UN के मंच पर भारत की बेटी ने लहराया परचम, Purnima Devi Barman को सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार, जानिए
UNEP अवॉर्ड से सम्मानित Purnima Devi Barman नाम है उस जीवविज्ञानी का जिसके प्रयास का लोहा संयुक्त राष्ट्र भी मानता है। UN का सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार भारतीय वन्यजीव जीवविज्ञानी पूर्णिमा देवी बर्मन को मिला है। UNEP Purn
संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित भारतीय नारी Purnima Devi Barman ने पूरे देश को गौरवान्वित किया है। पूर्वोत्तर भारत में रहने वाली जीवविज्ञानी डॉ पूर्णिमा देवी बर्मन को इस साल का चैंपियंस ऑफ द अर्थ अवार्ड दिया गया है। दी न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉ पूर्णिमा देवी बर्मन का चयन इस साल के चैंपियंस ऑफ द अर्थ अवार्ड के लिए किया गया है। ये संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरणीय सम्मान है। नागरिकों को पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण को रोकने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में परिवर्तनकारी कार्रवाई के लिए ये अवॉर्ड दिए जाते हैं। (सभी फोटो साभार फेसबुक @StorkSister और @purnima.barman)

सारस के संरक्षण का प्रयास
जीवविज्ञानी पूर्णिमा देवी बर्मन को एंटरप्रेन्योरियल विजन श्रेणी में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) 2022 चैंपियंस ऑफ द अर्थ अवार्ड से सम्मानित किया गया है। पूर्णिमा "हरगिला आर्मी" (Hargila Army) का नेतृत्व करती हैं। इसका मकसद ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क (Greater Adjutant Stork) को विलुप्त होने से बचाना है।

महिलाओं को वित्तीय आजादी
ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क को समर्पित इस संगठन में केवल महिलाएं ही काम करती हैं। जमीनी स्तर पर हो रहा वन्यजीव संरक्षण का काम आंदोलन का रूप ले चुका है। महिलाएं वस्त्र बनाती और बेचती हैं, इन कपड़ों पर पक्षी का रूपांकन होता है, जिससे जागरूकता बढ़ाने में मदद मिलती है। इस पहल से इन महिलाओं को वित्तीय स्वतंत्रता भी मिलती है।

परियोजना प्रबंधक भी हैं Purnima Devi Barman
पूर्णिमा बताती हैं कि Greater Adjutant Stork को समर्पित Hargila Army का मकसद पक्षियों की प्रजातियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। स्थानीय महिलाओं को साथ जोड़ने से काफी मदद मिलती है। रिपोर्ट के मुताबिक पूर्णिमा गुवाहाटी स्थित संस्था बर्मन एविफौना अनुसंधान और संरक्षण प्रभाग, आरण्यक में वरिष्ठ परियोजना प्रबंधक भी हैं।

पांच साल की उम्र में बिछड़े मां-बाप और भाई-बहन
UN Environment Programme (UNEP) की वेबसाइट पर प्रकाशित सूचना के मुताबिक महज पांच साल की उम्र में पूर्णिमा बर्मन को असम में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर अपनी दादी के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था। उन्होंने कहा, "अपने माता-पिता और भाई-बहनों से बिछड़ने के बाद बचपन की पूर्णिमा गमगीन हो गई। ऐसे में ध्यान बंटाने का बीड़ा दादी ने उठाया।

दादी ने पक्षी गीत सिखाया
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पूर्णिमा बर्मन बताती हैं कि बचपन में उदास रहता देख दादी ने ध्यान बंटाना शुरू किया। दादी एक किसान हैं। पक्षियों के बारे में सिखाने के लिए दादी पूर्णिमा को पास के धान के खेतों और आर्द्रभूमि में ले जाने लगीं। यहां उन्होंने सारस और कई अन्य प्रजातियों को देखा। दादी ने पक्षी गीत सिखाया।

सारस की दूसरी सबसे दुर्लभ प्रजाति
बगुले और सारस के लिए गाने के कारण पक्षियों से प्यार हो गया। पूर्णिमा बर्मन बताती हैं कि उन्होंने अपने करियर का अधिकांश समय लुप्तप्राय ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क को बचाने के लिए समर्पित कर दिया है। ये दुनियाभर में सारस की दूसरी सबसे दुर्लभ प्रजाति है।

UNEP निदेशक ने क्या कहा ?
पूर्णिमा की उपलब्धि पर UNEP के कार्यकारी निदेशक, इंगर एंडरसन ने कहा, बढ़ चढ़ कर पक्षियों का संरक्षण कर रहीं पूर्णिमा के प्रयासों से हजारों महिलाएं सशक्त बनीं हैं। उद्यमी तैयार हुए हैं और लोगों की आजीविका में भी सुधार हुआ है। उन्होंने कहा, "डॉ बर्मन के काम ने दिखाया है कि मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को खत्म किया जा सकता है। सभी के हितों का ध्यान रखकर भी समस्या हल की जा सकती है।












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