ITBP: अफगानिस्तान में तैनाती के लिए दो महिला कांस्टेबल ने लगाई थी गुहार, कोर्ट को बताए थे ये कारण
नई दिल्ली, 21 अगस्त: दिल्ली हाई कोर्ट के सामने जब आईटीबीपी की दो महिला कांस्टेबल की वह याचिका पहुंची जिसमें वो अफगानिस्तान में तैनाती चाहती थीं, तो कोर्ट भी दंग रह गया। ये महिला कांस्टेबल हाल ही में दोबारा से अफगानिस्तान स्थित इंडियन मिशन में पोस्टिंग की मांग को लेकर अदालत पहुंची थीं। हालांकि लाइवलॉ की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ और जस्टिस अमित बंसल ने इस आधार पर याचिका खारिज कर दी कि यह पूरी तरह से प्रशासनिक मामला है और अदालत इसमें किसी भी तरह से दखल नहीं दे सकती। लेकिन, अफगानिस्तान की मौजूदा हालात के मद्देनजर वहां तैनाती की अर्जी ने अदालत को चौंका जरूर दिया। इस मामले का निपटारा काबुल पर तालिबान के कब्जे से कुछ ही दिन पहले ही हुआ था।

महिला कांस्टेबल की याचिका पर कोर्ट हैरान
काबुल पर तालिबान ने पिछले 15 अगस्त को कब्जा किया था, लेकिन वह इससे पहले से ही लगातार अफगानिस्तान के प्रातों और जिलों पर कब्जा करता जा रहा था। अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने की घोषणा के बाद से ही लग रहा था कि बहुत जल्द यह देश एकबार फिर से आतंकवादी ताकतों कि हाथों में जाने वाला है। लेकिन, ऐसी स्थिति के बावजूद आईटीबीपी के जवानों और वो भी महिला कांस्टेबलों की ओर से युद्धग्रस्त देश में तैनाती की मांग अदालत को आश्चर्यचकित कर गया। कोर्ट ने कहा, 'आईटीबीपी जैसे सशस्त्र बल के कर्मी होने के नाते याचिकाकर्ताओं को फोर्स की आवश्यकताओं के मुताबिक कहीं भी तैनात किया जा सकता है, अफगानिस्तान में ही तैनात किए जाने का उनका कोई निहित अधिकार नहीं है। हमें तो हैरानी हो रही है कि इस समय अफगानिस्तान में जो खतरनाक परिस्थिति बनी हुई है, याचिकाकर्ता वहां पर तैनाती की इच्छुक हैं।'

अफगानिस्तान में इसलिए चाहती थीं तैनाती
याचिका में आईटीबीपी कांस्टेबल की ओर से दलील दी गई थी कि उन्हें 2020 के अगस्त में काबुल स्थित भारतीय दूतावास में सिक्योरिटी एसिस्टेंट के तौर पर दो साल के लिए तैनात किया गया था। लेकिन, इस साल जून में ही उन्हें फिर से भारत बुला लिया गया। उन्होंने अदालत से यही मांग की थी कि वो पूरे दो साल तक अफगानिस्तान में पोस्टिंग की हकदार हैं। अपनी अर्जी में उन्होंने कहा था कि भारतीय दूतावास में आने वाली महिलाओं और बच्चों की तलाशी के लिए उनकी सर्विस की आवश्यकता है और इसमें वह प्रशिक्षित हैं। इसके विरोध में आईटीबीपी ने कहा था कि वहां पहले से ही इस काम के लिए तीन महिला कांस्टेबल तैनात हैं। इसपर अदालत ने कहा कि अफगानिस्तान में उनकी सेवा की आवश्यकता है या नहीं यह याचिकाकर्ता तय नहीं कर सकते। अदालत के मुताबिक यह फैसले प्रशासनिक और फोर्स की ऑपरेशनल जरूरतों के आधार पर लिए जाते हैं और ऐसे मामलों में अदालतों को भी दखल देने की इजाजत नहीं है।

अफगानिस्तान में अब आईटीबीपी का कोई कर्मचारी नहीं
हाल ही में इसी अदालत में इसी तरह का और मामला सामने आया था, जिसमें पता चला था कि आईटीबीपी के जवान अफगानिस्तान में सभी खतरों के बावजूद जान जोखिम में डालकर इसलिए पोस्टिंग चाहते हैं, क्योंकि वहां रहने पर उन्हें विशेष भत्ते मिलते हैं। बता दें कि 15 अगस्त को जब तालिबान ने काबुल को अपने कब्जे में ले लिया था, उसके बाद आईटीबीपी के 99 कमांडो का दल तीन स्निफर डॉग के साथ अफगानिस्तान से भारत वापस आ गया। इस वक्त अफगानिस्तान में आईटीबीपी का कोई दल मौजूद नहीं है। अफगानिस्तान के काबुल में भारतीय दूतावास के अलावा चार काउंसुलेट हैं और तालिबान के कब्चे के बाद वहां तैनात सभी सुरक्षाकर्मी भारत लौट चुके हैं।(तस्वीरें- अफगानिस्तान से अपने देश लौटे आईटीबीपी के कमांडो)












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