'धनबल, बाहुबल और राजनीतिक ताकत आजमाता था तेलगी'
भारत के सबसे बड़े फ़र्ज़ी स्टांप पेपर रैकेट के मास्टर माइंड अब्दुल करीम तेलगी ने देश की शासन प्रणाली का मजाक बना दिया था.
तेलगी ने पुलिस कांस्टेबल से लेकर नौकरशाहों और अहम पदों पर बैठे राजनेताओं तक को रिश्वत दी और अपने कारोबार को आगे बढ़ाया.
फ़र्ज़ी स्टांप का ये कारोबार इस पैमाने पर बढ़ा कि देश के करीब 13 राज्यों को नुकसान उठाना पड़ा. इस घोटाले का सबसे विचित्र पहलू ये है कि किसी राज्य की पुलिस या फिर सीबीआई अब तक सरकारी राजस्व को हुए नुकसान का आकलन नहीं कर सकी है.
तेलगी की गुरुवार को बेंगलुरु के एक सरकारी अस्पताल में मौत हो गई. तेलगी के शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था.
स्टांप पेपर घोटाले के दोषी अब्दुल करीम तेलगी की मौत
एक साल तक सरकारी प्रेस से नहीं लिए गए स्टांप पेपर
कर्नाटक पहला राज्य था जिसने फ़र्ज़ी स्टांप मामले में सबसे पहले विशेष जांच दल का गठन किया. जांच दल ने पाया कि कर्नाटक ने एक साल तक सरकारी प्रेस से स्टांप पेपर नहीं लिए और इसकी वजह ये थी कि बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ी स्टांप पेपर उपलब्ध थे.
स्टांप आईटी के नाम से चर्चित विशेष जांच दल के प्रमुख रहे आर श्रीकुमार ने बीबीसी को बताया, "फ़र्ज़ी स्टांप पेपर इस पैमाने पर मौजूद थे कि विभाग ने उस साल सही स्टांप पेपर के लिए आदेश देना ज़रूरी नहीं समझा."
अब्दुल करीम तेलगी के पिता रेलवे में काम करते थे. तेलगी ने कर्नाटक के बेलगावी ज़िले के खानापुर गांव में फल और सब्जियां बेचकर स्नातक तक पढ़ाई की. वो धन कमाने के लिए खाड़ी देशों में गए और 1970 के दशक में मुंबई लौटे. उन्होंने पासपोर्ट के फ़र्ज़ी दस्तावेज तैयार कराने का काम शुरू कर दिया. मुंबई पुलिस ने साल 1991 में उन्हें धोखाधड़ी के मामले में गिरफ़्तार किया था.
मुंबई पुलिस ने सोचा भी नहीं होगा कि तेलगी के जेल जाने के बाद वो एक आपराधिक कारोबार की तरफ मुड़ जाएंगे. जेल में तेलगी के साथ बंद एक कैदी ने उन्हें बताया कि किस तरह हर्षद मेहता के शेयर बाज़ार घोटाले के बाद स्टांप और स्टांप पेपर की भारी कमी है. तेलगी को कथित तौर पर जानकारी मिली कि लोग पुराने शेयर ट्रांसफ़र सर्टिफिकेट से रिवेन्यू स्टांप निकाल रहे हैं और उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं.
स्टैंप पेपर घोटाले में तेलगी को सज़ा
तेलगी ने खरीदी पुरानी और खारिज हो चुकीं 'मशीनें'
जेल से बाहर आने के बाद तेलगी ने देश के अलग-अलग राज्यों में वितरण नेटवर्क तैयार किया. इनमें 176 कार्यालय थे जिन्हें चलाने की जिम्मेदारी बेरोजगार युवाओं को दी गई. तेलगी की छह सौ लोगों की टीम ने देश भर में अलग-अलग तरह के स्टांप पेपर बेचे. इनमें स्टांप पेपर, ज्यूडिशियल कोर्ट फ़ी स्टांप, नॉन ज्यूडिशियल स्टांप और रेवेन्यू स्टांप शामिल थे. ये बैंकों, बीमा कंपनियों और सरकारी कार्यालयों को बेचे गए.
श्रीकुमार बताते हैं कि तेलगी ने नासिक की सरकारी टकसाल से पुरानी और खारिज हो चुकीं 'मशीनें' खरीदें जिससे स्टांप पेपर पर सुरक्षा चिन्ह (सिक्यूरिटी मार्क्स) छापे जा सकें.
