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Tiruppur: 11.4 मजदूरों के सामने जीने का संकट, बंद हुई टेक्सटाइल फैक्ट्रियां तो लौट रहे UP, बिहार और ओडिशा

Tiruppur: तिरुप्पुर के कई टेक्सटाइल वर्कर बताते हैं कि अब फैक्टरियों के पास उन्हें देने के लिए पर्याप्त काम नहीं है। किराया और खाने का खर्च उनकी कमाई से ज़्यादा हो गया है। ऐसे में, जब तक हालात सुधर नहीं जाते, घर लौट जाना ही बेहतर है।

कितने मजदूरों ने खोया काम?

इस बात का ठीक-ठीक पता लगा पाना मुश्किल है, लेकिन जो मजदूर स्पेशल ट्रेन से लौट रहे हैं उनकी संख्या बहुत कुछ कहती है। ओडिशा के 2,89,000 मजदूर वापस लौट रहे हैं, जबकि बिहार के 2,51,000 मजदूरों को भी घर का रुख देखना पड़ रहा है। झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुल 3,80,000 मजदूर, असम के 93175 और यूपी के 91497 मजदूर लौट रहे हैं। इस तरह से कुल 11,04,672 मजदूरों के सामने अब जिंदगी जीने का संकट खड़ा है।

Tiruppur

मजदूरों की उम्मीदें और अंधेरे में भविष्य

तिरुप्पुर की तमाम फैक्ट्रियों में से एक में काम करने वाले वर्कर कुलदीप और उन जैसे कई कामगारों को उम्मीद है कि ट्रम्प और मोदी के बीच जल्द व्यापार समझौते पर सहमत होंगे ताकि उद्योग का और नुकसान न हो। द प्रिंट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, चेन्नई सेंट्रल से गंगा कावेरी एक्सप्रेस में सफर कर रहे मजदूर सिर्फ बैग ही नहीं, बल्कि निराशा और भविष्य की अनिश्चितता भी लेकर लौट रहे थे। उनके सामने आगे कमाने और खाने का संकट है।

सपने अधूरे रह गए

कुछ मजदूरों को उम्मीद है कि हालात सुधरने पर वे वापस लौटेंगे, लेकिन कई अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। बिहार के कपड़ा श्रमिक दिलीपकुमार कहते हैं, "मैं चाहता था कि मेरी बेटी तिरुप्पुर के इंग्लिश-मीडियम स्कूल में पढ़े। अब हमें गांव वापस जाना पड़ेगा और उसे सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाना होगा।" वहीं झारखंड के दर्जी पठान कुमार कहते हैं, "हम यहां सपनों के साथ आए थे और एक छोटा जीवन बनाया, लेकिन अब सबकुछ बिखर रहा है। फैक्ट्री मालिक कहते हैं कि उनके पास ऑर्डर नहीं हैं। ऐसे में हम खाली बैठकर क्या करें?"

टैरिफ का असर और रोजगार का संकट

भारत के कुल कपड़ा निर्यात का एक तिहाई हिस्सा देने वाला तिरुप्पुर का उद्योग टैरिफ लागू होने के बाद से गहरे संकट में है। तिरुप्पुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (TEA) के संस्थापक ए शक्तिवेल के मुताबिक, 2,500 निर्यात knitwear उद्योगों में से करीब 20% बंद हो गए हैं और आधे उद्योगों ने प्रोडक्शन घटा दिया है। तिरुप्पुर अभी भी अमेरिका का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है। यहां से भारत के कपास knitwear का 90% और कुल knitwear का 55% निर्यात होता है। 2024-25 में तिरुप्पुर से 39,618 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ, जिसमें से 30-35% हिस्सा अमेरिका को भेजा गया।

यूनिट्स बंद, मजदूर बेरोजगार

करुमथंपट्टी की एक मध्यम इकाई के मालिक एस कृष्णमूर्ति बताते हैं कि उनका व्यवसाय 40% घट गया है। अमेरिका के ग्राहकों ने ऑर्डर लगभग रोक दिए हैं। बिना मांग के कारखाने पूरी क्षमता से नहीं चल सकते। TEA ने बताया 2,500 यूनिट्स में से लगभग 50% ने अपनी आधी मैनपावर निकाल दी है। शक्तिवेल कहते हैं कि बढ़े हुए टैरिफ के कारण एक्सपोर्टर्स अपने अमेरिकी ग्राहकों को आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए उन्हें यूनिट्स बंद करनी पड़ रही हैं। जिससे कई वर्कर्स को नौकरियां गंवानी पड़ी।

