Telangana Election: तेलंगाना के चुनावी समीकरण में कांग्रेस के मुकाबले कहां है बीजेपी?

तेलंगाना में 30 नवंबर को होने वाले चुनाव से पहले के जो सर्वे आ रहे हैं, उसमें से कुछ में सत्ताधारी भारत राष्ट्र समिति (BRS) और कांग्रेस में कांटे की टक्कर दिखाई गई है। कुछ मामलों में कांग्रेस को बीआरएस से आगे दिखाया गया है। वहीं बीजेपी के लिए यह ओपिनियन पोल के नतीजे मायूसी ही बढ़ाने वाले हैं।

कांग्रेस वहां पिछले दो चुनावों से मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका में रही है। इस बार सत्ताधारी बीआरएस को स्वभाविक तौर पर 9 वर्षों से ज्यादा की एंटी-इंकंबेंसी झेलनी पड़ रही है। लेकिन, सीएम केसीआर सरकार की कई लोकप्रिय योजनाएं हैं, जिसकी जनता तक पहुंच को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

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तेलंगाना का चुनावी 'रण'
लेकिन, हम यहां फिलहाल मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और पिछले वर्षों में सड़कों पर मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका निभाने वाली बीजेपी के समीकरणों पर नजर डालने की कोशिश करते हैं। क्योंकि, अगले साल लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर इन दलों के प्रदर्शन से देश की नई तस्वीर बनने की संभावना है।

ओपिनियन पोल में कांग्रेस के लिए अच्छी खबर
कांग्रेस की बात करें तो इसके पक्ष में हाल में कर्नाटक में मिली बड़ी जीत का उत्साह शामिल है। पार्टी को लगता है कि बीआरएस सरकार के खिलाफ जो 9 वर्षों की एंटी-इंसंबेंसी है और उसने राज्य के मतदाताों को जो 6 चुनावी गारंटियों का वादा दिया है, उससे उसकी जीत तय है। ओपिनियन पोल भी यह दिखा रहा है कि मुकाबला सीधा बीआरएस और कांग्रेस के बीच ही है।

कर्नाटक के नतीजे और चुनावी गारंटी कांग्रेस के पक्ष में
अगर 2014 और 2018 के विधानसभा चुनावों की बात करें तो जहां बीआरएस की सफलता का ग्राफ बहुत ऊंचा गया है, तो कांग्रेस ने भी सीटों और वोट शेयर में बढ़ोतरी दर्ज की है। तेलंगाना कर्नाटक से लगता हुआ राज्य है और यह बात भी उसके पक्ष में जाता है। कर्नाटक में चुनावी गारंटियों ने उसे बड़ी जीत दिलाई है और तेलंगाना में भी उसका प्रभाव पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

तेलंगाना बनाने में रोल की भूमिका भी कांग्रेस के हक में
राज्य में उसका जमीनी संगठन भी है और हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों से पार्टी काफी उत्साहित भी है। पार्टी यह मानकर भी चल रही है कि अलग तेलंगाना बनाने में उसका योगदान है, इसलिए बीआरएस के बाद जनता की सहानुभूति बटोरने की वह पहली हकदार है।

भाजपा को 'साइलेंट' लाभार्थियों पर भरोसा
लेकिन, कांग्रेस की इस मजबूत स्थितियों के बावजूद कुछ अहम बातों को दरकिनार करना बहुत बड़ी भूल साबित हो सकती है। क्योंकि, राज्य में हुए उपचुनावों और हैदराबाद निगम चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस से काफी बेहतर रहा है। कांग्रेस गारंटियों की बात करती है, तो केंद्र सरकार की विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाओं ने उसके पक्ष में लाभार्थियों का एक 'साइलेंट वोट बैंक' तैयार किया है।

आदिवासी वोट बैंक का रुख बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण
इनके अलावा बीजेपी ने राज्य में आदिवासियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण बढ़ाकर 10% करने का वादा किया है। राज्य सरकार के अनुमानित आंकड़ों के हिसाब से प्रदेश में 2011 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जनजातियों की संख्या 9% से ज्यादा है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुलुग में आदिवासियों की देवी के नाम पर देश का पहला केंद्रीय आदिवासी विश्वविद्यालय खोलने की भी घोषणा कर चुके हैं। इन सबके बीच पार्टी देश में पहली आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाने का मुद्दा भी जनता के बीच ले जा रही है।

हैदराबाद निकाय और उपचुनाव भी अहम फैक्टर
यह सच है कि भाजपा का राज्य में जो प्रदर्शन 2014 के चुनावों में रहा था, 2018 में वह और भी खराब हो गया। लेकिन, बाद में उपचुनावों के साथ-साथ हैदराबाद नगर निगम चुनावों में उसने अप्रत्याशित बढ़त दिखाकर राज्य में बदल रहे सियासी समीकरण का संदेश दिया है। 150 सीटों में से सत्ताधारी बीआरएस को 56 सीटें मिली थीं, जबकि बीजेपी अपने दम पर 48 सीटें लाकर भाग्यनगर का भाग्य बदलने की बात करने लगी।

बीजेपी को इस वोटबैंक पर भी टिकी है नजर
यही वजह है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह हाल में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से यह कह चुके हैं कि शहरी सीटों पर खासकर ध्यान दें, उसमें से भी हैदराबाद पर पूरा फोकस रखें। बीजेपी की उम्मीदें इसलिए और बढ़ गई हैं, क्योंकि चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक हैदराबाद शहरी क्षेत्र खासकर पश्चिमी हिस्से में वोटरों की संख्या काफी बढ़ गई है। इसे इस तथ्य के साथ जोड़कर देखना जरूरी है कि शहर में आईटी उद्योग और हाउसिंग प्रोजेक्ट को काफी बढ़ावा मिला है।

इन सबपर सबसे अहम बात ये है कि पार्टी राज्य में विपक्ष की भूमिका में लगातार नजर आई है। इसलिए, ओपिनियन पोल में कांग्रेस को जरूर बढ़त दिख रहा है। लेकिन, तेलंगाना की मौजूदा राजनीति में भाजपा को पूरी तरह से खारिज करना अभी बहुत जल्दबाजी लग रही है। ऊपर से हैदराबाद समेत प्रदेश के बड़े हिस्से का वह मुस्लिम वोट बैंक है, जो यहां के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ डटकर खड़ा रहता है, जिनकी राजनीति कांग्रेस और बीजेपी दोनों के खिलाफ चलती है।

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