श्रीकुमार के मुताबिक, "उन्होंने कभी ये जानकारी नहीं दी कि वो फ़र्जी पेपर कहां छापे गए. किसी जांच एजेंसी को छपाई के स्रोत की जानकारी नहीं हो सकी."
तेलगी के वकील एमटी नानैया कहते हैं कि अपनी नेटवर्किंग क्षमता की वजह से तेलगी इस पैमाने पर आगे बढ़ पाया.
वो कहते हैं, "तेलगी हंसमुख, मृदुभाषी और भद्र थे."
कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक पद से रिटायर हुए श्रीकुमार बताते हैं कि सिस्टम में दाखिल होने के लिए तेलगी के काम करने करने का सीधा तरीका " धनबल, बाहुबल और राजनीतिक ताक़त का इस्तेमाल था. अगर कोई उनकी बात नहीं सुनता था तो वो उस व्यक्ति के ऊपर या नीचे बैठे शख्स के पास जाते, रिश्वत देते और काम करा लेते थे."
साल 2001 में अजमेर में गिरफ़्तारी के बाद पूछताछ के दौरान तेलगी ने श्रीकुमार को बताया, "फ़र्ज़ी स्टांप पेपर आज़ादी के बाद से ही चलन में हैं. मैं महज एक छोटा खिलाड़ी हूं. मुझसे बड़े खिलाड़ी मौजूद हैं. ये पेपर मेरे बाद भी चलन में रहेंगे. आप इसे रोक नहीं सकते."
तेलगी को 13 वर्ष कारावास की सज़ा
पुलिस ने घर पर नहीं की छापे की कार्रवाई
पूछताछ के दौरान तेलगी ने बहुत कम जानकारियां दी. विशेष जांच दल ने उनका नार्को परीक्षण भी कराया लेकिन उन्हें लगा कि तमाम बीमारियों से घिरे होने के बाद भी तेलगी दमदार राजनेताओं, जिनमें से ज्यादातर महाराष्ट्र से थे, के नाम लेने से ज्यादा कुछ नहीं बताएंगे.
लेकिन जांच दल के अधिकारियों के साथ बातचीत में कई और नाम बाहर आए. जहां फ़र्ज़ी स्टांप पेपर रखे जाते थे, उन जगहों की भी जानकारी सामने आईं.
तेलगी ने आपराधिक न्यायिक प्रणाली को इस कदर अनुपयोगी बना दिया था कि देश के किसी हिस्से के किसी पुलिस दस्ते ने उनके घर पर छापे की कार्रवाई नहीं की. विशेष जांच दल के अधिकारियों ने तेलगी के घर की तलाशी ली और उन्हें तेलगी के मेडिकल सर्टिफिकेट समेत कई 'अहम दस्तावेज' मिले.
उस दौरान अधिकारियों ने उनकी पत्नी और बेटी से भी बात की. एक अधिकारी ने उनसे पूछा कि उनकी तेलगी से कब बात हुई थी ? तेलगी की बेटी का जवाब था, "पापा से कल ही बात किए थे."
इस पर विशेष जांच दल चौकन्ना हो गया. कानूनी प्रक्रिया के अनुरुप तेलगी का फोन टैप किया गया.
श्रीकुमार बताते हैं, "लेकिन वो लगातार अपने फोन सेट और सिमकार्ड बदलते रहते थे."
'तेलगी: आपराधिक न्यायिक तंत्र के भ्रष्टाचार का प्रतीक'
बॉम्बे हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई और टेलीफोन टैपिंग से मिली जानकारी का ब्योरा मांगा गया. विशेष जांच दल ने कोर्ट को बताया कि वो सिर्फ जांच अधिकारी को ही इसे सौंपेंगे. ये जानकारी मामले की जांच करने वाली सीबीआई को सौंपी गई. ये जनहित याचिका अन्ना हज़ारे ने दाखिल की थी.
श्रीकुमार कहते हैं, "तेलगी आपराधिक न्यायिक तंत्र के भ्रष्टाचार का प्रतीक है."
नानैया कहते हैं कि हैरानी है कि सीबीआई ने इस मामले की जांच की और कुछ भी नहीं निकला. "इस मामले में कई बड़े लोग बचकर निकल गए."
सिर्फ़ कर्नाटक में ही 33 सौ करोड़ रुपये के फ़र्ज़ी स्टांप पेपर जब्त किए गए. अनुमान है कि अलग-अलग राज्यों ने करीब सात हज़ार करोड़ रुपये के फ़र्जी स्टांप जब्त किए.












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