेरे भाई मुज़फ़्फ़र अहमद गुरुवार की घटना को याद करते हुए कहते हैं, "क़रीब रात के साढ़े आठ बजे थे. हमारा भाई जावेद घर से बाहर यार दोस्तों से मिलने दुकानों की तरफ़ गया था. इतने में शोर-शराबा हुआ. कुछ लोगों ने हमसे कहा कि आपके भाई को उठाकर ले गए. हम देखने गए तो वह उनको लेकर गए थे. वह सफ़ेद रंग की सैंट्रो कार में आए थे. दो-तीन लड़कों के मोबाइल भी छीने गए थे."

"सुबह तक हमारे पास कोई सूचना नहीं थी. रात के साढ़े दस बजे सेना और पुलिस की एक पार्टी आई थी. उन्होंने कुछ रिपोर्ट लिखी. सुबह सवा पांच का समय था. हमने सोशल मीडिया पर देखा तो उनकी लाश की तस्वीर वहां पर थी. हमने जब देखा तो हमारे होश उड़ गए."

वह आगे कहते हैं, "किसके पास जाते? हमें तो मालूम नहीं था कि कौन-सी पार्टी उठाकर ले गई थी. सबसे बड़ा मसला तो यही था कि कौन उठाकर ले गया?"

जावेद की मौत पर उन्होंने कहा, "ये तो हमारी बदक़िस्मती है. हम तो इस तरह की वहशियाना हरकत की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं."

मुज़फ़्फ़र कहते हैं कि अब जो दर्द है, वो अंदर दिल में ही है.

जावेद अहमद के एक और रिश्तेदार बिलाल अहमद कहते हैं कि जावेद अपने परिवार का बहुत बड़ा सहारा था.

वह कहते हैं, "जिस तरह हर बेटा अपने माँ-बाप का सहारा होता है. उसी तरह जावेद भी अपने परिवार का एक सहारा था, उनकी मौत उनके परिवार के लिए बहुत बड़ा सदमा है."

बिलाल के मुताबिक़, कुछ दिनों के बाद जावेद के मां-बाप हज को जाने वाले थे.

वह कहते हैं, "घर में जावेद के मां-बाप हज पर जाने कि तैयारी कर रहे थे लेकिन बेटे की मौत कि इस ख़बर ने पूरे परिवार को सकते में डाल दिया है."


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चरमपंथी क्यों बना रहे हैं निशाना

कुछ दिनों पहले सेना के एक जवान औरंगज़ेब का भी पुलवामा में चरमपंथियों ने अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी. औरंगज़ेब के बाद एक और पुलिसकर्मी का भी अपहरण हुआ था जिन्हें बाद में चरमपंथियों ने जीवित छोड़ दिया था.

बीते साल शोपियां में सेना के एक लेफ्टिनेंट उम्र फ़ैयाज़ का भी चरमपंथियों ने उनके मामा के घर से उनका अपहरण किया था और अगले दिन उनकी लाश पास के एक गांव में मिली थी.

ये सारी घटनाएं दक्षिणी कश्मीर में हुई हैं. दक्षिणी कश्मीर चरमपंथ का घर माना जाता है. साल 2017 और 2018 में सबसे अधिक चरमपंथी दक्षिणी कश्मीर में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं.

पुलिस का कहना है कि चरमपंथियों ने जावेद अहमद का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी. बीते दो सालों में कश्मीर में दर्जनों पुलिसकर्मी चरमपंथी हमलों में मारे जा चुके हैं.

सेना और दूसरे सुरक्षाबलों के अलावा जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान चरमपंथियों के निशाने पर रहते हैं. जम्मू-कश्मीर पुलिस का विशेष दस्ता चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियानों में हमेशा सक्रिय रहता है.

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