थ्री प्वाइंट्स, जो साबित करते हैं कि जामिया में छात्र आंदोलन की आड़ में क्या हो रहा था!
बेंगलुरू। नागारिकता संशोधन कानून 2019 के विरोध में राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं के विरोध- प्रदर्शन को कैंपस में मौजूद राजनीतिक दलों द्वारा हाईजैक करने की कोशिश की गई। जी हां, क्योंकि पुलिस और छात्रों के संघर्ष के दौरान फैलाए गए अफवाहों की तीन कहानियां कुछ इसी तरफ इशारा करती हैं।

इनमें से पहली अफवाह उड़ाई गई, दिल्ली पुलिस ने घटनास्थल पर खड़ी एक सरकारी बस को आग के हवाले कर दिया। दूसरी अफवाह थी, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर गोली चला दी। और तीसरी अफवाह थी कि दिल्ली पुलिस की गोली में 2 लोगों को गोली लगी है। लेकिन एक-एक करके तीनों ही अफवाहों के सच की धरातल पर अब खारिज हो गईं। यह साबित करता है कि कोई था जो यह चाहता था कि आंदोलन हिंसक रूप ले और ऐसे में अगर किसी छात्र को कुछ हो गया तो आंदोलन से पॉलिटिकल माइलेज उसे जरूर मिलना तय था।
यहां सबसे पहले यह समझ लेना भी जरूरी है कि संसद के दोनों सदनों में सीएबी के सर्वसम्मति से पास होने और राष्ट्रपति की मुहर के बाद वजूद में आए नागरिकता संशोधन कानून में ऐसा क्या है कि जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय परिसर के सामने छात्र-छात्राएं पढ़ाई छोड़कर धरना-प्रदर्शन पर उतर आए? क्योंकि सवालों में ही जवाब छिपा होता है।

दिलचस्प यह था कि नागरिकता संशोधन कानून 2019 के विरोध में प्रदर्शन में सड़क पर उतरे छात्र-छात्राओं को विरोध-प्रदर्शन का मजमून ही नहीं पता था। न उन्हें सीएबी का मतलब पता था और न ही संशोधित नागरिकता कानून के प्रावधानों के बारे में भी कुछ मालूम था।
जामिया के सामने एकत्र हुए छात्र और छात्राएं राजनीतिक रैली में बसों में भरकर लाए गए भीड़ की तरह व्यवहार करते पाए गए। जैसे सामान्यतया हर राजनीतिक पार्टियां रैली में भीड़ दिखाने और भाषण के दौरान ऊंचे सुर में जयकारे और नारे लगवाने के लिए एकत्र किए जाते हैं।

विभिन्न टीवी चैनलों के रिपोर्टर्स द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में इकट्ठा हुई हुजूम सिर्फ इतना बताकर पिंड छुड़ाती पकड़ी गई कि सिटीजिनशिप अमेंडमेंट एक्ट मुस्लिम विरोधी है, जिसके जरिए भारतीय मुसलमानों की नागरिकता छीनने की कोशिश की जा रही है, जो वास्तविक सच नहीं हैं, क्योंकि दोनों सदनों के पटल पर रखे गए सीएबी बिल और अब कानून की शक्ल ले चुके कानून (सीएए) में ऐसा कुछ नहीं है, न ही कानून में कही ऐसा उल्लेखित हैं।
सीएए कानून किसी भारतीय मुस्लिम की नागरिकता छीनने की बात नहीं करता है। यह कानून बिल में उल्लेखित तीन पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धर्म प्रताड़ना के शिकार अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात करती है, इसमें हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी शामिल हैं।

उपरोक्त तीनों इस्लामिक देश में हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी अल्पसंख्यक हैं और पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धर्म आधारित प्रताड़ना के शिकार होकर हिंदुस्तान में एक शरणार्थी का जीवन बिता रहे हैं। बिल और अब कानून बन चुके नागरिकता संशोधन एक्ट में मुस्लिम का उल्लेख इसलिए नहीं है, क्योंकि उल्लेखित तीनों देशों में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और तीनों देश एक इस्लामिक राष्ट्र हैं।
सवाल है भला मुस्लिम एक इस्लामिक और मुस्लिम बहुसंख्यक राष्ट्र को छोड़कर हिंदुस्तान की नागरिकता क्यों लेना चाहेगा। यह सवाल मौजू है, क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति के जरिए अपना घर भरने वाली राजनीतिक पार्टियों पहले भी ऐसा कर चुकी हैं। भारतीय मुस्लिमों के बीच बिल को लेकर यह भ्रांतिया ऐसे ही लोगों द्वारा फैला गई है कि सीएए बिल मुस्लिमों की नागरिकता छीनने वाली है।

