ये नायडू के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दांव है
राजनीति भी क्या-क्या तस्वीर दिखाती है. पिछले दिनों सोशल मीडिया में एक वीडियो ख़ूब चला हुआ था, जिसमें नरेंद्र मोदी आंध्र प्रदेश के एक चुनावी मंच एन चंद्रबाबू नायडू को हाथ पकड़ कर जोर जबर्दस्ती के साथ अपनी ओर खिंचते और पास की कुर्सी पर बिठाते नज़र आ रहे थे.
लेकिन उन्हीं चंद्रबाबू नायडू ने पिछले सप्ताह केंद्र सरकार से अपने मंत्रियों के इस्तीफ़े की बात करते हुए दुनिया को बताया कि वे 29 बार प्रधानमंत्री से मिलने के लिए दिल्ली आए, लेकिन उन्हें समय नहीं मिला. उस बयान के बाद ये बिलकुल साफ़ हो गया था कि नायडू अब बहुत दिनों तक नरेंद्र मोदी के साथ नहीं रहेंगे.
बात व्यक्तिगत अपमान की होती तो चंद्रबाबू नायडू थोड़ा सह भी लेते लेकिन आंध्र प्रदेश की जनता के सपनों को पूरा करने के लिए उन्हें जिन हज़ारों करोड़ों की ज़रूरत है, उसे देने के लिए केंद्र सरकार बिलकुल तैयार नहीं है. ये सपना है आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती को आधुनिकतम रूप में बनाने का है, जिसमें कम से कम 50 हज़ार करोड़ रुपये की ज़रूरत होगी.
नायडू का फ़ायदा?
दक्षिण भारतीय राजनीति पर नजर रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार नीना गोपाल कहती हैं, "मौजूदा समय में नायडू के एनडीए से बाहर निकलने पर उन्हें वोटों का फ़ायदा तो होगा. लोगों को लगेगा कि वे हमारे लिए काम करना चाहते थे, लेकिन मोदी सरकार ने मदद नहीं दिया. ये बात उनके फेवर में ही जाएगी."
दरअसल, बीते 20 सालों में चंद्रबाबू नायडू की पहचान ऐसे ही नेता की ही रही है, जो मौका देखकर अपना पाला बखूबी बदलना जानता है. चंद्रबाबू नायडू की राजनीति को नज़दीक से देखने वालों में शामिल वरिष्ठ पत्रकार किंग्शुक नाग कहते हैं, "1996 में संयुक्त मोर्चा की सरकारों में भी चंद्रबाबू नायडू की बहुत अहमियत थी. जब वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने तो उस दौर में नायडू की अहमियत कम नहीं हुई, बल्कि बढ़ गई थी. दिल्ली में उनकी पहचान प्रधानमंत्री के मूवर्स एंड शेकर्स के तौर पर होने लगी थी."
2004 में नायडू का क़द इतना अहम हो गया था कि उनके कहने पर ही प्रमोद महाजन ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लोकसभा चुनाव समय से पहले कराने पर तैयार किया था. नायडू चाहते थे कि शाइनिंग इंडिया की चमक दमक के बीच आंध्रप्रदेश के किसानों का गुस्सा दब जाए, हालांकि ऐसा हुआ नहीं और पहले कराए चुनाव ने एनडीए को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया.
अब नायडू एक बार फिर केंद्र में हैं, लेकिन इस बार विरोधी पाले में. भारतीय जनता पार्टी को लंबे समय से कवर करते आए वरिष्ठ टीवी पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "नायडू इस बात का मौका देख रहे थे कि उन्हें केंद्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने को मिले, मौजूदा समय में उन्हें मौका मिल गया है, वे एनडीए से अलग होने भर के लिए अलग नहीं हुए हैं बल्कि वे तीसरे मोर्चे के नेता के तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं."
