MCD चुनाव में फिर बजेगा BJP का डंका, ये हैं 6 सबूत
भाजपा के लिए एमसीडी चुनाव सिर्फ तीन नगर पालिकाओं पर अपना दबदबा बनाए रखने का नहीं है, बल्कि अगले दिल्ली के अगले विधानसभा चुनाव के लिए खुद को एक मजबूत दावेदार साबित करने का भी है।
नई दिल्ली। कई कारणों के चलते इन दिनों एमसीडी चुनाव का कवरेज जोर शोर से हो रहा है। अरविंद केजरीवाल के लिए यह चुनाव एक लिटमस टेस्ट की तरह है, जिससे यह साफ होगा कि 2015 में प्रचंड बहुमत से जीतने के बाद दिल्ली की जनता को मुख्यमंत्री की तरह उनका प्रदर्शन कैसा लगा है। गोवा और पंजाब में करारी हार के बाद एमसीडी चुनाव में जीत हासिल करना आम आदमी पार्टी के लिए बहुत जरूरी है, जहां पर इनकी अपनी सरकार भी है। अगर एमसीडी चुनाव में आम आदमी पार्टी हारती है तो इससे पार्टी को आगे बढ़ाने की योजना पर बड़ा झटका लगेगा।

भाजपा के लिए एमसीडी चुनाव सिर्फ तीन नगर पालिकाओं पर अपना दबदबा बनाए रखने का नहीं है, बल्कि अगले दिल्ली के अगले विधानसभा चुनाव के लिए खुद को एक मजबूत दावेदार साबित करने का भी है। वहीं एक के बाद एक हार के चलते देश के नक्शे से गायब होती जा रही है कांग्रेस पार्टी के लिए यह चुनाव खुद को बचाने की चुनौती जैसा है। अगर कांग्रेस अपने वोटों की संख्या बढ़ाने में नाकाम रहती है तो दिल्ली में कांग्रेस को दोबारा सत्ता में आने में काफी लंबा समय लग सकता है। बहुत से लोगों का मानना है कि इस चुनाव में कांग्रेस भी एक मजबूत पार्टी है। यह दावा कांग्रेस द्वारा 15 साल तक सत्ता संभालने को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है।
इस चुनाव में कौन जीतेगा और किसकी होगी हार, इसका फैसला तो 26 अप्रैल को होगा, जब ईवीएम खुलेंगे। हालांकि, मौजूदा समय में यह कुछ बातें हैं जो इस ओर इशारा करती हैं कि एमसीडी चुनाव में लगातार तीसरी बार भाजपा ही जीतेगी।

1- खराब सरकार की धारणा
राजनीति में धारणा काफी अहम रोल अदा करती है और मौजूदा समय में आम आदमी पार्टी की सरकार को लेकर लोगों की धारणा एक खराब सरकार की हो गई है। जब से अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, तभी से लगातार दिल्ली के एलजी के साथ नोंक-झोंक, उच्च मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के चार्ज और वाई-फाई, सीसीटीवी कैमरे जैसे वादों को पूरा न कर पाना लोगों में यह धारणा पैदा कर रहा है कि सरकार खराब है। इससे पार्टी के प्रदर्शन पर भी काफी असर पड़ रहा है।
ऑड इवेन स्कीम के दौरान अरविंद केजरीवाल लोगों में अपनी सरकार की एक अच्छी छवि बनाने में कामयाब रहे थे, लेकिन वह काफी छोटे समय के लिए था, क्योंकि योजना फेल हो जाने के चलते उसे बंद कर दिया गया। मोहल्ला क्लीनिक खोलने के अपने वादे को भी सही से पूरा करने में अरविंद केजरीवाल पिछड़ रहे हैं और पिछले साल डेंगू फैलने के बाद सही व्यवस्था न होने के चलते स्वास्थ्य के मुद्दे पर भी उनके प्रदर्शन ने लोगों को नाराज किया है।
डेंगू जैसी भयावह समस्या के दौरान अरविंद केजरीवाल और उनकी कैबिनेट के दिल्ली में न होने से भी दिल्लीवासियों के मन में नाराजगी का माहौल बन गया है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी द्वारा विज्ञापन पर किया गया खर्च भी दिल्ली के लोगों को रास नहीं आया है। पूरे देश में जगह-जगह अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के लोगों की मौजूदगी से दिल्ली के लोगों में यह भी बात फैल रही है कि क्या वास्तव में अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की और यहां के लोगों की चिंता है।