इन्हीं, अफवाहों के मद्देजर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सदन में बिल पर चर्चा करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि सीएबी मुस्लिम विरोधी नहीं है और न हीं इससे किसी भारतीय मुस्लिम की नागरिकता को खतरा है। लेकिन वर्षों तक गुमराह करने की राजनीति कर सियासत चमकाने वाले राजनीतिकों ने बिल के विरोध में ऐसा माहौल बना दिया कि अफवाहों के शिकार होकर लोग सड़क पर पहुंच गए।
आइए, अब समझते हैं कि कैसे जामिया में छात्र-छात्राओं द्वारा किया गया विरोध-प्रदर्शन हाईजैक कर लिया गया। रविवार, 16 दिसंबर को जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में दिल्ली पुलिस और सीएए का विरोध कर रहे छात्र-छात्राओं के बीच झड़प हुई और भीड़ द्वारा सरकारी डीटीसी बस को आग लगा दिया गया।

डीटीसी बस में कौन आग लगा रहा है इसमें संशय था, लेकिन जिस तरह डीटीसी बस में लगी आग को दिल्ली पुलिस के एक जवान द्वारा पानी के गैलेन से बुझाने को आरोपित किया गया, वह भयानक था। दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने ट्विट कर बताया कि कि देखो दिल्ली पुलिस बसों को आग लगा रही हैं।
एक जिम्मेदार पद पर बैठे डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के ट्विट की असलियत जब बाहर सामने आई तो सिसोदिया ने ट्विट हटाने में देर नहीं लगाई, क्योंकि सामने आए एक वीडियो में खुलासा हो गया था कि दिल्ली पुलिस का जवान चिन्हित बस में आग लगाते नहीं, बल्कि आग बुझाते हुए रिकॉर्ड हुआ था। इससे यह स्पष्ट हो गया था कि जामिया में छात्र-छात्राओं का प्रदर्शन हाईजैक हो गया था, जिसमें राजनीतिक दल एक्ट के बहाने राजनीतिक रोटियां सेंकेने की जुगत में थे।

यह इसलिए समझना आसान है, क्योंकि दिल्ली में जल्द विधानसभा चुनाव 2020 में होने हैं और चुनाव आयोग कभी भी दिल्ली विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा कर सकती है। अब नई राजनीति की इबारत लिखने राजनीति में उतरे AAP नेता की हरकत ने उन्हें जरूर शर्मसार किया होगा, जो उनमें अभी तक संभावनाएं तलाश रहे थे।
दूसरी अफवाह थी, जिसके जरिए पुलिस और छात्र-छात्राओं के संघर्ष को दंगा का रूप देने की पूरी गुंजाइश थी। कहा गया कि पुलिस की गोली से दो छात्रों को गोली लगी हैं और उनमें से एक छात्र को सफदरजंग हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है और दूसरे को ओखला स्थित होली फेमली हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

लेकिन थोड़ी ही देर में इसकी पुष्टि हो गई है कि पुलिस की गोली से कोई छात्र घायल नहीं हुआ और न ही कोई छात्र सफदरजंग में भर्ती है और न ही ओखला स्थित होली फेमली में किसी का इलाज चल रहा है। सोशल मीडिया के जरिए फैलाए जा रहे अफवाहों का कहीं कोई सिर-पैर नहीं था।
मकसद था सिर्फ इतना कि संघर्ष को खूनी संघर्ष में बदल देना। फिर किसी निर्दोष की जान जाती है तो क्या हुआ। बहुत संभव है कि कोई असमाजिक तत्व ऐसे में गोली चलाकर छात्र-छात्राओं को लहुलुहान कर सकता था तब संघर्ष को खूनी संघर्ष में बदलने में देर नहीं लगता।

