नज़रिया: ऐसे तो अविश्वास प्रस्ताव कभी आ ही नहीं पाएगा

ये पहली बार नहीं है जब संसद संत्र में कोई काम नहीं हुआ हो सिवाय एक फ़ाइनेंस बिल पास होने के. वो भी न के बराबर चर्चा के साथ.

इसके पहले भी ऐसा कई बार देखने को मिला है. सभी को याद होगा कि कैसे 2जी घोटाले को लेकर भाजपा ने सत्र नहीं चलने दिया था. साथ ही जेपीसी के गठन की मांग भी कर डाली थी.

लेकिन, 16वीं लोकसभा में एक बात जो अलग है वो है संसद के भीतर की कटुता और सरकार व विपक्ष के बीच के विवाद का वो स्तर जो बातचीत की गुंजाइश ही पैदा नहीं होने देता.

नज़रिया: ऐसे तो अविश्वास प्रस्ताव कभी आ ही नहीं पाएगा

इन विफल संसद सत्रों के साथ न सिर्फ़ देश का पैसा डूब रहा है, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा क़ीमती हमारे संसदीय लोकतंत्र के भविष्य को भी चोट पहुंच रही है.

ऐसे में अगर राजनेताओं और राजनीतिक दलों को लेकर लोगों में चिड़चिड़ापन आने लगे तो उनका इसमें कोई दोष नहीं है.

कैसे होगा सदन में काम?

जिस तेज़ी के साथ दो क्षेत्रीय दलों, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और तेलुगू देसम पार्टी ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया था, मोदी सरकार का उन पर चर्चा नहीं होने देना, संसद में काम नहीं होने से कहीं ज़्यादा बड़ा चिंता का विषय है.

संसदीय कामकाज के बीच इस बहस को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी.

लेकिन लोकसभा स्पीकर ने भी शोरगुल और सदन में अशांति के बीच इस पर चर्चा कराने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि जब तक शांति नहीं हो जाती, इस पर चर्चा नहीं हो सकती.

और अगर सच कहा जाए तो सदन में शांति होना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि हर पार्टी दोहरी नीतियां अपनाने की दोषी है.

अधूरा वादा

भाजपा से नाराज़ होकर गठबंधन तोड़ने की बात कर रही तेलुगू देसम पार्टी ने तेलंगाना का नए राज्य के तौर पर गठन होते वक़्त ये वादा किया था कि वो आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा दिलाएंगे. लेकिन भाजपा ने तेलुगू देसम पार्टी को उनका ये वादा पूरा करने में कोई मदद नहीं की.

आंध्र प्रदेश में तेलुगू देसम पार्टी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी वाईएसआर कांग्रेस ने भाजपा के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया है और दोनों पार्टियां तेलुगू प्राइड पर खेल रही हैं.

ये एक राजनीतिक खेल है. क्योंकि दोनों ही पार्टियां ये जानती हैं कि भाजपा के पास संसद में ठीक ठाक नंबर हैं और उनके अविश्वास प्रस्ताव से मोदी सरकार को कोई ख़तरा नहीं है.

वहीं दो अन्य दल हैं जो सदन में लगातार नारे लगा रहे हैं. तेलंगाना राष्ट्र समिति और एआईडीएमके जो भाजपा के बचाव में लगे हैं. सभी जानते हैं कि एआईडीएमके भाजपा का ख़ास सहयोगी दल है. लेकिन तेलंगाना राष्ट्र समिति का यहां खड़ा होना दिलचस्प है.

साख बचाने की कोशिश?

तेलंगाना राष्ट्र समिति के चीफ़ के चंद्रशेखर राव कोलकाता जाते हैं तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कहते हैं कि उन्हें भाजपा और कांग्रेस को बाहर रखकर एक थर्ड फ़्रंट बनाना चाहिए. लेकिन संसद में उन्हीं की पार्टी के सदस्य भाजपा की साख बचाने में लगे हैं.

इसमें हैरान करने वाली रत्ती भर भी बात नहीं है कि भाजपा नहीं चाहेगी कि संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा हो. इसलिए नहीं कि उसे सरकार गिरने का ख़तरा है या उसके पास सांसदों की कमी है.

राजनाथ सिंह तो कह ही चुके हैं कि मोदी सरकार इस विषय पर चर्चा को तैयार है. लेकिन भाजपा इससे ज़ाहिर तौर पर बचेगी क्योंकि इससे पार्टी की साख ख़राब होगी. उन्हें थोड़ी तो शर्म झेलनी होगी.

उधर नीरव मोदी, रफ़ाल डील, किसानों का गुस्सा, रोज़गार के न्यूनतम अवसर और बैंकिग के कई मुद्दे ऐसे हैं जिन्हें लेकर विपक्षी दल कांग्रेस तैयार है. इन्हीं मुद्दों पर माना जा रहा है कि भाजपा ने फूलपुर और गोरखपुर सीट भी गवां दी है.

और ये बदलाव महज़ एक साल में आया है क्योंकि यूपी में भाजपा ने भारी बहुमत के साथ एक साल पहले ही सरकार बनाई है.

कांग्रेस की रणनीति

कांग्रेस ने हालांकि अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया है लेकिन वह भी इस विचार पर सहमत नज़र नहीं आती.

पिछले कुछ वक़्त से कांग्रेस में दोबारा खड़े होने के संकेत दिखाई दिए हैं, फिर चाहे वो गुजरात विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन हो, राजस्थान और मध्य प्रदेश के उपचुनाव में जीत या फिर दिल्ली में हाल ही में सम्पन्न हुए कांग्रेस का महाधिवेशन.

इन तमाम वजहों से कांग्रेस में एक भरोसा जगा है. ऐसे में अगर बीजेपी आराम से अविश्वास प्रस्ताव को पास कर जाती है तो सदन के भीतर विपक्षी दलों की टूट एक बार फिर उजागर हो जाएगी.

यही वजह है कि प्रत्येक राजनीतिक दल रोजाना संसद के भीतर एक तरह की नौटंकी रच रहा है. राजनीति में यह नौटंकी कई दफा बेहद जरूरी हो जाती है.

रणनीति पर सवाल

सवाल उठ रहा है कि जब सरकार बिना किसी बहस के वित्तीय बिल को पास करवा सकती है तो फिर इतने गतिरोध के बीच वह अविश्वास प्रस्ताव से बच क्यों रही है? लेकिन यह तो कहानी का सिर्फ एक ही पहलू है.

संसद में हंगामे की वजह से अविश्वास प्रस्ताव को टालने के भविष्य में दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं.

अगर किसी अविश्वास प्रस्ताव को सिर्फ़ इस वजह से टाल दिया जाए कि संसद में गतिरोध बहुत ज़्यादा है तो आने वाले वक्त में कोई भी सरकार अपने ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाने देगी.

सत्ता पर काबिज़ किसी भी दल के लिए दो, तीन या चार सहयोगी दलों को इस बात के लिए मनाना कि वे संसद के गलियारे (वेल) तक जाकर हंगामा खड़ा करें, नारेबाजी करें, यह कोई बहुत मुश्किल काम नहीं होगा.

ऐसे में सरकार के ख़िलाफ़ लाया जाने वाला अविश्वास प्रस्ताव बड़े ही फ़िल्मी अंदाज़ में रोक दिया जाएगा.

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