महाराष्ट्र टाइगर के नाम से मशहूर ठाकरे परिवार का सांपों से है ऐसा अनोखा रिश्ता

नई दिल्ली- महाराष्ट्र में सत्ताधारी शिवसेना के 'लोगो' पर बाघ मौजूद है। बाल ठाकरे के परिवार की तुलना भी पार्टी के कार्यकर्ता बाघों से करते हैं। गुरुवार को उद्धव ठाकरे की ताजपोशी के दौरान शिवसैनिक उनके लिए ऐसा नारा भी लगा रहे थे। लेकिन, अब ठाकरे परिवार का एक ऐसा अनोखा पक्ष सामने आया है, जिसके बारे में शायद बहुत कम लोग ही जानते हैं। ठाकरे परिवार के सदस्यों को सांपों से भी बहुत ज्यादा लगाव रहा है। तीन-तीन पीढ़ियों से लगातार सांपों के प्रति ये दिवानगी जाहिर होती रही है। इसकी शुरुआत खुद शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे के समय से हुई और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने उसे बहुत आगे बढ़ा दिया। लेकिन, सबसे ज्यादा कमाल तीसरी पीढ़ी ने कर दिखाया है, जिसने सांप की एक नई प्रजाति भी खोज निकाली है। हम यहां ठाकरे परिवार की तीनों पीढ़ियों के सांपों के प्रति प्रेम के बारे में चर्चा करेंगे और बात करेंगे कि कैसे एक कैट स्नेक की नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम भी 'ठाकरे' के नाम पर रखा गया है।

तीन-तीन पीढ़ियों से सापों के प्रति अनोखा लगाव

तीन-तीन पीढ़ियों से सापों के प्रति अनोखा लगाव

शिवसेना प्रमुख और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की शख्सियत को देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगा पाए कि रेप्टाइल्स के बारे में जानने-समझने की उनकी जिज्ञासा कितनी ज्यादा है। टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक सांपों के प्रति यह लगाव ठाकरे परिवार में बालासाहेब से देखा गया और नई पीढ़ी में उद्धव के छोटे बेटे तेजस में तो यह और ज्यादा बुलंदियों को छूने लगी हैं। पुणे स्थित कटराज स्नेक पार्क के संस्थापक और इंडियन हर्पेटोलॉजिकल सोसाइटी के डायरेक्टर नीलिमकुमार खैरे इसके प्रत्यक्ष गवाह हैं। उन्होंने बाल ठाकरे से लेकर उद्धव और उनके बेटे तेजस में सांपों के प्रति दिवानगी को करीब से देखा और अनुभव किया है। खासकर उद्धव और तेजस तो सांपों को देखने और उनके बारे में जानने के लिए अक्सर उनके पास आते रहे हैं। बता दें कि हर्पेटोलॉजिकल में सरीसृपों और उभयचरों के बारे में अध्ययन किया जाता है।

(नीचे की तीनों तस्वीर सौजन्य: टीओआई)

करीब 25 वर्षों से सापों की दुनिया के करीब रहे हैं उद्धव

करीब 25 वर्षों से सापों की दुनिया के करीब रहे हैं उद्धव

1995 में उद्धव ठाकरे पहली बार पुणे के कटराज स्नेक पार्क आए थे और तब से यहां आने का उनका सिलसिला कभी नहीं थमा। अलबत्ता राजनीति में आने के बाद उनकी जिम्मेदारियां अलग हो गईं। उद्धव के शालीन व्यक्तित्व के बारे में खैरे बताते हैं कि जब पहली बार उद्धव उनके पार्क में आए थे तो बुधवार होने की वजह से पार्क बंद था। उस समय प्रदेश में शिवसेना की सरकार थी। उद्धव के साथ आए शिवसैनिकों ने उनपर पार्क खोलने का दबाव बनाने की कोशिश की। लेकिन, जब वे खुद उद्धव से मिले और बताया कि आज यहां छुट्टी रहती है और सापों की पिट की सफाई की जाती है तो उद्धव यह कहकर अगले दिन आने का बोल कर चले गए कि नियम आखिर नियम होता है। खैरे ने बताया कि , 'मेरे लिए आश्चर्यजनक था कि उन्होंने मेरे स्टैंड की सराहना की और अपने लोगों से चलने के लिए कहा। वे दूसरे दिन बिना अपने लोगों के साथ आए, लेकिन इसबार उनके साथ उनका छोटा बेटा तेजस था। ' उन्होंने बताया कि उस दिन उद्धव ने पूरा दिन उन्हीं के पार्क में बिताया और सापों की विभिन्न प्रजातियों के बारे में जानकारियां जुटाईं।