तीसरी अफवाह फैलाई गई कि छात्रों के ऊपर दिल्ली पुलिस द्वारा गोली चलाई। यह अफवाह भी बस में दिल्ली पुलिस द्वारा पेट्रोल छिड़कर आग लगाने जैसे दावों की तरह झूठी साबित हुई। गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान में बताया गया कि घटनास्थल पर चली गोली दिल्ली पुलिस द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली रायफल से नहीं निकला, क्योंकि गोली से मिले खोखे रायफल की गोली से मैच नहीं खाते हैं।
दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार 10 हिस्ट्रीशीटर बदमाशों से इसकी पुष्टि हुई कि कौन पुलिस और जामिया छात्र-छात्राओं के बीच संघर्ष का फायदा उठाना चाहता था। घटनास्थल पर असामाजिक तत्व मौजूद थे, इसकी पुष्टि जामिया प्रशासन भी कर चुकी है कि कैंपस में 730 से अधिक फर्जी आईडी मिली है, जिसका सीधी सा मतलब है कि कैंपस में मौजूद बाहरी और असामाजिक तत्व बस पर्दा उठने का इंतजार कर रहे थे।

निः संदेह जामिया के छात्र-छात्राओ को सड़क पर उतरने से पहले यह जानना बेहद जरूरी था कि जिस बिल के विरोध में सड़क पर उतरने जा रहे हैं कि क्या उक्त कानून में भारतीय मुस्लिमों का नुकसान होता दिख रहा है, क्योंकि उनके नेक नियत वाले लोकतांत्रिक तरीकों को हाईजैक करने के फिराक में कैंपस में मौजूद 730 से अधिक फर्जी आईडी वाले लोगों का मकसद दंगा फैलाना था।
यह दिल्ली पुलिस की मुस्तैदी ही कहेंगे कि उनके मंसूबे कामयाब नहीं हो गए। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एमएस रंधावा के मुताबिक प्रदर्शनकारियों में शामिल भीड़ द्वारा 4 डीटीसी बस को आग के हवाले किया गया। 100 से अधिक निजी वाहनों को निशाना बनाने वाले लोगों से निपटने में दिल्ली पुलिस के 30 जवान घायल हो गए जबकि एक जवान आईसीयू में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है।
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इसलिए नहीं है नागरिकता संशोधन एक्ट में मुस्लिम का उल्लेख
तीनों इस्लामिक देश में हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी अल्पसंख्यक हैं और पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धर्म आधारित प्रताड़ना के शिकार होकर हिंदुस्तान में एक शरणार्थी का जीवन बिता रहे हैं। बिल और अब कानून बन चुके नागरिकता संशोधन एक्ट में मुस्लिम का उल्लेख इसलिए नहीं है, क्योंकि उल्लेखित तीनों देशों में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और तीनों देश एक इस्लामिक राष्ट्र हैं।

किसने कहा कि सिटीजिनशिप अमेंडमेंट एक्ट मुस्लिम विरोधी है
जामिया के सामने एकत्र हुए छात्र और छात्राएं राजनीतिक रैली में बसों में भरकर लाए गए भीड़ की तरह व्यवहार करते पाए गए। विभिन्न टीवी चैनलों के रिपोर्टर्स द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में इकट्ठा हुई हुजूम सिर्फ इतना बताकर पिंड छुड़ाती पकड़ी गई कि सिटीजिनशिप अमेंडमेंट एक्ट मुस्लिम विरोधी है, जिसके जरिए भारतीय मुसलमानों की नागरिकता छीनने की कोशिश की जा रही है। सच यह हैं कि दोनों सदनों के पटल पर रखे गए सीएबी बिल और अब कानून की शक्ल ले चुके कानून (सीएए) में मुस्लिम की नागरिकता छीनने की बात नहीं हैं।

