कौन हैं अरुण कुमार? IIT से ली डिग्री फिर 'मुखिया दीदी' के पति ने क्यों छोड़ी 12 साल पहले IAS रैंक की नौकरी?

Arun Kumar Ritu Jaiswal Husband: दिल्ली की चमक-दमक, बड़ा सरकारी बंगला, ऊंचा अफसर वाला रुतबा और आराम से भरी जिंदगी... सब कुछ होते हुए भी एक शख्स ने गांव की टूटी सड़कों, बदहाल स्कूलों और संघर्ष भरी जिंदगी को चुन लिया। वजह सिर्फ एक थी, पत्नी का सपना। बिहार की चर्चित नेता रितु जायसवाल (Ritu Jaiswal) इन दिनों बीजेपी में शामिल होने को लेकर सुर्खियों में हैं, लेकिन उनकी कहानी के पीछे एक ऐसा चेहरा भी है जिसकी चर्चा कम होती है।

यह कहानी है उनके पति अरुण कुमार (Arun Kumar) की। उन्होंने IIT से पढ़ाई करने के बाद सिविल सर्विसेज की परीक्षा के जरिए केंद्र सरकार में बड़ा पद हासिल किया, लेकिन बाद में पत्नी के सामाजिक मिशन के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी। कभी दिल्ली के बड़े दफ्तरों में बैठकर फैसले लेने वाले अरुण कुमार आज गांव के बच्चों को घाट की सीढ़ियों पर बैठकर मुफ्त में पढ़ाते नजर आते हैं। उनकी जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगती।

Arun Kumar Ritu Jaiswal Husband

Arun Kumar: IIT से निकलकर पहुंचे बड़े सरकारी पद तक

अरुण कुमार पढ़ाई में शुरू से ही बेहद होनहार रहे। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की और केंद्र सरकार के केंद्रीय सतर्कता आयोग यानी CVC में निदेशक स्तर की जिम्मेदारी संभाली।

CVC का काम सरकारी विभागों और संस्थानों में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की निगरानी करना और पारदर्शिता बनाए रखना होता है। निदेशक का पद केंद्र सरकार में काफी सीनियर माना जाता है, जहां बड़े प्रशासनिक फैसलों और जांच प्रक्रियाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है। इस पद पर अक्सर IAS, IPS और दूसरी वरिष्ठ सेवाओं के अधिकारी तैनात किए जाते हैं। यही वजह है कि इसे आम भाषा में "IAS स्तर" की नौकरी कहा जाता है, क्योंकि इसमें ऊंची प्रशासनिक जिम्मेदारी, सरकारी सुविधाएं और बड़ा रुतबा मिलता है।

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दिल्ली में उनका जीवन पूरी तरह से व्यवस्थित था। सरकारी बंगला, गाड़ियां, स्टाफ और प्रशासनिक ताकत, सब कुछ उनके पास था। एक सफल अफसर के तौर पर उनकी पहचान बन चुकी थी और करियर भी शानदार चल रहा था।

पत्नी गांव गईं, तो बदल गया सोचने का तरीका

साल 2016 में रितु जायसवाल सीतामढ़ी जिले की सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया चुनी गईं। पंचायत बेहद पिछड़ी मानी जाती थी। गांव में बुनियादी सुविधाओं की हालत खराब थी। रितु ने तय किया कि वे गांव में रहकर बदलाव लाएंगी। उन्होंने दिल्ली की आरामदायक जिंदगी छोड़ दी और पंचायत में काम शुरू कर दिया।

इधर रितु गांव में संघर्ष कर रही थीं और उधर अरुण कुमार दिल्ली में नौकरी कर रहे थे। धीरे-धीरे अरुण कुमार को महसूस हुआ कि सिर्फ दूर से समर्थन देने से काम नहीं चलेगा। पत्नी जिस मिशन के लिए लड़ रही हैं, उसमें साथ खड़ा होना जरूरी है।

12 साल की नौकरी बाकी थी, फिर भी दे दिया इस्तीफा

अरुण कुमार ने साल 2018 में ऐसा फैसला लिया जिसने हर किसी को चौंका दिया। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से VRS ले लिया, जबकि उनकी सेवा के करीब 12 साल बाकी थे। जिस नौकरी को पाने के लिए लोग पूरी जिंदगी मेहनत करते हैं, उसे छोड़कर वे गांव लौट आए। गांव पहुंचने के बाद उन्होंने पंचायत के विकास में पूरी ताकत लगा दी। प्रशासनिक अनुभव का फायदा गांव को मिलने लगा और धीरे-धीरे सिंहवाहिनी पंचायत की तस्वीर बदलने लगी।

राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची पंचायत की पहचान

रितु जायसवाल और अरुण कुमार की मेहनत का असर कुछ ही सालों में दिखने लगा। पंचायत के विकास मॉडल की चर्चा बिहार से बाहर तक होने लगी। गांव में कई बदलाव हुए और सिंहवाहिनी पंचायत को मॉडल पंचायत के तौर पर पहचान मिलने लगी।

इसी काम के लिए रितु जायसवाल को राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बाद में जब रितु राज्य की राजनीति में ज्यादा सक्रिय हुईं, तब अरुण कुमार ने खुद पंचायत की कमान संभाल ली। साल 2021 के पंचायत चुनाव में वे मुखिया पद के लिए मैदान में उतरे और गांव वालों ने भारी वोट देकर उन्हें जीत दिलाई। लोगों ने इसे उनके त्याग और काम का सम्मान माना।

गंगा घाट पर चलती है गरीब बच्चों की क्लास

अरुण कुमार की पहचान सिर्फ मुखिया या पूर्व अधिकारी तक सीमित नहीं है। शिक्षा को लेकर उनका काम भी लोगों को काफी प्रभावित करता है। पटना के NIT घाट पर गंगा किनारे उनकी खुली क्लास की तस्वीरें खूब वायरल हुई थीं। यहां वे गरीब और जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते हैं। झुग्गी-झोपड़ी और कमजोर परिवारों के बच्चे घाट की सीढ़ियों पर बैठकर गणित, विज्ञान और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।

बिना फीस लिए बच्चों को पढ़ाने वाले अरुण कुमार का मानना है कि प्रतिभा सिर्फ बड़े शहरों या महंगे स्कूलों तक सीमित नहीं होती। सही मार्गदर्शन मिले तो छोटे गांवों के बच्चे भी बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं।

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