शाहरुख-अनुष्का तो बनारस से चले गए, पुलिस की मांग से आयोजक परेशान

अमिताभ बच्चन हों या शाहरूख ख़ान या फिर कोई और फिल्म स्टार, पर्दे पर पुलिस को चकमा देने में ये कभी पीछे नहीं रहते। फ़िल्म डॉन का वह डायलॉग कौन भूल सकता है- "डॉन का इंतज़ार तो ग्यारह मुल्कों की पुलिस कर रही है, लेकिन डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।"

मगर, रील लाइफ़ और रीयल लाइफ़ का सबसे बड़ा फर्क यही है कि रीयल लाइफ़ में बिना पुलिस के ये स्टार दो कदम भी नहीं चल सकते। बनारस की पुलिस ने इस निर्भरता को मुफ्त जारी रखने से मना कर दिया है। वह आयोजक से और आयोजक शाहरूख ख़ान से उन पुलिसकर्मियों के एक दिन का वेतन मांग रहे हैं, जो इन फिल्म स्टार्स की सुरक्षा में तैनात थे।

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    यूपी पुलिस की यह मांग चौंकाने वाली है। इसमें हैरत का तत्व ये है कि क्या स्टार या सुपरस्टार को किसी शहर में घूमने-फिरने के लिए पुलिस को पैसे चुकाने होंगे? सुरक्षा देना पुलिस की ज़िम्मेदारी है। अपनी ड्यूटी पूरा करने के लिए वह सरकार से पैसे लेगी या स्टार से?

    वाराणसी के अशोका इन्स्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेन्ट ने 'जब हैरी मेट सेजल' का प्रमोशन इवेंट आयोजित किया था, जिसके लिए उसने पूर्वानुमति ली और मांग के अनुरूप 51 हज़ार रुपये जमा करा दिए थे। अब तैनात 224 पुलिसकर्मियों के एक दिन के वेतन करीब 6 लाख रुपये की रकम का बाकी हिस्सा भी आयोजक से वाराणसी पुलिस मांग रही है। लेकिन, इस दौरान कतिपय और भी समारोह हुए थे, जिसका आयोजक कोई और था! इसलिए अब माथा पीट रहा है आयोजक। वह टीम शाहरूख से संपर्क कर रहा है कि किसे कितना चुकाना है। आयोजक के लिए यह काम आसान भी नहीं। अगर उसने इस बार किसी तरह रकम चुका भी दी, तो तो आगे वो ऐसे मसलों से कैसे निपटेगा।

    ..और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है पुलिस

    ..और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है पुलिस

    वाराणसी पुलिस के इस तेवर से अनायास फ़िल्म जंजीर का वो जानदार डायलॉग याद आ जाता है- "जब तक बैठने को न कहा जाए, शराफत से खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं।।।"। ये होता है पुलिस का रुतबा, ईमानदार अफसरों का स्वाभिमान और उसका जज्बा। फिल्मों में वर्दी की इज्जत की खातिर जान लड़ाने वाले ये कलाकार रीयल लाइफ में पुलिस की सेवा को अहमियत नहीं देते। मगर, पुलिस भी अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

    कॉमर्शियल एक्टिविटीज में मुफ्त सेवा क्यों दे पुलिस?

    कॉमर्शियल एक्टिविटीज में मुफ्त सेवा क्यों दे पुलिस?

    पुलिस अफसरों का कहना है कि फ़िल्म प्रमोशन कॉमर्शियल एक्टिविटीज़ है। शाहरूख ख़ान और अनुष्का का बनारस आना उनकी व्यक्तिगत यात्रा है। ऐसे में उन्हें अपनी यात्रा और सुरक्षा का ख़र्च खुद वहन करना चाहिए। पुलिस क्यों उनके प्रायोजित कार्यक्रम में मुफ्त सुरक्षा दे?