पैन इंडिया राजनीति का सपना
कभी भारत के सबसे हाईटेक मुख्यमंत्री के तौर पर मशहूर एन चंद्रबाब नायडू की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बारे में नीना गोपाल कहती हैं, "नायडू में हमेशा ये महत्वाकांक्षा तो रही है कि वे अपने राजनीतिक कद को पैन इंडिया का करना चाहते हैं. एनडीए से अलग होने के बाद जिस तरह से उन्होंने जगन मोहन रेड्डी के साथ भी होने के संकेत दिए हैं, ये दर्शाता है कि वे मोदी विरोधी गठबंधन के बारे में सोच रहे होंगे."
हालांकि भारतीय राजनीति में एन चंद्रबाबू नायडू की पहचान ऐसे नेता की रही है जो क्या सोचते हैं और क्या करते हैं, इसके बारे में उनके क़रीबियों तक को अंदाजा नहीं होता है.
किंग्शुक नाग कहते हैं, "नायडू से घंटों बात करने के बाद भी अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है कि उनके मन में क्या गणित चल रहा है. जिस तेलुगू देशम पार्टी को उनके ससुर एनटी रामाराव ने बनाया, उसी पार्टी से उनके बेदख़ल करने का काम नायडू बखूबी कर चुके हैं. इससे उनके शातिर होने का ही पता चलता है."
वैसे ये जानना कम दिलचस्प नहीं है कि चंद्रबाबू नायडू ने अपनी राजनीति संजय गांधी के प्रभाव में कांग्रेस से शुरू की थी, 1975 में. महज 28 साल की उम्र में वे कांग्रेस के विधायक बने. ना केवल विधायक बने बल्कि पहले ही टर्म में संजय गांधी युवाओं को जोड़ने के अभियान के तहत टेक्नीकल एजुकेशन और सिनमेटोग्राफ़ी मंत्री बन गए.
रामाराव को दिया धोखा?
सिनमेटोग्राफ़ी मंत्री के तौर पर ही उनकी जान पहचान एनटी रामाराव से हुई. 1980 में रामाराव की तीसरी बेटी से उनकी शादी हो गई. इस शादी के बाद एनटी रामाराव ने 1982 में तेलुगू देशम का गठन किया, उसके कुछ महीने बाद नायडू अपने ससुर की पार्टी में आ गए.
1983 में एनटी रामाराव बड़ी बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब हुए. चंद्रबाबू नायडू ने पहली बार राजनीतिक तौर पर तब अपनी काबिलियत दिखाई जब अगस्त, 1984 में उन्होंने एनटीआर के ख़िलाफ़ एन भास्कर राव के तख़्तापलट की कोशिश को कामयाब नहीं होने दिया. किंग्शुक नाग कहते हैं, "तब उन्होंने तेलुगू देशम पार्टी के विधायकों की परेड रातों रात राष्ट्रपति के सामने करा दी थी. इसके बाद ही रामाराव ने उन्हें अपना राजनीतिक वारिस बना लिया."
एनटी रामाराव ने उन्हें पार्टी का महासचिव और सरकार में वित्त मंत्री बना दिया. इसके बाद नायडू का पार्टी पर इतना असर हो गया कि उन्होंने 1995 में पार्टी के संस्थापक एनटी रामाराव को ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.
काम से बनाई पहचान?
इस घटना के 11 साल बाद खुद एक इंटरव्यू में नायडू ने बताया था कि एनटीआर केवल उनके ससुर नहीं थे, बल्कि भगवान थे. पर पार्टी को बचाने के लिए उन्हें पार्टी को काबिज करना पड़ा. एक सितंबर, 1995 को ना केवल वे तेलुगू देशम के मुखिया बन गए, राज्य के मुख्यमंत्री बन गए बल्कि एन टीआर की दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती राजनीतिक तौर पर उनके लिए ख़तरा नहीं बन सकें, इसका भी इंतज़ाम कर लिया.
इसके बाद 13 मई, 2004 तक आंध्र प्रदेश ही नहीं देश विदेश में उनके काम की चर्चा होती रही. आंध्र प्रदेश के सीईओ के तौर पर उनकी छवि बन गई और उन्होंने हैदराबाद को साइबर सिटी के तौर पर विकसित कर दिया. इस दौरान उन पर कोई बहुत बड़े आर्थिक घपले का आरोप नहीं लगा, इससे उनकी छवि और भी चमकी.
