भाजपा को अब जम्मू का आसरा, पर क्या ये इतना आसान है ?
जम्म कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार से नाता तोड़कर भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर 'मिशन 44 प्लस' को पूरा करने के लिए कमर कस ली है.
साल 2014 में हुए विधान सभा चुनावों में भाजपा 37 में से 25 सीटें जीतकर जम्मू क्षेत्र में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.
पूर्ण बहुमत न मिलने की वजह से उसने कश्मीर संभाग से जीत कर आई पीडीपी के साथ हाथ मिलाया और साझा सरकार का गठन किया था.
साल 2014 में भी पार्टी का लक्ष्य 'मिशन 44 प्लस' था लेकिन पूरी ताकत झोंकने के बाद भी पार्टी का आंकड़ा 25 सीटों तक सिमट कर रह गया था.
'सेमीफाइनल के बाद फाइनल'
अब लगभग 40 महीने गठबंधन सरकार में रहने के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं का मानना है कि अब वो गठबंधन सरकार की बंदिशों से आज़ाद हो गए हैं और नए जोश के साथ जनता के बीच जाने को तयार हैं.
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींदर रैना कहते हैं, "साल 2014 का चुनाव हमारे लिए सेमीफ़ाइनल था. साल 2019 के बाद होने वाला विधानसभा का चुनाव हमारे लिए फाइनल होगा."
दूसरी ओर, जम्मू की जनता के आक्रोश को देखते हुए फिलहाल भाजपा नहीं चाहती कि राज्य की विधानसभा भंग की जाए और लोक सभा चुनाव से पहले प्रदेश में मतदान हो.
पार्टी की राज्य इकाई के प्रवक्ता अनिल गुप्ता का कहना है कि अभी इस विधानसभा का दो साल से ज़्यादा कार्यकाल बाकी है. गठबंधन सरकार के समय जम्मू संभाग के साथ जो भेदभाव हुआ था, हम उसे खत्म करना चाहते हैं.
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'सुपर स्टेट' बनाने का वादा
राज्य के हालात को देखते हुए फिलहाल केंद्र सरकार चाहती है कि कम से कम लोक सभा चुनावों तक प्रदेश में राज्यपाल शासन कायम रहे और पार्टी के विधायकों को अपने इलाकों में काम करने का मौका मिले.
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती जम्मू में अपने जनाधार को बचाकर रखना है.
पीडीपी के साथ गंठबंधन सरकार में शामिल होने से पहले भाजपा ने जनता से विकास के नाम पर बड़े-बड़े वादे किए थे.
नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान प्रदेश को 'सुपर स्टेट' बनाने का वादा किया था.
लेकिन तीन साल से ज़्यादा समय गुजर जाने के बावजूद भाजपा अपने डेवलपमेंट एजेंडा को पूरी तरह से अमली जामा पहनाने में कामयाब नहीं हो पाई.
पार्टी के नेता ये अच्छी तरह समझते हैं कि उन्होंने लोगों से जो वादे किए थे, उन पर पूरी तरह खरे नहीं उतरे हैं.
सियासी नफ़ा-नुकसान
जबसे भाजपा गठबंधन सरकार से बाहर निकली है, तभी से चर्चा इस बात पर भी होने लगी है कि इस फैसले का राजनीतिक फायदा आखिर किसे मिलेगा और कैसे.
जानकारों का मानना है कि भाजपा ने मजबूर होकर ये फैसला लिया है और इसके पीछे पूरे देश में घट रहा जानाधर इसकी बड़ी वजह है.
जम्मू यूनिवर्सिटी में इतिहास के पूर्व प्रोफ़ेसर हरी ओम कहते हैं, "भाजपा कश्मीर मुद्दे को लेकर देश की राजनीति साधना चाहती है और यही वजह है कि 2019 के लोक सभा के चुनाव से पहले वो रियासत में विधानसभा के चुनाव नहीं करवाना चाहती."
प्रोफ़ेसर हरी ओम के मुताबिक़, "भाजपा ने पीडीपी से गठबंधन तोड़ने का फैसला इसलिए किया क्योंकि केंद्र सरकार की कश्मीर नीति पूरी तरह से पिट चुकी थी और भाजपा के खिलाफ देश में माहौल तैयार हो रहा था. पार्टी नहीं चाहती थी कि कश्मीर नीति की वजह से उन्हें 2019 के चुनाव में हार का मुंह देखना पड़े."
लंबे समय तक जम्मू कश्मीर में राष्ट्रीय दैनिक ट्रिब्यून के ब्यूरो चीफ़ रहे एसपी शर्मा की राय में, "तीन साल पहले गठबंधन सरकार में शामिल होने से पहले भाजपा ने जम्मू की जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाए थे. जम्मू क्षेत्र के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने का वादा किया था."
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एसपी शर्मा कहते हैं, "नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले चुनाव प्रचार के समय जम्मू में 'ललकार' रैली में अनुच्छेद 370 पर जोरदार तरीके से अपनी बात रखी थी. उन्होंने कहा था कि इस बात पर बहस होनी चाहिए थी कि आखिर इसकी वजह से रियासत में आम आदमी को नुक़सान हुआ है या फायदा."
क्या सरकार से बाहर आने के बाद भाजपा को कोई राजनीतिक फ़ायदा होगा?
इस सवाल के जवाब में एसपी शर्मा कहते हैं, "जो नुक़सान होना था वो तो हो चुका है, अब आने वाला समय ही तय करेगा आखिर भाजपा को इसका कोई राजनीतिक फ़ायदा मिलेगा या नहीं. भाजपा ने लोगों के दिल की बात जानने में बहुत देर कर दी है."
राज्य की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रख रहे पत्रकार अश्विनी कुमार का मानना है कि जम्मू से असेंबली की 25 सीट जीतने के बाद भी भाजपा जनता के दिलों पर राज नहीं कर पाई.
कठुआ केस की चर्चा करते हुए अश्विनी कुमार का कहना है कि जम्मू की जनता के मन में यह बात घर कर गई है कि एक सोची समझी राजनीति के तहत डोगरा बिरादरी को बदनाम किया गया और भाजपा के मंत्री पहले लंबे समय तक चुप रहे और जब वो जनता के साथ उनके आंदोलन का हिस्सा बने तो पार्टी ने उन्हें कुर्सी से उतार दिया.












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