उद्धव ने स्नेक पार्क की भरपूर मदद भी की

उद्धव ने स्नेक पार्क की भरपूर मदद भी की

उन्होंने बताया कि इसके बाद उद्धव जब भी छुट्टियों में अपनी कुलदेवी की पूजा करने आते या पुणे की तरफ आना होता वे स्नेक पार्क का रुख जरूर करते। गौरतलब है कि ठाकरे परिवार की कुलदेवी का मंदिर लोनावला के पास करला गुफा में स्थित है। खैरे के मुताबिक एकबार पेशवे पार्क (ज़ू) में वो उनके साथ गए। जब वहां उन्होंने उद्धव को फोटोग्राफी करते देखा तो उन्होंने सांपों और बाकी जानवरों की प्रजातियों पर दस्तावेज तैयार करने के लिए एक अच्छे फोटोग्राफर की जरूरत के बारे में उन्हें बताया। तब उन्होंने बिना क्रेडिट की चिंता किए खुद ही दस्तावेज तैयार करने में उनकी बहुत ज्यादा मदद की। उन्होंने बताया कि मजे की बात है कि उद्धव पार्क और ज़ू के लिए जो जरूरी दस्तावेज तैयार करने में मदद कर रहे थे, वह राज्य सरकार के नियंत्रण में थे और तब महाराष्ट्र में शिवसेना की ही सरकार थी।

तेजस ने 'बोइगा ठाकरेई' नाम की प्रजाति खोजी

जब 2005 में उद्धव राजनीति में ज्यादा सक्रिय हो गए तो उनके छोटे बेटे तेजस ठाकरे ने सांपों के प्रति परिवार की जिज्ञासा और प्रेम को आगे बढ़ाने का काम जारी रखा। उन्होंने परिवार और एनिमल लाइफ से जुड़े लोगों के लिए एक बहुत बड़ा योगदान भी देकर दिखाया है। उन्होंने सांप की एक नई प्रजाति का पता लगाया है, जिसका वैज्ञानिक नाम इसी साल ठाकरे के नाम पर ही 'बोइगा ठाकरेई' रखा गया है। पश्चिम घाट स्थित महाराष्ट्र के सहयाद्रि टाइगर रिजर्व में उन्होंने ही बाघों की धारी वाली इस कैट स्नेक का पता लगाया है। इसे लोग 'ठाकरे कैट स्न्नेक' के नाम से भी बुला रहे हैं, क्योंकि इसपर टाइगर जैसी धारियां हैं, जो शिवसेना के 'लोगो' से मिलती-जुलती है। तेजस का यह रिसर्च बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के जर्नल में भी प्रकाशित हुआ है।

जब हाथ में जहरीले सांप को पकड़ लाए थे बाल ठाकरे

जब हाथ में जहरीले सांप को पकड़ लाए थे बाल ठाकरे

ठाकरे परिवार का सांपों के प्रति लगाव का पहला संकेत 1970 में मिला। तब बाल ठाकरे माथेरान दौरे पर गए थे। उस समय नीलिमकुमार खैरे वहां के एक होटल में अधिकारी थे, लेकिन इलाके में वाइल्डलाइफ के लिए काम करने वाले ऐक्टिविस्ट के तौर भी उनकी पहचान थी। अचानक उन्होंने देखा के हाथ में एक सांप पकड़े बालासाहेब उन्हें खोजते हुए पहुंच गए। उन्हें वह सांप मॉर्निंग वॉक के वक्त पनोरमा प्वाइंट पर मिला था। खैरे ने उस दिन की घटना को याद करके बताया कि, 'जब वे नजदीक पहुंचे तो देखा कि लोग वहां इकट्ठा होकर सांप को पत्थरों से मारने ही वाले थे। उन्होंने सांप को पकड़ कर उसे बचा लिया और मेरे पास ले आए। जब मैंने उनसे कहा कि यह तो बहुत ही जहरीला सॉ-स्केल्ड वाइपर है तो वह हंस पड़े। ऐसे ही थे बालासाहेब। एक रिस्क-टेकर।'

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