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हज़ारों समझौते और लाखों करोड़ के निवेश का भरोसा बदलेगा यूपी की तस्वीर?

गुजरात दंगों के कारण आलोचना का शिकार नरेंद्र मोदी ने अपना इमेज मेकओवर 2003 में निवेशक सम्मेलन "वाइब्रेंट गुजरात" से शुरू किया था.

राज्य में इसके आर्थिक फ़ायदे कितने हुए इस पर विशेषज्ञ अलग-अलग राय रखते हैं. लेकिन इसका सियासी फ़ायदा ये हुआ कि नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री से विकास पुरुष बन गए और उसके बाद देश के प्रधानमंत्री.

विशेषज्ञ कहते हैं कि पंद्रह साल बाद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मोदी ही नक़्शे क़दम पर चल पड़े हैं. वाइब्रेंट गुजरात की तर्ज़ पर योगी आदित्यनाथ सरकार ने 22 और 23 फ़रवरी को निवेशकों का पहला बड़ा जमावड़ा "यूपी इन्वेस्टर्स समिट 2018" के नाम से लगाया.

आर्थिक मामलों के कई जानकार ये कह रहे हैं कि एक समय विवादों में घिरे मुख्यमंत्री अब विकास के रास्ते पर चल पड़े हैं.

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अधिकारियों के अनुसार भारत और विदेश से आए 6,000 प्रतिनिधियों ने इस सम्मलेन में भाग लिया जिन में भारत के अंबानी, अडानी, बिरला और टाटा जैसे सभी बड़े नामों ने हिस्सा लिया.

बड़े-बड़े देसी और विदेशी क़र्ज़ देने वाले बैंकों के अधिकारी भी सम्मलेन में मौजूद थे. योगी जी ने कहा उनका बीमारू राज्य अब विकास की राह पर चलने को तैयार है. उन्होंने प्रधानमंत्री को मार्गदर्शन दिखाने पर उनका शुक्रिया अदा भी किया.

उनका साथ दिया स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन्होंने सम्मलेन का उद्घाटन करते हुए कहा कि उत्तरप्रदेश के विकास से जुड़ा है भारत का विकास.

उन्होंने "ब्रांड यूपी" की न केवल बढ़-चढ़ कर वकालत की बल्कि इसके सबसे बड़े सेल्समेन भी साबित हुए. योगी सरकार को उम्मीद है कि इस सम्मलेन से राज्य में 4.28 लाख करोड़ रुपये का प्रस्तावित निवेश मिलेगा. अब तक 1045 एमओयू पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं.

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उत्तर प्रदेश
SANJAY KANOJIA/AFP/Getty Images
उत्तर प्रदेश

उत्तरप्रदेश भारत की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ कुणाल बोस कहते हैं कि उत्तरप्रदेश इतना पीछे है कि इसमें विकास की भरपूर क्षमता है.

निवेशकों के सालाना मेलों की शुरुआत नरेंद्र मोदी ने 2003 में गुजरात में की थी जो वहां अब भी जारी है. अब कई राज्य इस तरह के सम्मलेन करते हैं.

उत्तरप्रदेश में पहले भी इस तरह का सम्मलेन हो चुका है लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नहीं जितना योगी सरकार के नेतृत्व में हुआ है. इन सम्मेलनों की ख़ास बात होती है हज़ारों और लाखों करोड़ों रुपये के व्यपारिक समझौतों का एलान.

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लेकिन क्या इस तरह के निवेशक सम्मेलनों में किये गए व्यापारिक समझौते अपने ठोस अंजाम तक पहुँच पाते हैं? गुजरात के निवेश सम्मलेन पर आलोचना इस बात होती आ रही है कि एमओयूज़ की संख्या राशि बढ़ा-चढ़ा कर बताई जाती है. समझौते हो जाते हैं लेकिन इनमे से कम ही पर अमल होता है. हाँ सरकार को हेडलाइन मिल जाती है.

समझौता
STR/AFP/Getty Images
समझौता

उदाहरण के तौर पर पिछले साल हुए वाइब्रेंट गुजरात सम्मलेन से पहले गुजरात सरकार के महासचिव जेएन सिंह ने दावा किया था कि 2003 से 2015 तक 51,738 एमओयूज़ पर दस्तख़्त किये जा चुके थे जिनमें से 34,234 योजनाएं या तो मुकम्मल हो चुकी थीं या होने की कगार पर थीं. इस तरह उनके अनुसार 66 प्रतिशत एमओयूज़ पर अमल किया गया.

योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार मोदी राज में 2004 से 2012 तक गुजरात की विकास दर 10.1 प्रतिशत थी जबकि महाराष्ट्र, तमिलनाडु और बिहार का विकास दर गुजरात से बेहतर था. 2001 में मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले गुजरात की विकास दर 16 प्रतिशत भी रह चुकी है.

लेकिन कुणाल बोस कहते हैं कि उन्हें उत्तर प्रदेश के सम्मलेन से बहुत उम्मीद है. वो कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में अभी विकास होना है. उद्योग लगाने के लिए वहां पर्याप्त ज़मीन मौजूद है. अगर सरकार ने गंभीरता दिखाई तो विकास होगा और सम्झौतों पर अमल भी."

लेकिन वो स्वीकार करते हैं कि एमओयूज़ की नाकामी एक ऐसी सच्चाई है जो हर देश में नज़र आती है. वो कहते हैं, "ऐसा तो अमरीका और यूरोप में भी होता है. गुजरात, मेरे राज्य पश्चिमी बंगाल और दूसरे राज्यों में भी सभी एमओयूज़ कामयाब नहीं होते हैं. ममता बनर्जी सरकार की कामयाबी का प्रतिशत तो 10 से भी कम है."

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उत्तर प्रदेश
SANJAY KANOJIA/AFP/Getty Images
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कुणाल के अनुसार उत्तरप्रदेश को राज्य और केंद्र में बीजेपी सरकार होने का भी फायदा मिलेगा. लेकिन खुद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के अनुसार फिलहाल ये एक बीमारू राज्य है. तो ज़ाहिर है कि इस सम्मलेन की कामयाबी में कई रोड़े भी होंगे.

कुणाल कहते है कि पहला रोड़ा होगा अफसरशाही, "अफसरों की मदद के बग़ैर योजनाओं को अंजाम देना मुश्किल होगा."

उनके अनुसार "उत्तरप्रदेश में सड़क, बिजली और पानी की सख़्त कमी है जिस पर ध्यान देने की ज़रुरत है और यहां तीसरी समस्या है भ्रष्टाचार."

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प्रधानमंत्री ने इतने बड़े सम्मलेन के आयोजन पर योगी आदित्यनाथ की पीठ थपथपाई. सम्मलेन में मौजूद उद्योगपति मुकेश अंबानी ने कहा कि उनकी कंपनी "जियो" ने अगले तीन सालों में 100 अरब रुपये के निवेश का वादा किया जिससे 40 हज़ार नौकरियां मिलेंगीं.

अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी ने राज्य में अगले पांच सालों में 350 अरब रुपये के निवेश की घोषणा की. अब तो आने वाला समय ही बताएगा कि ये वायदे ठोस योजनाओं में कब बदलते हैं.

लेकिन कुछ विशेषज्ञों के अनुसार योगी आदित्यनाथ में देश को एक और विकास ज़रूर पुरुष मिल गया है.

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