Vande Mataram: वंदे मातरम कब बना राष्ट्रीय गीत? क्यों मुस्लिमों को है इस पर एतराज?
Vande Mataram : आज राष्ट्रगीत वंदे मातरम के डेढ़ सौ साल पूरे होने पर लोकसभा में विशेष चर्चा है, जिसे लेकर भाजपा ने कहा कि 'यह सिर्फ एक गाना नहीं है, बल्कि एक आवाज़ है जिसने करोड़ों भारतीयों को ब्रिटिश राज, गुलामी, हमलावरों के खिलाफ लड़ाई में एकजुट किया था।'
इंसान के नस-नस में देशभक्ति का रंग भरने वाला ये गीत मातृभूमि के प्रति समर्पण, गर्व और त्याग का अद्भुत प्रतीक रहा है। आपको बता दें कि इस गीत को 1870 के दशक में तब लिखा गया था, जब भारत ब्रिटिश शासन के अत्याचारों से दबा हुआ था।

यह गीत उस समय भारतीयों में राष्ट्रभाव और स्वाधीनता की भावना जगाने का महत्वपूर्ण माध्यम बना। बाद में 1905 में 'बंग-भंग' आंदोलन के दौरान यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों का प्रमुख नारा बन गया।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा Vande Mataram
कहते हैं कि उस दौर में विद्यार्थियों से लेकर क्रांतिकारियों तक, हर एक के होंठों पर 'वंदे मातरम्' गूंजता था, इस गीत को कलमबद्ध किया था लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे, जो कि बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि और विचारक थे। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे संस्कृत और बांग्ला मिश्रित भाषा में लिखा है।
1950 में हुआ Vande Mataram राष्ट्रीय गीत घोषित
वंदे मातरम उनकी प्रसिद्ध पुस्तक आनंदमठ का हिस्सा है, इस गीत को लिखने के पीछे उनका उद्देश्य भारत माता को देवी स्वरूप देकर, देशवासियों को एकजुट होने और विदेशी शासन का विरोध करने के लिए प्रेरित करना था। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'वंदे मातरम' को भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया था।
क्या है इस Vande Mataram से जुड़ा विवाद?
अब इसे विडंमना कहे या दुर्भाग्य, जो गीत स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख नारा बन गया था, उसी गीत को गाने में अब कुछ मुस्लिमों को परेशानी होती है, इसी वजह से ये गीत विवाद का विषय बन गया है। कुछ कट्टरपंथियों को इस गीत गाने पर एतराज है, जिसके पीछे उनका तर्क है कि इस गीत में भारत माता को देवी दुर्गा और लक्ष्मी के रूप में दर्शाया गया है और उनका इस्लाम किसी भी तस्वीर या मूर्ति पूजा की इजाजत नहीं देता है। साल 1909 में मुस्लिम लीग के नेता सैयद अली इमाम ने सबसे पहले इस गीत पर आपत्ति जताई थी।
Vande Mataram को कहा 'काफिरों का गीत'
उनका कहना था कि ये तो 'काफिरों का गीत' इसलिए सभी मुस्लिम इससे दूर रहें, हालांकि ये गीत कोई हिंदू धार्मिक प्रतीक नहीं है लेकिन इसके बावजूद मुस्लिमों ने इस पर विरोध जताया। लाला लाजपत राय, अरविंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक माना था। राष्ट्रीय कार्यक्रमों, स्कूलों और सरकारी समारोहों में इसे गर्व के साथ गाया जाता है, इसकी हर पंक्ति देश की माटी, संस्कृति और गौरव का संदेश देती है।












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