अमरीकी ऑर्केल कारपोरेशन की एक पत्रिका ने तो नायडू को सेवन वर्किंग वंडर में शामिल कर लिया था. इस दौरान एक अक्टूबर, 2003 को एक लैंडमाइन धमाके में वे बाल बाल बचे थे, लेकिन काम के प्रति उनकी निष्ठा कुछ ऐसी थी कि राज्य के कांग्रेसी नेता तक ये बयान देने लगे थे, एक मुख्यमंत्री के तौर पर वे जितना काम करते रहे, उतना आजादी के बाद भारत में किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने नहीं किया होगा.
बावजूद इन सबके, चंद्रबाबू नायडू दस साल तक सरकार से बाहर रहे. 2014 में भारतीय जनता पार्टी के साथ आकर उन्होंने चुनावी जीत हासिल की.
मोदी के साथ कैसा है रिश्ता?
जब ऐसा लग रहा था कि भारतीय जनता पार्टी के वो बेहद अहम साझेदार बने रहेंगे तब उन्होंने अलग होने का फ़ैसला ले लिया. उनके इस फ़ैसले की वजहों के बारे में किंग्शुक नाग कहते हैं, "नायडू की बीजेपी से पुरानी दोस्ती ज़रूर रही है लेकिन कभी नरेंद्र मोदी के साथ उनके रिश्ते कभी सहज नहीं रहे. 2002 में उन्होंने गुजरात दंगे के बाद भी मोदी का विरोध किया था, 2013 में उनको प्रधानमंत्री बनाए जाने का भी नायडू ने विरोध किया था."
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्षी दल चंद्रबाबू नायडू पर नेतृत्व सौंपने पर एकमत हो सकते हैं. विजय त्रिवेदी कहते हैं, "हक़ीक़त तो यही है कि नायडू जितना सक्षम और काबिल नेता दूसरा नहीं है. अनुभव के मामले में ममता बनर्जी हैं लेकिन उनका टैंपरामेंट नायडू जितना कूल नहीं है. बसपा- सपा- नेशनल कांफ्रेंस- बीजू जनता दल के शीर्ष नेता के मुक़ाबले भी नायडू की स्वीकार्यता ज़्यादा होगी."
किंग्शुक नाग भी मानते हैं कि चंद्रबाबू नायडू की छवि भी विपक्षी दलों के दूसरे शीर्ष नेताओं के मुक़ाबले बेहतर दिख रही है. नाग कहते हैं, "2004 में नायडू की सलाह के चलते ही वाजपेयी ने चुनाव में उतरने का फ़ैसला लिया था और उनकी नैया डूब गई थी. इस बार में नायडू ऐसा एनडीए से बाहर जा कर सकते हैं. ऐसा बिलकुल हो सकता है."
हालांकि नायडू अभी तो विपक्ष के गठबंधन में अपना रोल तलाशते दिख रहे हैं और उनके पास इस भूमिका को भुनाने मौका भी है, लेकिन वे अपने राजनीतिक फ़ैसले जिन अनिश्चितता से लेते रहे हैं उसमें इस बात को लेकर भी संदेह नहीं होना चाहिए कि 2019 के आम चुनाव तक वे एक बार फिर राजग गठबंधन में लौट आएं.
लेकिन ये तभी होगा जब नायडू को राजनीतिक तौर पर फ़ायदा होता दिखेगा. विजय त्रिवेदी की मानें तो काफ़ी हद तक उनकी आक्रामकता जार्ज फर्नांडीस की शैली वाली है, जिसमें राजनीतिक फ़ायदे के लिए किसी के प्रति किसी तरह की कटुता का भाव नहीं होता है.
बहरहाल, मौजूदा स्थिति में उनकी राह एनडीए से अलग हो चुकी है.
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