भारत और पाकिस्तान के बीच इस समय सुलह की संभावना नहीं: नज़रिया

बीती 14 फरवरी को भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में आत्मघाती हमले के 13 दिन बाद 27 फ़रवरी तक भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव इस हद तक बढ़ चुका है कि अब बातचीत के ज़रिए सुलह की संभावना नज़र नहीं आ रही है.

ये बात कहने का आधार ये है कि इस बार हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने बिना सोचे-समझे जो कदम उठाए हैं उसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव इस हद तक बढ़ गया है.

एक ज़माने में एक बहुत ही पुरानी व्यवस्था मान्य थी जिसके मुताबिक़ ऐसी लड़ाइयां सेनाओं के बीच हुआ चला करती थीं और उसका पूरी दुनिया और देश के बीच तमाशा नहीं बनाया जाता था.

इस वजह से अगर दो मुल्कों के रिश्तों में तनाव को कम या ज़्यादा करना होता था तो सेनाएं गुप्त ढंग से उचित कदम उठाती थीं. अंग्रेजी में इसे एस्केलेशन लैडर कहते हैं जिसके आधार पर दो देशों के बीच जंगी हालातों का जायजा लिया जाता है.

लेकिन जब आप इस पूरी व्यवस्था को राजनीतिक स्तर पर पूरे देश और दुनिया में एक अभियान बना देते हैं तो तनाव कम या ज़्यादा करने के लिए जो कदम गुप्त ढंग से उठाए जाते हैं, वह नहीं हो सकते हैं.

अब पाकिस्तान में भी शीर्ष पर बड़बोले नेता हैं, यहां पर भी नेतृत्व बड़बोला है तो दोनों तरफ़ से तनाव में बढ़ोतरी होती रहेगी.

भारतीय सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत
Getty Images
भारतीय सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत

ऐसे में न पाकिस्तान के पास कोई ऐसा तरीका है और न भारत के पास कोई विकल्प है जिसका उपयोग करके बिना नुकसान उठाए इस राजनीतिक अभियान को रोका जा सके.

क्योंकि भारतीय नेतृत्व को भी अपनी इज्जत रखनी है और पाकिस्तानी नेतृत्व को भी अपनी इज्जत रखनी है.



किस हालात में भारत-पाक रिश्ते?

भारत और पाकिस्तान के बीच वर्तमान रिश्तों को समझने के लिए एस्केलेशन लैडर को समझना ज़रूरी है.

सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता है कि कोई मुल्क आपके दो जवानों को मार दे तो इसके बदले में दूसरा देश पलटवार करते हुए पहले हमला करने वाले देश के दो लाख सैनिकों को मार दे. ऐसा नहीं होता है.

पुलवामा
EPA
पुलवामा

इसकी जगह तनाव एस्केलेशन लैडर के स्तरों के मुताबिक़ तय किया जाता है.

ऐसे में अगर कोई मुल्क किसी का एक सैनिक मारता है तो जवाब में दूसरा मुल्क दो या तीन जवान मार सकता है. फिर इसके बाद पहले हमला करने वाला मुल्क जवाबी कार्रवाई करता है. लेकिन एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रक्रिया एक स्पैक्ट्रम में होती है.

ऐसा नहीं होता है कि आपने क्रॉस बॉर्डर फायरिंग में मेरे दो जवान मार दिए तो इसके बदले में हमने जंग शुरू कर दी.

सरल शब्दों में कहें तो इसके कुछ चरण होते हैं. और फौजियों के बीच में एक प्राइवेट लैंग्वेज़ होती है जो कि दोनों तरफ के सैनिक समझते हैं. और कोई एक दम से चार से पांच चरण ऊपर की कार्रवाई नहीं करता है.

अब अगर भारत और पाकिस्तान के वर्तमान रिश्तों की बात करें तो बात कोई बहुत ज़्यादा आगे नहीं गई है. लेकिन मुश्किल ये है कि अब तनाव को कम करना सेनाओं के हाथ में नहीं है.

सेना
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सेना

हालांकि, ये कहना ज़्यादा सही होगा कि साल 2016 के बाद से एस्केलेशन लैडर सेनाओं के हाथ से बाहर निकल गया है. 2016 से पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक जैसे क्रॉस बॉर्डर ऑपरेशन होते थे. इनकी मंजूरी राजनीतिक नेतृत्व ही देता था. लेकिन उनका सार्वजनिक रूप से उनका प्रचार नहीं किया जाता था.

ऐसे अभियानों के आधार पर चुनावी अभियान नहीं चलाए जाते थे.

अब समस्या ये है कि आमने-सामने खड़े सैनिकों के आधार पर तार्किक विश्लेषण नहीं किया जा रहा है कि कोई कदम उठाने से क्या नुकसान या फ़ायदा होगा.

अब हानि-लाभ का पैमाना चुनाव जीतने-हारने पर आधारित है. अब कोशिश बस ये है कि क्या करें कि ये चुनाव हमारे हाथ आ सके.



इमरान ख़ान की शांति की अपील

अब अगर इमरान ख़ान के बुधवार को दिए गए बयान की बात करें जिसमें उन्होंने युद्ध से बचने की अपील की है तो हमें ये समझना होगा कि हारकर कोई भी बातचीत के लिए तैयार नहीं होगा.

इस समय इमरान ख़ान अगर ये कह रहे हैं कि वह बातचीत के लिए तैयार हैं तो इसकी वजह ये है कि पाकिस्तान ने भारत के एक विमान को मार गिराया है और एक पायलट को गिरफ़्तार कर लिया है.

इमरान ख़ान
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इमरान ख़ान

कल तो इमरान ख़ान की तरफ़ से ऐसा कोई बयान नहीं आया था. अब भारत बातचीत का प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता है. क्योंकि ये एक राजनीतिक समस्या है.

अगर सेना बातचीत को लेकर फ़ैसला कर पाती तो अब तक बातचीत हो चुकी होती क्योंकि दोनों ओर को पता होता कि ऐसा न करने में कोई फायदा नहीं है.



शांति कैसे संभव होगी?

अब सवाल ये है कि दोनों मुल्कों में हालात इस कदर खराब होने के बाद अब शांति कैसे कायम होगी?

ऐसी परिस्थितियों में शांति की स्थापना के लिए ज़रूरी है कि दोनों मुल्कों के सामने एक ऐसी स्थिति प्रकट हो जिसमें दोनों ही मुल्कों की जीत दिखाई देती हो.

और जब तक वो वक्त नहीं आता कि दोनों ही मुल्क इस संघर्ष में खुद को विजेता घोषित कर सकें तब तक ये संघर्ष जारी रहेगा.

(बीबीसी संवाददाता अनंत प्रकाश से बातचीत पर आधारित)

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