मोदी जी, जान लें कितने बेरोजगार हैं देश में
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव में अपने सघन चुनाव प्रचार के दौरान देश में बढ़ती बेरोजगारी पर बोलना नहीं भूलते थे। मालूम नहीं कि उन्हें देश में बेरोजगारी से संबंधित ताजा आंकड़ों की जानकारी है या नहीं। पर आंकड़ें डरावने हैं। सबसे खराब स्थिति पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, केरल, ओडिशा, असम की है। वहीं सबसे अच्छे राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु हैं।

बढ़ती तादाद बेरोजगारों की
भारतीय संख्यिकी विभाग की तरफ से हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, देश में बेरोजगारों की तादाद लगातार बढ़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक,देश में बेरोजगारों की संख्या 11.3 करोड़ से अधिक है। 15 से 60 वर्ष आयु के 74.8 करोड़ लोग बेरोजगार हैं, जो काम करने वाले लोगों की संख्या का करीब 15 फीसद है।
जनगणना में बेरोजगारों को श्रेणीबद्ध करके गृहणियों, छात्रों और अन्य में शामिल किया गया है। यह अब तक बेरोजगारों की सबसे बड़ी संख्या है। वर्ष 2001 की जनगणना में जहां 23 फीसद लोग बेरोजगार थे। वहीं, 2011 की जनगणना में इनकी संख्या बढ़कर 28 फीसद हो गई।
पिछले तीन वर्षों में रोजगार वृद्धि के लिए कोई प्रयास या नीति नहीं बनाई गई, जो रोजगार सृजन के लिए उत्प्रेरक का काम करती।
इस बीच,अंतरराष्ट्रीय श्रम आयोग की ने भी अपनी एक रिपोर्ट में भारत में बेरोजगारी के मसले को उठाया था। उसके अनुसार,महिला रोजगार संकट में हैं। पूंजी आधारित अर्थव्यवस्था में महिला मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। कृषि जैसे क्षेत्रों में अब उतनी मजदूरी नहीं बची। वहाँ से लोगों को निकाला जा रहा है। लेकिन ये महिलाएँ अभी दूसरे क्षेत्रों जैसे सर्विसिस सेक्टर में काम नहीं कर सकतीं क्योंकि उनके पास उतनी योग्यता नहीं है।
घटती संख्या महिला मजदूरों की
आईएलओ के आँकड़ों को आधार माना जाए तो क्या वजह है कि बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था में महिला मजदूरों की संख्या घट रही है. सेंटर फॉर विमेन डिवेलेपमेंट स्टीडज़ में वरिष्ठ अध्येता नीता कहती हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार पूंजी आधारित अर्थव्यवस्था होती जा रही है जिसमें मजदूरों की जगह और जरूरत कम हो रही है.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन में ये भी कहा गया है कि महिला मजदूरों की गिरती संख्या का एक ये भी है कि महिलाएँ स्कूल जा रही हैं, शिक्षित हो रही हैं। आईएलओ के मुताबिक रोजगार के कुछ नए अवसर भी होगें, लेकिन वे अंशकालिक और कम तनख्वाह वाले होंगे. कुल मिलाकर वह बेरोजगारी की तुलना में नाम मात्र का होगा।












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