भारतीय मुस्लिमों में बिल को लेकर फैला गई भ्रांतियां
मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति के जरिए अपना घर भरने वाली राजनीतिक पार्टियों पहले भी ऐसा कर चुकी हैं। भारतीय मुस्लिमों के बीच बिल को लेकर यह भ्रांतिया ऐसे ही लोगों द्वारा फैला गई है कि सीएए बिल मुस्लिमों की नागरिकता छीनने वाली है। इन्हीं, अफवाहों के मद्देजर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सदन में बिल पर चर्चा करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि सीएबी मुस्लिम विरोधी नहीं है और न हीं इससे किसी भारतीय मुस्लिम की नागरिकता को खतरा है। लेकिन वर्षों तक गुमराह करने की राजनीति कर सियासत चमकाने वाले राजनीतिकों ने बिल के विरोध में ऐसा माहौल बना दिया कि अफवाहों के शिकार होकर लोग सड़क पर पहुंच गए।

पहली अफवाह, 'देखो दिल्ली पुलिस बसों को आग लगा रही हैं'
रविवार, 16 दिसंबर को जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में दिल्ली पुलिस और सीएए का विरोध कर रहे छात्र-छात्राओं के बीच झड़प हुई और भीड़ द्वारा सरकारी डीटीसी बस को आग लगा दिया गया। डीटीसी बस में कौन आग लगा रहा है इसमें संशय था, लेकिन जिस तरह डीटीसी बस में लगी आग को दिल्ली पुलिस के एक जवान द्वारा पानी के गैलेन से बुझाने को आरोपित किया गया, वह भयानक था। दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने ट्विट कर बताया कि कि देखो दिल्ली पुलिस बसों को आग लगा रही हैं।
एक जिम्मेदार पद पर बैठे डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के ट्विट की असलियत जब बाहर सामने आई तो सिसोदिया ने ट्विट हटाने में देर नहीं लगाई, क्योंकि सामने आए एक वीडियो में खुलासा हो गया था कि दिल्ली पुलिस का जवान चिन्हित बस में आग लगाते नहीं, बल्कि आग बुझाते हुए रिकॉर्ड हुआ था।

दूसरी अफवाह, दिल्ली पुलिस की गोली से दो छात्रों को गोली लगी!
दूसरी अफवाह थी, जिसके जरिए पुलिस और छात्र-छात्राओं के संघर्ष को दंगा का रूप देने की पूरी गुंजाइश थी। कहा गया कि पुलिस की गोली से दो छात्रों को गोली लगी हैं और उनमें से एक छात्र को सफदरजंग हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है और दूसरे को ओखला स्थित होली फेमली हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। लेकिन थोड़ी ही देर में इसकी पुष्टि हो गई है कि पुलिस की गोली से कोई छात्र घायल नहीं हुआ और न ही कोई छात्र सफदरजंग में भर्ती है और न ही ओखला स्थित होली फेमली में किसी का इलाज चल रहा है। सोशल मीडिया के जरिए फैलाए जा रहे अफवाह का कहीं कोई सिर-पैर नहीं था, मकसद था सिर्फ इतना कि संघर्ष को खूनी संघर्ष में बदल देना। फिर किसी निर्दोष की जान जाती है तो क्या हुआ। बहुत संभव है कि कोई असमाजिक तत्व ऐसे में गोली चलाकर छात्र-छात्राओं को लहुलुहान कर सकता था तब संघर्ष को खूनी संघर्ष में बदलने में देर नहीं लगता।

तीसरी अफवाह, 'छात्रों के ऊपर दिल्ली पुलिस द्वारा गोली चलाई'
तीसरी अफवाह फैलाई गई कि छात्रों के ऊपर दिल्ली पुलिस द्वारा गोली चलाई। यह अफवाह भी बस में दिल्ली पुलिस द्वारा पेट्रोल छिड़कर आग लगाने जैसे दावों की तरह झूठी साबित हुई। गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान में बताया गया कि घटनास्थल पर चली गोली दिल्ली पुलिस द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली रायफल से नहीं निकला, क्योंकि गोली से मिले खोखे रायफल की गोली से मैच नहीं खाते हैं। दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार 10 हिस्ट्रीशीटर बदमाशों से इसकी पुष्टि हुई कि कौन पुलिस और जामिया छात्र-छात्राओं के बीच संघर्ष का फायदा उठाना चाहता था।












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