हाथों में 3 लग्जरी बैग्स, लाल साड़ी...., कुछ इस अंदाज में एथिक्स कमेटी से सामने पेश होने पहुंचीं महुआ मोइत्रा
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा कैश-फॉर-क्वेरी मामले में आज लोकसभा की आचार समिति (एथिक्स कमेटी) के सामने पेश हुईं। इस दौरान महुआ के हाथ में एक नहीं, तीन-तीन बैग थे। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोप का खंडन किया है।
हालांकि महुआ ने व्यवसायी दर्शन हीरानंदानी के साथ संसदीय लॉगिन शेयर करने की बात स्वीकार की है। दोपहर के भोजन के बाद पैनल उनसे जिरह करेगा।

महुआ मोइत्रा ने पेशी से पहले एथिक्स समिति को एक पत्र लिखकर दर्शन हीरानंदानी और सुप्रीम कोर्ट के वकील जय अनंत देहाद्राई को कमेटी के सामने फिर बुलाए जाने और उन्हें उनका क्रॉस एग्ज़ामिनेशन करने का मौक़ा देने की भी मांग की है।
इस बड़ी खबर के मुख्य बिंदु
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1- सूत्रों के मुताबिक, होम, IT और विदेश मंत्रालय से एथिक्स कमेटी को मिली रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर महुआ मोइत्रा से पूछताछ की जा रही है।
2- गृह, सूचना प्रौद्योगिकी और विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट समिति के पास है। पैनल ने 26 अक्टूबर को हुई बैठक के बाद तीनों मंत्रालयों से जानकारी मांगी थी।
3- महुआ मोइत्रा ने कमेटी के सवालों पर कहा कि इस तरह के आरोपों की वजह 'निजी रिश्ते खराब' होना है। यही नहीं इस दौरान उन्होंने कारोबारी दर्शन हीरानंदानी से आमना-सामना कराने की भी मांग की।
4- महुआ मोइत्रा से कहा कि यहां आपकी पर्सनल लाइफ डिस्कस नहीं हो रही हैं। यहां इस पर चर्चा हो रही है कि आपने अपने संसदीय अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया है। मैंने कुछ गलत नहीं किया है।
5- कारोबारी हीरानंदानी ने हलफनामा दायर कर स्वीकार किया था कि महुआ मोइत्रा का इस्तेमाल कर उन्होंने संसद में अपने हित के सवाल कराए। इससे पहले मोइत्रा पर पैसे लेकर सवाल पूछने के आरोप लगे थे।
6- मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, IT मिनिस्ट्री ने कमेटी को बताया कि महुआ की आईडी से दुबई से कम से कम 47 बार लॉगिन किया गया था। समिति ने पूछा था कि क्या उनके लॉगिन और उसके स्थानों के आईपी पते समान थे।
7- -हीरानंदानी यह स्वीकार किया था कि उसके पास मोइत्रा का संसदीय लॉगिन था। वह प्रश्न पोस्ट करते थे। यदि यह साबित हो जाता है तो यह संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन होगा। इसके चलते मोइत्रा को सदन से निष्कासित तक किया जा सकता है।
8- इस पहले महुआ मोइत्रा ने एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष विनोद सोनकर को चिट्ठी लिखकर कई सवाल उठाए थे और पूछा कि क्या ऐसे मामलों को देखने का अधिकार एथिक्स कमेटी के पास है? उन्होंने कहा कि संसदीय समितियों को आपराधिक मामले जांचने का अधिकार नहीं है।












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