Badaun में धर्मेंद्र यादव से मजबूत उम्मीदवार साबित हो पाएंगे आदित्य? M-Y वाली सीट पर BJP को क्यों है उम्मीद?
UP Badaun Lok Sabha Chunav 2024: यूपी का बदायूं जिला आज भी मोटे तौर पर पिछड़ा ही नजर आता है। सड़कें अच्छी बनी हैं, लेकिन बड़ी आर्थिक गतिविधियां आज भी नजर नहीं आती।
अलबत्ता बदायूं में एक आम भावना जरूर नजर आती है कि बीजेपी सरकार के रहते एक प्रकार की 'शांति' महसूस होती है। हालांकि, चुनाव लोकसभा का है तो और भी कई मुद्दे हैं।

बदायूं सीट 2019 में सपा से बीजेपी के हाथों में चली गई
लेकिन, कुल मिलाकर यहां भी जातिगत समीकरण का खास रोल रहने वाला है। कभी समाजवादी पार्टी की गढ़ माने जाने वाली यह सीट 2019 में तब सपा के हाथों से निकलकर बीजेपी के पाले में चली गई थी, जब मायावती और मुलायम सिंह यादव ने फिर से चुनावी गठबंधन किया था।
बदायूं में सपा उम्मीदवार आदित्य यादव पार्टी की तीसरी पसंद
उससे पहले लगातार दो बार 2009 और 2014 में यहां से सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव चुनाव जीते थे। धर्मेंद्र यादव की व्यक्तिगत लोकप्रियता आज भी क्षेत्र में नजर आती है। इस बार भी सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने पहले बदायूं से उन्हीं के नाम पर मुहर लगाई थी।
बाद में सपा प्रमुख ने उन्हें आजमगढ़ भेज दिया और यहां से चाचा शिवपाल यादव की उम्मीदवारी तय की। आखिरकार शिवपाल ने घोषणा की कि बदायूं सीट से इस बार उनके बेटे आदित्य यादव चुनावी एंट्री करेंगे। मतलब, 35 वर्षीय आदित्य यादव बदायूं से चुनाव लड़ने के लिए सपा की तीसरी पसंद हैं।
2019 के चुनावों में वोटों का विभाजन
2019 में बीजेपी की संघमित्रा गौतम (5,11,352 वोट) ने यहां से धर्मेंद्र यादव (4,92,898 वोट) को मात्र 18,454 वोटों से हराया था। तब भी कांग्रेस के दिग्गज सलीम इकबाल शेरवानी यहां 51,947 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे थे।
2024 में बदल गया चुनावी समीकरण
इस बार बीजेपी ने संघमित्रा की जगह ब्रज क्षेत्र के अपने क्षेत्रीय अध्यक्ष दुर्विजय सिंह शाक्य को मौका दिया है। यह उनका भी पहला ही चुनाव है। वहीं बसपा ने पूर्व विधायक मुस्लिम खान को टिकट देकर, सपा के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
बदायूं में जातिगत समीकरण
बदायूं में करीब 20.40 लाख वोटर हैं। इनमें से मुसलमान वोटर करीब 3,50,000 और यादव मतदाता लगभग 3,00,000 हैं, जिन्हें समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक माना जाता रहा है। वहीं 2,00,000 के लगभग मौर्य और 1,80,000 के लगभग दलित वोटर हैं।
जहां सबसे मजबूत वहीं पिछड़ गई थी सपा
बदायूं में कुल 5 विधानसभा क्षेत्र हैं, जिनमें से गुन्नौर और सहसवान को सपा के लिए सबसे अहम माना जाता है, क्योंकि इन दोनों सीटों पर सबसे ज्यादा मुस्लिम और यादव हैं।
लेकिन, तथ्य यह है कि करीब एक-तिहाई मुस्लिम-यादव वोटरों वाली सीट होने और बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन के बावजूद पिछली बार मुलायम सिंह यादव परिवार के सदस्य धर्मेंद्र यादव भी यहां से चुनाव हार चुके हैं।
ईटी ने एक स्थानीय सपा नेता के हवाले से रिपोर्ट दी है कि पिछली बार इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों को लेकर पार्टी निश्चिंत हो गई थी और पर्याप्त प्रचार नहीं करने की वजह से धर्मेंद्र को हार का सामना करना पड़ा।
धर्मेंद्र यादव से मजबूत उम्मीदवार साबित हो पाएंगे आदित्य?
इस बार आदित्य यादव ने बताया है कि, 'मैं हर गांव में नुक्कड़ सभा कर रहा हूं। हर दिन मैं एक विधानसभा चुनता हूं और क्षेत्र के 20 से 25 गांवों में घूमता हूं।'
उनके मुताबिक, 'अच्छी बात ये है कि मुसलमानों और यादवों के अलावा दूसरी जातियों से भी हमें काफी समर्थन मिल रहा है। ऐसा लगता है कि मतदाता कुछ हद तक उत्साहित हैं, क्योंकि मेरे पिता का यहां एक नाम है और मुझे इसका फायदा मिल रहा है।'
बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार का क्या असर होगा?
बदायूं में मुस्लिम उम्मीदवार होने पर मुसलमान वोट बंटने की संभावना है, इसका संकेत पिछले लोकसभा चुनाव में दिख चुका है। ऐसे में अगर इस बार भी पिछला किस्सा दोहराया तो फायदा फिर से बीजेपी को ही मिलने के चांस हैं। हालांकि, कुछ मुस्लिम मतदाता इससे सहमत नहीं दिख रहे है।
राउस अहमद नाम के एक स्थानीय व्यक्ति का कहना है, 'बसपा को वोट देकर मुसलमान अपना वोट गड्ढे में नहीं डालेंगे।'
बदायूं में भाजपा को क्यों है उम्मीद?
लेकिन, बदायूं में बीजेपी के मीडिया इंचार्ज आशीष शाक्या का दावा पूरी तरह से अलग है। उनका कहना है, 'यह कोई सपा का गढ़ नहीं था। यह सिर्फ एम-वाई फैक्टर की वजह से था। आज 20% मुसलमान हमारे साथ हैं। बीजेपी के ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य, मौर्य और अन्य समर्थकों के अलावा करीब 30 से 40% यादव हमें वोट दे रहे हैं।'
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