राइट टू रिजेक्ट से नो टेंशन: आधा फीसदी मतदाताओं की पसंद से भी बने हैं सांसद

पिछले लेाकसभा चुनाव की बात करें तो बिहार में दो ऐसे सांसद हैं जिन्हें क्षेत्र में 10 प्रतिशत से कम लोगों का समर्थन मिला है। इस बीच उच्चतम न्यायालय द्वारा नकारात्मक मतदान को लेकर दिए गए आदेश के बाद राजनेता भी अपने क्षेत्र का नए सिरे से आकलन करने में जुट गए हैं। निर्वाचन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में पिछले लोकसभा चुनाव में अधिकांश सांसदों को 30 प्रतिशत से कम मतदाताओं ने पसंद किया।
आंकड़ों पर गौर करें तो सारण से सांसद और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को सारण के कुल मतदाताओं के 21.62 प्रतिशत मतदाताओं ने ही पसंद किया जबकि मधेपुरा के सांसद और जनता दल (युनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव को 24.57 प्रतिशत मतदाताओं का ही समर्थन हासिल हो सका है।
इसी तरह पटना साहिब के सांसद और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता, फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा का कुल मतदाताओं के 19.28 प्रतिशत मतदाताओं ने ही समर्थन किया जबकि सासाराम की सांसद और लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को मात्र 13.70 प्रतिशत मतदाताओं का ही समर्थन मिला।
वैसे आंकड़े बताते हैं कि बिहार की 40 संसदीय सीटों में से 19 पर ऐसे सांसद हैं जिन्हें अपने क्षेत्र के 10 से 20 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिला है। ऐसे सांसदों में पूर्वी चंपारण के राधामोहन सिंह, गोपालगंज के पूर्णमासी राम, भागलपुर से शहनवाज हुसैन, बेगूसराय से मोनाजिर हसन दरभंगा से कीर्ति आजाद, मुजफ्फरपुर से कैप्टन जयनारायण निषाद, पाटलिपुत्र से रेजन प्रसाद यादव, आरा से मीना देवी, गया से हरि मांझी प्रमुख नाम हैं।
बिहार के दो सांसद भोला सिंह और जगदानंद सिंह ऐसे सांसदों की सूची में शामिल हैं जिन्हें 10 प्रतिशत से कम मतदाताओं का ही समर्थन प्राप्त हुआ है। बहरहाल, आंकड़े जो कुछ कह रहे हों लेकिन उच्चतम न्यायालय के नकारात्मक मतदान के आदेश को जद (यू) के वशिष्ठ नारायण सिंह ने स्वागतयोग्य कदम बताया है। वह कहते हैं कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के समय में भी इस मामले को उठाया गया था। हालांकि वह कहते हैं कि अगर इस पर संसद में भी बहस हो तो इसे और प्रभावी बनाया जा सकता है।
बिहार के मुख्य विपक्षी दल भाजपा के सुशील कुमार मोदी ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। इधर, मतादाताओं में भी इस प्रकार के आदेश को लेकर प्रसन्नता है। पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी कहते हैं कि किसी भी उम्मीदवार को नहीं चुनने का अधिकार मिलने से लोकतंत्र मजबूत होगा। न्यायालय का फैसला सकरात्मक है। चुनाव प्रणाली में उम्मीदवार को नापसंद करने का एक संदेश मिल रहा है।












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