क्यों इस बार विधानसभा चुनावों में आदिवासी वोटरों के पास हो सकती है सत्ता की चाबी, बदल रहा है पैटर्न?
इस साल आने वाले महीनों 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। अगर इन राज्यों को देखें तो इस बार चुनाव परिणामों पर आदिवासी वोटरों पर काफी कुछ निर्भर रहने का अनुमान लग रहा है। पांच में से एक राज्य मिजोरम तो यूं ही आदिवासी बहुल राज्य है। बाकी राज्यों में भी अनुसूचित जनजाति (ST) वोट बहुत मायने रख सकते हैं।
अगर हम पिछले एक साल के भीतर हुए दो बड़े राज्यों के चुनाव परिणामों को देखें तो मतदाताओं ने काफी निर्णायक फैसला सुनाया है। गुजरात और कर्नाटक में से पहले में बीजेपी को अप्रत्याशित जीत मिली, दूसरे में कांग्रेस ने जबर्दस्त सफलता प्राप्त की। दोनों राज्यों का वोटिंग पैटर्न बताता है कि आदिवासी मतदाताओं ने जिसके पक्ष में वोट डाला, उसने रिकॉर्ड जीत दर्ज की।

गुजरात में आदिवासी वोटरों ने बीजेपी का दिया साथ
2022 के दिसंबर में गुजरात चुनाव में सत्ताधारी भाजपा ने चुनावी इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़े तो अनुसूचित जनजातियों (ST)के लिए रिजर्व 27 सीटों में से उसे 24 सीटें मिलीं। यहां भाजपा को आदिवासी सीटों पर इतना बड़ा समर्थन कभी नहीं मिला था। परंपरागत तौर पर कांग्रेस की गढ़ मानी जाती थीं।
कर्नाटक में आदिवासी सीटों पर भाजपा का खाता भी नहीं खुला
इसी तरह से कर्नाटक में बीजेपी एसटी सीटों पर खाता भी नहीं खोल सकी और 15 में से 14 सीटें कांग्रेस जीत गई और एक सीट पर जेडीएस ने कब्जा किया था। इसलिए, जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां आदिवासी वोटरों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।
मिजोरम में आदिवासी वोटर ही तय करते हैं चुनाव परिणाम
जहां तक मिजोरम की बात है तो यहां की करीब 98% आबादी अनुसूचित जनजातियों की है। राज्य में विधानसभा की 40 में से 39 सीटे इसी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। इसलिए हमें अन्य चारों राज्यों, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीगढ़ और तेलंगाना में आदिवासी वोटरों की अहमियत देखनी होगी।
2018 में एसटी के लिए आरक्षित सीटों पर रहा कांग्रेस का दबदबा
इन चारों राज्यों में विधानसभा की कुल 710 सीटें हैं। इनमें से 123 सीटें या 17.3% अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए रिजर्व हैं। अगर 2018 के विधानसभा चुनावों की बात करें तो इनमें से 71 पर कांग्रेस जीती थी। लेकिन, अब बीजेपी ने इन राज्यों में आदिवासी बहुल सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए काफी मेहनत की है।
2018 के चुनावों में एसटी सीटों पर पार्टियों का प्रदर्शन
अगर 2018 के चुनावों का विश्लेषण करें तो छत्तीसगढ़ (कुल 90 सीट) में एसटी के लिए 29 सीटें रिजर्व हैं, जिसमे से 26 कांग्रेस, 2 बीजेपी और 1 पर अन्य को जीत मिली थी। एमपी (कुल 230 सीट) में एसटी की 47 रिजर्व सीटों में से 28 कांग्रेस, 18 बीजेपी, 1 निर्दलीय की जीत हुई ही थी। राजस्थान में (कुल 200 सीट) 25 सीटें इसी वर्ग के लिए रिजर्व हैं, जिसमें कांग्रेस 12, बीजेपी 9, 2 निर्दलीय और 2 अन्य के खाते में गई थी। तेलंगाना (कुल 119 सीट) में एसटी की रिजर्व 12 एसटी सीटों में 5 कांग्रेस, 6 टीआरएस और 1 निर्दलीय के खाते में गई थी।
पीएम मोदी ने तेलंगाना में सेंट्रल ट्राइबल यूनिवर्सिटी खोलने का किया ऐलान
आदिवासी वोटों की इसी ताकत को भांपते हुए सभी दलों ने अपने-अपने तरीके से इन्हें सहेजने की कोशिशें की हैं। इसी महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना के महबूबनगर की एक आमसभा में वहां के मुलुगु जिले में सेंट्रल ट्राइबल यूनिवर्सिटी बनाए जाने का ऐलान किया है। 900 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले इस विश्वविद्यालय का नाम आदिवासियों की देवी सम्मक्का-सरक्का के नाम पर रखा जाना है। इसके लिए तीन दिनों के अंदर ही केंद्रीय कैबिनेट ने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऐक्ट में बदलाव की भी मंजूरी दी है।
कांग्रेस और अन्य दल भी कर रहे हैं आदिवासी वोटरों को लुभाने की कोशिश
इसी तरह से 5 अक्टूबर को पीएम मोदी ने मध्य प्रदेश के जबलपुर में राज्य के मंडला, डिंडोरी और जबलपुर के लिए जल जीवन मिशन की घोषणा की है। इनमें से पहले दोनों आदिवासी जिले हैं। अगर केंद्र में बीजेपी की सरकार की नजर आदिवासी वोट बैंक पर है, तो क्षेत्रीय पार्टियां और कांग्रेस भी पीछे नहीं हैं।
तेलंगाना में सीएम केसीआर की भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) सरकार ने सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आदिवासियों का कोटा 6% से बढ़ाकर 10% कर दिया है। इसके अलावा इसने पोडू जमीन (आदिवासी जिसपर 2015 से पहले से खेती करते आ रहे हैं) पर आदिवासियों को पट्टा भी देना शुरू किया है।
राजस्थान में तो पिछली बार कांग्रेस की सरकार बनाने में ट्राइबल पार्टी की भी मदद लेनी पड़ी थी। इसलिए अशोक गहलोत सरकार ने आदिवासियों का दिल जीतने के लिए राजस्थान मिनिमम इनकम गारंटी बिल में ग्रामीण इलाकों में कथौड़ी और सहरिया जनजातियों के लिए 200 दिनों की रोजगार गारंटी का वादा किया है। छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस सरकार ने आदिवासी समाज को जमीन पर अधिकार देने के लिए ग्राम सभाओं को छूट दी है।
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