उत्तराखंड: भयानक मंज़र देखने वाले भी दहशत में, एक डॉक्टर की आंखों देखी

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'तेज़ बहाव में शवों के जिस्म के कपड़े तक नहीं बचे. बाढ़ में पानी का बहाव इतना तेज़ रहा होगा कि नदी में मिल रहे शवों के जिस्म से कपड़े तक ग़ायब हैं.'

उत्तराखंड में ग्लेशियर टूटने के बाद, उसकी चपेट में आए लोगों के बारे में ये बातें बता रहे हैं रेस्क्यू में लगे डॉक्टर प्रदीप भारद्वाज.

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डॉक्टर भारद्वाज सिक्स सिग्मा स्टार हेल्थकेयर के सीईओ हैं और वे अपनी टीम के साथ रविवार को चमोली पहुँचे थे.

रविवार शाम साढ़े चार बजे जब डॉक्टर प्रदीप चमोली के रेणी पहुँचे, तो सामने का नज़ारा डरा देने वाला था.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "रेणी गाँव में मैं अपनी मेडिकल टीम के साथ शाम साढ़े चार बजे के लगभग पहुँचा. एनडीआरएफ़, एसडीआरएफ़, आईटीबीपी सहित तमाम बचाव दल रेस्क्यू में लगे थे. जिस तरह बड़े-बड़े पत्थरों के टुकड़े, कीचड़ और पानी दिख रहा था, उस दृश्य ने केदारनाथ आपदा की यादें ताज़ा कर दीं."

वे आगे बताते हैं, "मैंने 11 ऐसे शव देखें, जो कीचड़ में धंसे पड़े थे. ज़्यादातर शवों पर कपड़े ग़ायब थे. संभवतः पानी के दबाव में ऐसा कुछ हुआ. शवों को देखा भी नहीं जा रहा था. शवों को पहचानना मुश्किल हो रहा है. मज़दूरों के पास कोई आईकार्ड तो था नहीं, ऐसे में उनकी पहचान भी एक चुनौती होगी. शायद इसके लिए डीएनए की ज़रूरत पड़े."

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नज़ारा देखने वाले दहशत में

चमोली में ग्लेशियर फटने की ये घटना दिन के समय हुई. बाढ़ जब तेज़ी के साथ घाटी में बढ़ रही, तो सैंकड़ों लोग उस घटना के गवाह बने. पानी के तेज़ शोर और चट्टानों से टकराने के बाद उड़े तेज़ गर्द-ओ-ग़ुबार ने माहौल कुछ ज़्यादा ही खौफ़नाक बना दिया था.

डॉक्टर प्रदीप भारद्वाज बताते हैं कि घटनास्थल के आसपास क़रीब 17 गाँवों के आसपास ये बाढ़ होकर निकली है.

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इन गाँवों में मुख्यतः जगजू, तपोवन, मलारी, तोलम आदि रहे हैं.

डॉ भारद्वाज बताते हैं, "क़रीब 17 गाँवों के लोगों ने ये भयानक मंज़र देखा. लोग दहशत में हैं. उस दृश्य के गवाह बने कुछ लोग भी ट्रॉमा में हैं और उन्हें भी चिकित्सीय मदद की ज़रूरत पड़ेगी."

कुछ मरीज़ों के बारे में वो बताते हैं, "सदमे में शामिल एक ऐसी महिला को ग्रामीण उनके पास लेकर आए, जो अब बोल भी नहीं पा रही है, हालाँकि ग्रामीण बताते हैं कि इस घटना को देखने से पहले वह अच्छी तरह बोलती थी. महिला का ब्लड प्रेशर भी बढ़ा हुआ है जबकि खाना पीना सामान्य है. ऐसे सभी मरीज़ों की कॉउंसलिंग की जा रही है."

इसके अलावा गाँव के कई बुज़ुर्ग लगातार ऐसे स्थानों पर बैठे हुए हैं, जहाँ से पूरे नदी क्षेत्र पर निगाह रखी जा सके. ये सब इसलिए किया जा रहा है, जिससे ऐसी किसी भी घटना की पुनरावृत्ति होने पर रेस्क्यू में लगे लोगों को बचाया जा सके. रविवार-सोमवार की रात को गाँव के लोगों ने शिफ़्टों में यहाँ नदियों का ध्यान रखा.

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आसपास के गाँवों में कैंप, कॉउंसलिंग जारी

बाढ़ का ख़ौफ़नाक नज़ारा देख कई लोगों के बीमार पड़ जाने के बाद डॉक्टर प्रदीप भारद्वाज और उनकी टीम ऐसे गाँवों में कैम्प लगाकर मरीज़ों का इलाज कर रही है.

डॉक्टर प्रदीप कहते हैं, "हमलोगों ने आज (सोमवार) आसपास के गाँवों में कैंप लगाए हैं. उन लोगों को इलाज दिया जा रहा है, जो दहशत और डिप्रेशन की स्थिति में हैं.

नदी क्षेत्र से निकले 11 घायलों का इलाज रविवार को किया गया था. लेकिन वहाँ अब कीचड़ में सिर्फ़ शवों के होने का ही अनुमान है. घायलों को इलाज दिया जा रहा है."

प्रदीप आगे कहते हैं कि दहशत में आए तमाम गाँवों के लोगों को इलाज देना भी ज़रूरी है. बहुत बुरी स्थिति है.

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