कोविड जैसा हाल

प्रवासी मजदूरों के सामने विकल्प है - कम मजदूरी में काम करें या घर लौट जाएं। उत्तर प्रदेश के अतीप ने तिरुप्पुर छोड़कर चेन्नई में पेंटिंग का काम शुरू किया है, लेकिन कहते हैं कि वेतन और हालात बहुत खराब हैं। कई मजदूर मानते हैं कि यह संकट कोविड-19 के दौर से मिलता-जुलता है। कुलदीप कहते हैं, "फर्क बस इतना है कि इस बार हमारे पास घर लौटने के लिए पैसा और सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध है।"

यूपी, बिहार, झारखंड और ओडिशा पर असर

राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक तिरुप्पुर जिले में 2.1 लाख पंजीकृत प्रवासी मजदूर हैं, लेकिन यूनियन का दावा है कि यह संख्या 3 लाख के करीब है। सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीआईटीयू) के जी संपत कहते हैं कि 5 लाख मजदूरों में से आधे बिहार, झारखंड, ओडिशा और यूपी से आते हैं। दिलीपकुमार जैसे कई मजदूर कहते हैं कि बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने का सपना अधूरा रह गया। विक्रम सिंह जैसे श्रमिक कर्ज लेकर आए थे, अब घर लौटने पर पैसे चुकाने की चिंता है।

महिलाएं भी मजबूर

भीड़ में कम महिलाएं थीं। नंदिता देवी कहती हैं कि तिरुप्पुर में स्थिर जीवन बनाने का सपना अब खत्म हो गया है। अब उन्हें फिर से नए काम की तलाश करनी होगी। संपत कहते हैं कि यदि यह मजदूर स्थायी रूप से घर लौट जाते हैं, तो श्रम आधार को फिर से बनाने में सालों लग जाएंगे।

अब कहां जाएंगे...?

जो मजदूर नहीं लौटे हैं, वे अब कपड़ा उद्योग के बाहर काम खोज रहे हैं। मैनपावर एजेंसी के मालिक आर संतोष कुमार कहते हैं कि वह अब मजदूरों को कपड़ा इकाइयों में नहीं भेज सकते। कई मजदूर निर्माण क्षेत्र में काम करने लगे हैं। मैनपावर एजेंसियों के अनुसार, 20 और 30 की उम्र के मजदूर वैकल्पिक नौकरियां ढूंढ रहे हैं। अतीप जैसे लोग कहते हैं कि कम वेतन मिलने के बावजूद उन्हें चेन्नई या कोयंबटूर में रहना पड़ रहा है।

बचत नहीं, कर्ज बढ़ रहा

श्रमिक संघों का कहना है कि अतीप की कहानी अकेली नहीं है, बल्कि यह व्यापक पलायन का हिस्सा है। TEA का अनुमान है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो 20% नौकरियां खत्म हो सकती हैं। संपत कहते हैं कि मजदूरों के पास बचत नहीं है और कर्ज बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि ट्रेनें मजदूरों से भरी अपने मूल स्थानों की ओर लौट रही हैं।

छोटे उद्योगों पर दबाव

छोटी सी टेक्सटाइल यूनिट चलाने वाले कृष्णमूर्ति कहते हैं कि छोटे ऑर्डर लेकर मशीनें चल रही हैं, लेकिन यह टिकाऊ नहीं है। स्टॉक बढ़ रहा है और हर बिना बिका सामान बोझ बन रहा है। संघों ने सरकार से मजदूरी सहायता, बिजली सब्सिडी और अमेरिका से बातचीत की मांग की है।

फैक्ट्रियों का बंद होना शुरु

पलंदाम बेल्ट में आरआरके समूह की 5 में से 2 फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं और आधे मजदूरों को निकाल दिया गया है। बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देश कम टैरिफ का लाभ उठाकर तिरुप्पुर के ऑर्डर ले रहे हैं। केएम सुब्रमण्यम कहते हैं कि सहायक उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हैं। एम रामचंद्रन जैसे छोटे सप्लायर कहते हैं कि अब उन्हें बहुत कम ऑर्डर मिल रहे हैं।

कितने करोड़ का नुकसान?

TEA का अनुमान है कि यदि संकट का समाधान नहीं हुआ तो सालाना 14,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा। हालांकि, कुछ निर्यातक उम्मीद करते हैं कि चूंकि बातचीत शुरू हो चुकी है, स्थिति सुधर सकती है। इसके अलावा राजा शनमुगसुंदरम कहते हैं कि यह संकट कोविड-19 लॉकडाउन से भी ज्यादा गहरा है क्योंकि तब कम से कम यह पता था कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद मांग लौट आएगी।

इस एनालिसिस पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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