वो मंदिर जहां माहवारी के दौरान महिलाएं पूजा करती हैं
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपने एक फ़ैसले में सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला जाने की इजाज़त दी है.
लेकिन अब फ़ैसले का विरोध हो रहा है और मंदिर के आसपास लोग इसके ख़िलाफ़ धरने पर बैठे हैं.
शुक्रवार को भारी पुलिस सुरक्षा के बीच दो महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की, लेकिन भक्तों के भारी विरोध प्रदर्शन के कारण उन्हें मंदिर परिसर के पास से ही बिना दर्शन किए लौटना पड़ा.
मंदिर में पहले 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी जिसे सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई थी.
सबरीमला पर विवाद दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है. हालांकि एक ऐसा भी मंदिर है जहां माहवारी के दौरान महिलाओं को प्रवेश की इजाज़त होती है और उनके साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता है.
तमिलनाडु के आदि पराशक्ति मंदिर में महिलाएं बिना रोक-टोक पवित्र स्थान तक जा सकती हैं और उन्हें यह इजाज़त कई दशकों से है.
मंदिर महिलाओं की माहवारी को अपवित्र नहीं मानता है और इसे एक सामान्य शारीरिक बदलाव समझता है.
स्थापना और लोकप्रियता
दक्षिण भारत में अधिकांश मंदिरों के विपरीत इस मंदिर में कोई पुजारी नहीं होता है.
मंदिर के जनसंपर्क अधिकारी रविचंद्रन कहते हैं, "इस मंदिर में पुरुषों की तरह महिलाएं मंदिर के पवित्र गर्भ तक जा सकती हैं और ख़ुद पूजा कर सकती हैं. यहां जाति-धर्म, लिंग और उम्र का कोई बंधन नहीं है."
कुछ दशक पहले चेन्नई-विल्लुपुरम नेशनल हाइवे पर बसे मरुवथूर गांव में एक स्कूल के शिक्षक बंगारू ने दावा किया था कि उन्होंने एक नीम के पेड़ से दूध निकलते हुए देखा था.
उनके इस दावे के कुछ दिनों बाद तेज़ आंधी में वो पेड़ गिर गया और बंगारू ने फिर से दावा किया कि स्वयंभू लिंग वहां अवरतित हुआ है.
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इसके बाद वो ख़ुद को 'शक्ति' कहने लगे और उस पेड़ वाले स्थान पर आदि पराशक्ति मंदिर का निर्माण किया.
मंदिर में आदि पराशक्ति की मूर्ति स्थापित की गई है. वो लोगों को बाद में उपदेश भी देने लगे.
धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई और तमिलनाडु और आसपास के राज्य आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से हज़ारों भक्त उन्हें सुनने आने लगे.
मंदिर का दायरा बढ़ता चला गया और कई सामाजिक और शैक्षणिक संस्थान मंदिर के नाम पर खोले गए. मंदिर के ट्रस्ट ने गांव में एक मेडिकल कॉलेज भी खोला है, जहां दूर-दूर से बच्चे पढ़ने आते हैं.
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प्रमुख पदों पर महिलाएं
मंदिर से जुड़े ट्रस्ट पूरे राज्य और आसपास के राज्यों में चलाए जाते हैं और इनके अधिकतर प्रमुख पदों पर महिलाएं हैं.
रविचंद्रन दावा करते हैं, "बंगारू ने स्वयंभू लिंगम की खोज 1966 में की थी और अब इससे जुड़ी क़रीब पांच हज़ार प्रार्थना संस्थाएं हैं. इनमें से कुछ तो विदेशों में हैं."
हालांकि मंदिर से संबद्ध संस्थाओं से कई विवाद भी जुड़े हैं.
क़रीब 30 सालों तक मंदिर में पूजा करने वाली मीना कुमारी कनकराज उस पल को याद करती हैं जब उन्होंने पहली बार मंदिर में प्रवेश किया था.
वो बताती हैं, "उस अनुभव को मैं शब्दों में नहीं बता सकती. जब मुझे मंदिर के गर्भ में जाने की इजाज़त मिली और मुझे ख़ुद पूजा करने को कहा गया, उस समय मेरी खुशी सातवें आसमान पर थी. मंदिर में श्रद्धालुओं ने कहा कि यहां माहवारी को अपवित्र नहीं माना जाता है. उन्होंने मुझसे यह कहा कि मंदिर को अपने घर की तरह समझो. मैंने उसी तरह का अनुभव किया. मंदिर के अंदर समानता के बारे में बहुत कुछ लिखा हुआ था."
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सभी जाति के लोग आते हैं
वो दावा करती हैं कि यह समानता न सिर्फ़ लिंग के आधार पर है बल्कि जाति के आधार पर भी यहां कोई भेदभाव नहीं होता है.
"हमारी प्रार्थना सभाओं के सदस्य हम जैसे प्रोफ़ेसर तो हैं ही, मैला ढोने और कपड़े धोने वाली महिलाएं भी हैं. वो सभी मंदिर के पवित्र स्थान तक जा सकती हैं और पूजा कर सकती हैं. वहां आपकी जाति नहीं पूछी जाती है. सभी को वहां "शक्ति" कह कर पुकारा जाता है. महिलाओं की माहवारी को भी अपवित्र नहीं समझा जाता है."
वरिष्ठ लेखक इरा मुरुग्वल ने बीबीसी से कहा, "कबायली समाज में महिलाओं की माहवारी को अच्छा माना जाता है. यह समझा जाता है कि ये पीढ़ियों को आगे बढ़ाने का प्रतीक है."
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