2- खुद अरविंद केजरीवाल
अगर कोई अरविंद केजरीवाल के कैंपेन को ध्यान से देखे तो उसे पता चलेगा कि वह लगातार बेकार के मुद्दों जैसे ईवीएम से छेड़छाड़ की ओर लोगों का ध्यान खींचकर लोगों को हतोत्साहित करना चाहते हैं। इस तरह वह लगातार लोगों के गुस्से को केंद्र सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह के हथकंडे कभी भी किसी पार्टी या नेता की मदद नहीं करते, बल्कि उल्टा इनसे नुकसान ही होता है। केजरीवाल यह धारणा पैदा कर रहे हैं कि उनके पास अपने खुद के किए कामों के बारे में बोलने के लिए कुछ नहीं है और अपनी हार की सफाई देने के लिए उन्हें बहानों की जरूरत है।

3- मोदी फैक्टर
कोई माने या न माने, लेकिन मोदी फैक्टर को नजरअंजाज नहीं किया जा सकता है, यहां तक कि स्थानीय निकाय के चुनावों में भी नहीं। लोगों के बीच में भाजपा द्वारा चलाई जा रही है एमसीडी और आम आदमी पार्टी द्वारा चलाई जा रही दिल्ली सरकार, दोनों को लेकर ही असंतुष्टि सी है। लेकिन देश में भाजपा सरकार के प्रति लोगों की संतुष्टि ही एमसीडी चुनाव भाजपा को बड़ा फायदा दे रही है। भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कैंपेन में हिस्सा नहीं ले रहे हों, लेकिन उनकी तस्वीरें, होर्डिंग और उनका नाम भाजपा ने खूब जमकर इस्तेमाल किया है। पार्टी को यह एहसास है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों का वोट अपनी ओर खींचने में समर्थ हैं।

4- नए चेहरों का एक्सपेरिमेंट
एक बड़ा दांव खेलते हुए भाजपा ने इस चुनाव में लोगों की असंतुष्टि को संभालने में कामयाब रही है। ऐसा न करने पर यह चुनाव भाजपा द्वारा चलाई जा रही एमसीडी के खराब गवर्नेंस के आधार मानकर लड़ा जाता। पुराने किसी भी पार्षद को टिकट न देते हुए मोदी सरकार ने इस बार नए चेहरों को मैदान में उतारा है। इस तरह से भाजपा ने खुद को लगातार तीसरी बार जीत का दावेदार नहीं, बल्कि एक चैलेंजर की तरह मैदान में उतारा है।

5- कांग्रेस की कलह
दिल्ली में 2015 के चुनावों में ही कांग्रेस का सूपड़ा साफ होने के बाद माना जा रहा है कि यह चुनाव कांग्रेस के लिए बहुत ही अहम है। वहीं इसके विपरीत कांग्रेस की अपनी कलह ने ही दिल्ली में कांग्रेस के आने की संभावनाओं को खत्म कर दिया है। दिल्ली कांग्रेस के कुछ अहम चेहरे जैसे अरविंदर सिंह लवली (जो हाल ही में भाजपा में शामिल हो गए हैं), ए.के. वालिया और बरखा सिंह अजय माकन के नेतृत्व से परेशान हैं। कई मौकों पर इन लोगगों ने अपनी नाराजगी को सार्वजनिक रूप से दिखाया भी है। इससे यह साफ होता है कि 2015 के बाद कांग्रेस ने कुछ नहीं पाया है।

6- लहर फैक्टर
हाल ही के विधानसभा चुनावों में भाजपा को शानदार जीत मिली है और आम आदमी पार्टी को गोवा और पंजाब में करारी हार झेलनी पड़ी है। यह सारी परिस्थितियां भाजपा के पक्ष में जाती हैं। इससे दिल्ली में हो रहे एमसीडी चुनाव पर भी असर पड़ना तय है और उसका फायदा भाजपा को होगा। यह सभी फैक्टर यह दिखाते हैं कि इस चुनाव में भाजपा को काफी फायदा मिल रहा है। हालांकि, यह देखने वाली बात होगी कि 2015 के मुकाबले कांग्रेस खुद को कितना बेहतर कर पाती है।
किसी को भी हैरान नहीं होना चाहिए अगर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दूसरे स्थान पर आने को लेकर तगड़ी टक्कर देखने को मिले। जहां तक भाजपा की बात है तो इसे तीनों नगर पालिकाओं में बहुमत मिलना तय है। क्या पार्टी 200 के आंकड़े को पार कर सकेगी? इस सवाल के जवाब के लिए यह चुनाव जरूर देखने वाला होगा।
(लेखक रन्निति कंसल्टिंग एंड रिसर्च एलएलपी के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। वह @mehtanitin1807 नाम से ट्वीट करते हैं।)
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