वो मुसलमान जिसने दिल्ली में गाय की क़ुर्बानी बंद करवाई

गाय
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पूरी दुनिया में इस्लाम धर्म के अनुयायी बकरीद मना रहे हैं जिसे ईद-उल-अज़हा भी कहा जाता है. इस दौरान ही मक्का में हज यात्रा की जाती है जहां पर अब्राहम ने चार हज़ार साल और उससे भी पहले अपने पवित्र काले पत्थर के साथ अल्लाह का घर बनाया.

किसी वजह से यहूदी और ईसाई धर्म को मानने वाले इब्राहिम (अब्राहम) के बलिदान को ईद की तरह नहीं मनाते हैं. केवल इस्लाम ने ही इसको अपनाया है जबकि इस्लाम ईसा मसीह के जन्म के 600 साल बाद अस्तित्व में आया.

हालांकि, यहूदियों और ईसाइयों ने इब्राहिम को अलग तरह से सम्मान देना जारी रखा. वे उन्हें धर्म में एक पिता का दर्जा देते हैं.

लोग याद करते हैं कि भारत के विभाजन से पहले के दिनों में सभी समृद्ध घरों में बकरीद के मौके पर क़ुर्बानी की जाती थी. केवल ग़रीब लोग पैसा जमा कर मिलकर बकरे या भेड़ की क़ुर्बानी करते थे. हालांकि, उस दौर में बकरियां और भेड़ें इतनी महंगी नहीं होती थी.

यह वह समय था जब बड़े जानवरों की क़ुर्बानी पर प्रतिबंध नहीं था और गाय और भैंसों को भी क़ुर्बानी के लिए चुना जाता था.

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बहादुरशाह ज़फ़र ने लगाया प्रतिबंध

आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र के शासन के अंतिम सालों में उन्होंने अपने पूर्वज अकबर की ही तरह गाय की क़ुर्बानी पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था.

ये संभव है कि गांवों में इस आदेश का उल्लंघन किया गया हो लेकिन 1857 के विद्रोह से पहले के सालों में सांप्रादायिक सौहार्द मजबूत करने के उद्देश्य से शहरी इलाक़ों में इस प्रतिबंध को कड़ाई से लागू किया गया.

बहादुर शाह ज़फ़र ने शायद ऐसी अफ़वाहें सुनी थीं कि 1857 के विद्रोह का तूफ़ान उत्तर भारत में उमड़ने वाला है लेकिन उनकी प्रजा इस बारे में बेहतर ढंग से जानती थी.

जामा मस्ज़िद के संरक्षक मुंशी तुराब अली के मुताबिक़, हाकिम अहसानुल्लाह ख़ान ने बादशाह को ये चेतावनी दी कि माहौल उतना शांत नहीं है जितना महसूस हो रहा है. उनके शब्द शायद "फ़िज़ा खराब है" रहे थे.

लेफ़्टिनेंट विलियम हडसन ने मुग़ल बादशाह के बेटे और पोते की हत्या के बाद उनके रिश्तेदार मौलवी रजब अली को बदनाम किया. उन्होंने दावा किया था कि 21 सितंबर, 1857 को बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की हुमायूं के मकबरे में मौजूदगी के बारे में मौलवी रजब अली से पता चला.

मौलवी और मुंशी के वंशजों ने इन बातों को ख़ारिज. हालांकि, जानवरों की क़ुर्बानी जारी रही.

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जब दिल्ली पर ब्रितानी शासन ने फ़िर कब्जा किया

160 साल पहले बहादुर शाह ज़फ़र को निर्वासन में भेजे जाने के बाद ब्रितानी शासन ने दिल्ली को एक बार फिर अपने नियंत्रण में लिया.

बकरीद के मौके पर उनके जासूसों ने उन्हें बताया कि कई प्रसिद्ध मुस्लिम परिवार शहर से निर्वासित होकर ग्रामीण इलाक़ों में चले गए हैं और वह बेहद ग़ुस्से में हैं.

ब्रितानी शासन के जासूसों ने उन्हें ये भी बताया कि सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए बेहतर है कि केवल भेड़ और बकरे की क़ुर्बानी की अनुमति दी जाए क्योंकि दिल्ली में इसकी प्रतिक्रिया देखी जा सकती है जहां पर काफ़ी संख्या में बड़े हिंदू परिवारों को रहने की अनुमति दी गई थी.

डॉक्टर नारायणी गुप्ता कहती हैं कि ग़ालिब ने इस बात पर रोष जताया था कि 1869 तक दिल्ली में रहने वाले हिंदू 'साहूकार' परिवारों की तुलना में उनके जैसे मुस्लिम व्यापारी परिवारों की संख्या तीन से ज़्यादा नहीं थी.

