तीन तलाक अध्यादेश के खिलाफ याचिका पर चीफ जस्टिस बोले- हम बहुत कुछ नहीं कर सकते
नई दिल्ली। तीन तलाक को लेकर केंद्र सरकार की ओर से लाए गए अध्यादेश के खिलाफ दायर की गई याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका विचार करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि अगर राज्यसभा और (निचले) सदन में इस विधेयक को पारित नहीं किया जाता है, तो हम बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं।

बता दें कि तीन तलाक की प्रथा क मुस्लिम पुरुषों के लिए दंडनीय अपराध बनाने के लिए अध्यादेश, जो पहले दो बार लैप्स हो चुका था, पिछले महीने तीसरी बार जारी किया गया था क्योंकि विधेयक का संशोधित संस्करण राज्यसभा में अटका हुआ था, जहां सरकार के पास बहुमत नहीं है। मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2018 किसी भी मुस्लिम पुरुष को तीन साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान करता है अगर वो अपनी को तलाक के जरिए छोड़ता है तो। वहीं विपक्ष चाहता है कि तत्काल तलाक के खिलाफ बिल की समीक्षा के लिए एक संयुक्त चयन पैनल बनाया जाए, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं हो पाया है।
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केंद्र सरकार ने पिछले साल अध्यादेश के मूल संस्करण में संशोधन किया था, इसमें कहा गया है ये परिवर्तन जनता और विशेषज्ञों से प्राप्त प्रतिक्रिया और सुझावों को ध्यान में रखते हुए किए गए थे। इसमें एक भी फैसला किया गया कि तीन तलाक की शिकायत पीड़िता महिला या उसका सगा ही पति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकता है। जबकि पहले के बिल में किसी को भी शिकायत दर्ज करने की अनुमति दी गई थी। इसके साथ-साथ यह अपराध कंपाउंडेबल होगा, मतलब पत्नी के कहने पर समझौता किया जा सकता है। पत्नी की सुनवाई के बाद एक मजिस्ट्रेट ही जमानत दे सकता है, अपराध के लिए सजा तीन साल की जेल है।
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