शांति के प्रयासों के बाद भी क्यों जल रहा है मणिपुर? राज्य में फैली हिंसा के पीछे ये भी हैं कारण
मणिपुर में पिछले करीब एक महीने से हिंसा जारी है। 3 मई को शुरू हुई हिंसा में अब तक 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच आरक्षण को लेकर शुरू हुई हिंसा की चपेट में अब पूरा राज्य आ गया है। 3 मई के बाद राज्य में शुरू हुई हिंसा को एक महीना होने वाला है। इस हिंसा में 100 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। हजारों लोग पलायन करने के लिए मजबूर हैं।
करीब 53 फीसदी आबादी वाले मैतेई समुदाय की एसटी दर्जा की मांग को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कई मुद्दों को लेकर बढ़ता जा रहा है। तमाम कोशिशों के बाद भी राज्य में हिंसा नहीं रुक पा रही है। राज्य सरकार के प्रभावहीन होने के बाद केंद्र सरकार ने अब मोर्चा संभाला है।
राज्य में हजारों सेना, असम राइफल्स और केंद्रीय अर्धसैनिक बल दिन रात ऑपरेशन कर रहे हैं। पूर्वोत्तर के जानकारों का मानना है कि, राज्य में हिंसा ना शांत होने की सबसे बड़ी वजह पीएम मोदी द्वारा इस मामले पर चुप्पी साधना है।

केंद्रीय नेतृत्व की चुप्पी
मणिपुर में हिंसा की घटनाओं को करीब एक महीना होने वाला है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत किसी भी केंद्रीय मंत्री ने मणिपुर में जारी हिंसा पर बयान जारी नहीं किया। अब जाकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मणिपुर पहुंचे हैं।
अमित शाह मणिपुर में कल से लगातार बैठकें कर रहे हैं। जहां एक और उन्होंने इंफाल में पुलिस, सीएपीएफ, सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की। वहीं दूसरी ओर वह राज्य के स्थानीय लोगों के समूह से मिले। ताकि राज्य में शांति स्थापित की जा सके।
कुकी और मैतेई समुदाय की बीच कोई मध्यस्था करने नहीं आया
मणिपुर के लोग राज्य में फैली हिंसा के लिए वहां की सरकार को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। जब कुकी और मैतेई समुदाय के बीच हिंसा शुरू हुई तो सरकार ने दोनों समूहों को शांत करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यहां तक सीएम बीरेन सिंह ने कुकी समुदाय को आंतकवादी तक कह डाला। राज्य में शांति स्थापित करने किए किसी की भी ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई और ना ही कोई मध्यस्था के लिए आगे आया।

राज्य सरकार की एकतरफा कार्रवाई
मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने समय रहते राज्य में शांति स्थापित करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। जिसके बाद केंद्र सरकार को मणिपुर में अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ कानून व व्यवस्था बनाए रखने में विफल होने के कारण संविधान की धारा-355 लागू करनी पड़ी। हिंसा से निपटने के लिए मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का जो तरीका रहा है, उससे कुकी लोगों के बीच और अशांति पैदा हो गई। इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री एक समुदाय के साथ खड़े नजर आए। सरकार मध्यस्थता की जगह एक पक्षीय कार्रवाई करती दिखी।

मैतेई और कुकी की सालों पुरानी दुश्मनी
मणिपुर पहली बार ऐसी हिंसा नहीं देख रहा है। इससे पहले भी राज्य में कई बार हिंसा भड़की है। वहीं मौतेई औऱ कुकी समुदाय के बीच की दुश्मनी सालों पुरानी है। मैतई समुदाय की मणिपुर की बड़ी आबादी है। कुकी को डर है कि, अगर मैतेई समुदाय को एसटी वर्ग का दर्जा मिला तो वह आदिवासियों के लिए आरक्षित जंगल और जमीनों पर कब्जा कर लेंगे। कुकी आदिवासी समुदाय को आरक्षित वन भूमि से बेदखल करने को लेकर पहले भी हिंसक झड़पें हुई हैं, जिसके कारण राज्य में छोटे-बड़े आंदोलन होते रहे हैं।
मणिपुर में जातीय संघर्ष नए नहीं हैं और पिछले कुछ सालों में हुई हिंसा की घटनाओं में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है।1993 में कुकी-नागा संघर्ष में करीब 400 लोग मारे गए थे। उसी साल मैतेई और मैतेई पंगल (मणिपुर मुस्लिम) के बीच हिंसा हुई थी। जिसमें लगभग 100 लोग मारे गए थे। 1997 से 98 तक चले कुकी-पैते संघर्ष में भी कथित तौर पर 350 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।












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