बकरीद का मौका पहले की तरह जश्न से भरा नहीं होता था. हालांकि, पारसियों और दूसरों की दुकानें काफी समृद्ध हुआ करती थीं.

चांदनी चौक
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चांदनी चौक

तत्कालीन लेखों के मुताबिक़, इस मौके पर त्योहार जैसा माहौल सिर्फ निज़ामुद्दीन, क़ुतुब मीनार और पुराना क़िला जैसे इलाकों तक सीमित था.

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फ़तेहपुरी मस्ज़िद में बकरीद का जश्न

पंजाबी मुस्लिम कटरा इलाके को रेलवे स्टेशन बनाने के लिए ज़मीदोज़ करके वहां के लोगों को किशनगंज में बसाया गया.

हालांकि, जानवरों के खाल और गोश्त की दुकानें अभी भी दिल्ली में केंद्रित थी. ये संभव है कि इसके बाद काफ़ी ज़्यादा मात्रा में जानवरों को मारा गया.

फतेहपुरी मस्जिद
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फतेहपुरी मस्जिद

लाला चुन्नामल सबसे अमीर व्यापारी थे लेकिन उन्होंने अपनी ज़्यादातर धनदौलत कपड़े के काम से हासिल की थी.

विवादित लेखक भोलेनाथ चूंदर ने कम से कम इस बात को दुनिया में जग जाहिर कर दिया. हालांकि, ये एक तथ्य न होकर सामान्यीकरण जैसा था.

यही वो समय था जब एक पंजाबी मुस्लिम व्यापारी क़ुर्बान अली ने खत्री लाला चुन्ना मल से फ़तेहपुरी मस्ज़िद पर अपना अधिकार छोड़ने की दरख्वास्त की ताकि बक़रीद को एक बार फिर जश्न के साथ मनाया जा सके.

क़ुर्बान अली की इस दरख्वास्त पर चुन्ना मल फ़तेहपुरी मस्ज़िद छोड़ने के लिए तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने क़ुर्बान अली से ये आश्वासन लिया कि मस्ज़िद में गाय नहीं काटी जानी चाहिए. इसके बाद 1877 में एक बार फ़तेहपुरी मस्ज़िद में ईद की नमाज़ पढ़ी गई.

चुन्नामल
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चुन्नामल

हालांकि, क़ुर्बान अली अपने व्यापार में हुए नुकसान और घरवालों के तानों की वजह से जल्दी ही चल बसे. क़ुर्बान अली के बलिदान को लेकर जो जानकारी उपलब्ध है वो ज़्यादातर लोक इतिहास में शामिल है और उसकी पुष्टि करने के लिए किसी तरह के रिकॉर्ड नहीं हैं.

लेकिन दिल्ली के पुराने शाहजहांबाद में पचास साल पहले तक कई लोग ये मानते थे कि उन्होंने अपने नाम को जिया है.

हिंदू-मुस्लिम पक्षों में तनाव

इसके बाद साल 1880 के मध्य में जब हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा की वजह से दोनों पक्षों में मुठभेड़ हुई जिसके बाद किशन दास गुरवाला बाग में आयोजित होने वाले तारवाला ईद मिलन मेले का आयोजन बंद हो गया, लेकिन दोनों पक्षों के बीच शांति स्थापित होने के बाद इस मेले को एक बार फिर शुरू कर दिया गया.

फ़िरोज़शाह कोटला मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए लोग
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फ़िरोज़शाह कोटला मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए लोग

लेकिन इसके चालीस साल बाद 1920 में दोनों पक्षों में एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द संकट में पड़ गया और जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के संस्थापकों में शामिल हाकिम अजमल ख़ान की कोशिशों का भी असर न हुआ.

कुछ लोग सोचते हैं कि 1926 में महान चिकित्सक हाकिम अजमल ख़ान की मौत की वजह भी यही रही कि उनके क़द को बड़ा नुकसान हुआ जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर सके.

बकरीद और ईद-उल-अज़हा से जुड़ी एक और चीज़ ये है कि औरंगजेब के दौर में ऊंचे स्थान पर बनी ईदगाह के आसपास सबसे ज़्यादा क़ुर्बानियां दी गईं.

कुछ लोग आज भी ये कहते हैं कि क़ुर्बान अली की आत्मा सुकून में होगी क्योंकि राजधानी दिल्ली में किसी गाय की क़ुर्बानी नहीं दी जाती है.

बिडंवना ये है कि लाला चुन्ना मल का नाम अभी ज़िंदा है जबकि क़ुर्बान अली का नाम लगभग भुलाया जा चुका है.

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