    कलाकारों के सामाजिक दायित्व पर भी होगा असर

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    सुरक्षा के बदले तनख्वाह का तर्क अब भी किसी के लिए पचा पाना मुश्किल है। अगर, पुलिस का तर्क मान लिया जाए तब तो सुपरस्टार किसी एनजीओ के लिए भी सार्वजनिक समारोह नहीं कर पाएंगे। सामाजिक और देशहित के विज्ञापनों में शूटिंग के दौरान भी उन्हें अपनी ही सुरक्षा का अतिरिक्त बोझ उठाना होगा। ऐसे में जनता के प्रति ये कलाकार अपनी जिम्मेदारी कैसे पूरी करेंगे?

    नेताओं, मंत्रियों, खिलाड़ियों से भी ‘वेतन’ लेगी पुलिस?

    नेताओं, मंत्रियों, खिलाड़ियों से भी ‘वेतन’ लेगी पुलिस?

    कलाकारों का यह भी पक्ष है कि नेताओं, मंत्रियों, सांसदों की सुरक्षा में भी पुलिस लगी होती है। उनकी रैलियों और सार्वजनिक समारोहों में भी बड़ी संख्या में पुलिस की तैनाती होती है। तो क्या पुलिस उनसे भी अपनी तनख्वाह वसूल करेगी? इसी तरह खेल के बड़े स्टार छोटे शहरों में खेलों को प्रमोट करने के लिए जाते हैं, तो क्या उन्हें बिना पैसे के पुलिस सुरक्षा देने से इनकार कर देगी या उनसे भी वसूली करेगी? अगर नहीं, तो केवल फिल्म स्टारों के साथ पुलिस तेवर क्यों दिखा रही है?

    बिगड़े हालात के लिए कलाकार ही ज़िम्मेदार!

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    तर्क तो दोनों तरफ हैं। मगर, अब पुलिस व्यावसायिक गतिविधियों के लिए मुफ्त में इस्तेमाल होने के लिए तैयार नहीं है। पुलिस के रुख में ये बड़ा बदलाव है और इसके लिए खुद फिल्म स्टार ही जिम्मेदार हैं जो अपने फ़िल्म प्रमोशन इवेंट को देशव्यापी तो बनाते हैं लेकिन इस बात का ख्याल नहीं करते कि दूसरों को क्या परेशानी हो सकती है। फिल्म का प्रमोशन करने के अनेकानेक तरीके हो सकते हैं, लेकिन अगर आप किसी शहर की पुलिस व्यवस्था को पूरी तरह अपनी सेवा में लगा देंगे, तो बाकी के काम कौन करेगा? इससे पैदा होने वाली मुश्किलें कैसे दूर की जा सकेंगी? और, ऐसे प्रमोशन देशभर में सीरीज़ के तौर पर हो, तो पुलिस को भी तो कुछ सोचना ही पड़ेगा। आखिर पुलिस देश और समाज की सेवा के लिए है, किसी स्टार के प्रमोशन को पूरा कराने के लिए नहीं।

    वर्दी किराए पर तो नहीं दे रही है पुलिस?

    वर्दी किराए पर तो नहीं दे रही है पुलिस?

    यह भी महत्वपूर्ण है कि वाराणसी पुलिस की ओर से ‘एक दिन का वेतन' मांगना तार्किक नहीं है। सेवा के बदले वेतन लेना तो अच्छा लगता है लेकिन जो वेतन देता है उसका हक भी मालिकाना हो जाता है। क्या पुलिस की यह मांग अपनी ही वर्दी को किराए पर नहीं दे रही है? क्या पुलिस जिस स्वाभिमान, ईमानदारी और वर्दी की प्रतिष्ठा की चिंता कर रही है, उस पर यह आत्मघाती प्रहार नहीं है? इसलिए अच्छा ये होता कि पुलिस टीम शाहरूख से सुरक्षा खर्च का हिस्सा वहन करने को कहती न कि एक दिन पुलिसकर्मियों का वेतन मांगती?

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