क्यों सुर्खियों में है यूपी चुनाव से पहले डीपी यादव की रिहाई? जानिए पूरा सियासी गणित
विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का वक्त बचा है और डीपी यादव की रिहाई के बाद वेस्ट यूपी की राजनीति एक बार फिर से नया मोड़ लेगी।
नई दिल्ली, 12 नवंबर: करीब 29 साल पुराने केस 'विधायक महेंद्र भाटी हत्याकांड' में यूपी के पूर्व मंत्री और बाहुबली नेता के तौर पर पहचान रखने वाले डीपी यादव (धर्मपाल यादव) को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है। ये मामला 1992 का था और डीपी यादव इस केस में मुख्य आरोपी थे। इससे पहले इसी मामले में करीब 6 साल पहले सीबीआई कोर्ट ने डीपी यादव को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यूपी की राजनीति, खासकर बदायूं, सम्भल और इनसे सटे यादव बाहुल्य इलाकों में डीपी यादव की गिनती एक कद्दावर नेता के तौर पर होती है। अब जब यूपी विधानसभा चुनाव में महज कुछ ही महीनों का वक्त बचा है तो माना जा रहा है कि डीपी यादव की रिहाई के बाद इन इलाकों की राजनीति एक बार फिर से नया मोड़ लेगी।

क्या था 1992 का महेंद्र भाटी हत्याकांड?
वो 13 सिंतबर 1992 का दिन था, जब गाजियाबाद की दादरी विधानसभा सीट से जनता दल के विधायक और दिग्गज नेता महेंद्र भाटी किसी काम से नोएडा जा रहे थे। रास्ते में दादरी फाटक पर अचानक सात-आठ लोगों ने उनकी गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में विधायक महेंद्र भाटी और उनके एक दोस्त ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। महेंद्र भाटी की हत्या का आरोप डीपी यादव के ऊपर लगा और इस केस को सीबीआई को सौंप दिया गया। डीपी यादव और महेंद्र भाटी कभी गहरे दोस्त हुआ करते थे, और महेंद्र भाटी ही डीपी यादव को राजनीति में लेकर आए थे। हालांकि बाद में किन्हीं वजहों से दोनों अलग हो गए।

मुलायम के गढ़ में चुनौती देकर बनाई सियासी पकड़
वेस्ट यूपी के बुलंदशहर जिले से अपनी राजनीति शुरू करने वाले डीपी यादव का बदायूं, सम्भल और इनसे सटे यादव बाहुल्य इलाकों में काफी रसूख है। 1989 में पहली बार बुलंदशहर से विधायक चुने गए डीपी यादव ने 2007 में खुद की पार्टी 'राष्ट्रीय परिवर्तन दल' का गठन कर बदायूं जिले से ही अपनी राजनीति आगे बढ़ाई थी। उस समय बदायूं जिले को तत्कालीन सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का गढ़ माना जाता था, लेकिन डीपी यादव ने मुलायम सिंह को उन्हीं के गढ़ में चुनौती दी। 2007 के विधानसभा चुनाव में डीपी यादव अपनी पार्टी राष्ट्रीय परिवर्तन दल के टिकट पर बदायूं जिले की सहसवान विधानसभा सीट से और उनकी पत्नी उर्मिलेश यादव बिसौली सीट से चुनाव लड़े और दोनों जीतकर विधानसभा पहुंचे।

पंचायत चुनाव में दिखा डीपी यादव के परिवार का दबदबा
हाल के राजनीतिक घटनाक्रम को देखें, तो इस समय डीपी यादव के परिवार के सदस्य भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं। पिछले दिनों संपन्न हुए यूपी के पंचायत चुनावों में डीपी यादव के सबसे बड़े भतीजे जितेंद्र यादव की पत्नी वर्षा यादव बदायूं की जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गई हैं। वहीं, उनके छोटे भतीजे विक्रांत यादव की पत्नी कृति यादव बदायूं के ही सहसवान में ब्लॉक प्रमुख के तौर पर चुनाव जीती हैं। संकेत साफ हैं कि यहां डीपी यादव का सियासी दबदबा अभी भी कायम है और 2022 के विधानसभा चुनाव में बदायूं और इससे सटे आस-पास के जिलों में इससे काफी असर पड़ सकता है।

2009 के लोकसभा चुनाव में मिली हार
उलझे सियासी समीकरणों वाले बदायूं से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने वाले डीपी यादव 2009 में बीएसपी में शामिल हुए और लोकसभा का चुनाव लड़ा था। हालांकि उन्हें मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव के सामने हार मिली और डीपी यादव तीसरे स्थान पर रहे। इसके बाद 2010 में हुए विधान परिषद के चुनाव में डीपी यादव ने अपने भतीजे जितेंद्र यादव को बीएसपी से टिकट दिलाया और जीत हासिल की। 2016 तक उनका परिवार बीएसपी से जुड़ा रहा, लेकिन इसके बाद भाजपा में शामिल हो गए।

2022 में कैसे बदल सकते हैं इन सीटों पर समीकरण?
यूपी विधानसभा चुनाव के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपनी बदली हुई रणनीति के तहत छोटे दलों को साथ जोड़ने में जुटे हैं। इसके अलावा हाल के दिनों में बीएसपी से अलग हुए कद्दावर ओबीसी नेताओं को भी अखिलेश यादव ने सपा में जोड़ा है। सियासी जानकारों की मानें तो अखिलेश यादव यूपी चुनाव में भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती नजर आ रहे हैं। इन बदले हुए सियासी हालात में डीपी यादव भले ही भाजपा में एंट्री ना करें, लेकिन उनका सियासी प्रभाव बुलंदशहर, बदायूं, सम्भल, गाजीपुर और मुरादाबाद जैसे यादव और मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में एक बड़ा उलटफेर कर सकता है। हालांकि, यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि डीपी यादव का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा।
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