तालिबान और कंधार संकट: जब भारत के 178 विमान यात्री 8 दिनों तक फंसे रहे जिंदगी और मौत के बीच
नई दिल्ली, 16 अगस्त। 16 अगस्त को भारत रतन अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि है। प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी जी ने कई कठिन चुनौतियों का सामना किया था। करगिल युद्ध और कंधार विमान अपहरण कांड इनमें प्रमुख हैं। अप्रैल 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट से विश्वास मत हार गयी थी। कांग्रेस नीत गठबंधन वैकल्पिक सरकार नहीं बना सकी। तब लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा हो गयी।

सितम्बर-अक्टूबर 1999 में लोकसभा चुनाव हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक बार फिर एनडीए की सरकार बनी। यह चुनाव करगिल युद्ध के कुछ महीने बाद हुआ था। नयी सरकार के गठन के बाद ही भारत के सामने एक बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ। 24 दिसम्बर 1999 को पाकिस्तान के पांच आतंकवादियों ने भारत के यात्री विमान का अपहरण कर लिया। अपहरणकर्ताओं ने विमान को पांच देशों में घुमाया। आखिरकार कंधार में विमान लैंड हुआ। उस समय अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था। विमान में सवार 178 लोगों की रिहाई के लिए वाजपेयी सरकार ने क्या किया ? तालिबान की कट्टरपंथी सरकार ने क्या भारत का सहयोग किया ? वाजपेयी जी की पुण्यतिथि और तालिबान के अफगानिस्तान में फिर काबिज होने के मौके पर पलटते हैं कंधार कांड के पुराने पन्ने।
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भारतीय विमान का अपहरण
24 दिसम्बर को काठमांडू के त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा से इंडियन एयरलाइंस के विमान आइसी 814 ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी। विमान के भारतीय वायुसीमा में प्रवेश करते ही पाकिस्तान के पिस्तौलधारी आतंकियों ने इसका अपहरण कर लिया। पायलट के रूप में देवीशरण विमान उड़ा रहे थे। पायलट शरण को आतंकियों ने लखनऊ होकर लाहौर चलने का हुक्म सुनाया। विमान में इंधन कम हो गया था। इंधन लेने के लिए विमान को अमृतसर में उतारा गया। लेकिन आतंकियों को कुछ शक हो गया जिसकी वजह से उन्होंने बिना इंधन लिये ही विमान को टेकऑफ करने का आदेश दिया। विमान लाहौर की तरफ चला। बहुत हिल हुज्जत के बाद पाकिस्तानी सरकार ने विमान को ईंधन लेने के लिए लाहौर में लैंड करने की मंजूरी दी। इसके बाद अपहृत विमान को दुबई ले जाया गया। यहां आतंकियों ने 27 यात्रियों को छोड़ा तो जरूर लेकिन तब तक उन्होंने रुपिन कात्याल नामक एक यात्री की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी थी। 25 साल के कात्याल की हाल ही में शादी हुई थी और वे पत्नी के साथ हनीमून मनाने नेपाल गये हुए थे।

लाल कृष्ण आडवाणी की नजर में कंधार संकट
25 दिसम्बर की सुबह अपहृत विमान को कंधार हवाई अड्डे पर उतारा गया। इसके बाद क्या-क्या हुआ इस बात को समझने के लिए कुछ प्रमुख लेखकों के तथ्यों पर गौर करना होगा। जब ये घटना हुई थी उस समय लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे। उन्होंने अपनी किताब- मेरा देश मेरा जीवन- में इस घटना का जिक्र किया है। वे लिखते हैं- अपहरणकर्ताओं के ऊपर कोई दवाब नहीं थी। वे जितने दिन चाहे विमान को अपने कब्जे में रख सकते थे। लेकिन भारत सरकार पर बंधक यात्रियों को छुड़ाने का बहुत अधिक दबाव था। तीन बातें अपहरणकर्तों के पक्ष में थीं। पहला ये कि आतंकी अपने अनुकूल क्षेत्र में थे। (अपहरणकर्ताओं से तालिबान की सहानुभूति थी) तालिबान शासित अफगानिस्तान का भारत से कोई राजनयिक संबंध नहीं था। भारत ने तालिबानी सरकार को मान्यता नहीं दी थी। राजनयिक स्तर पर बिल्कुल संवादहीनता थी। तालिबान सरकार ने विमान अपहरणकर्ताओं पर कोई दबाव बनाने की कोशिश नहीं की।

विपक्षी दलों के रवैये पर सवाल
दूसरी यह कि अगर भारत यात्रियों को छुड़ाने के लिए कोई कमांडो ऑपरेशन करता तो विमान को पाकिस्तान के वायुसीमा से होकर गुजरना पड़ता। पाकिस्तान कभी इसकी मंजूरी नहीं देता। तीसरी और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये थी कि भारत सरकार पर हर तऱफ से यह दबाव डाला जा रहा था कि बंधक यात्रियों को 'किसी भी तरह' छुड़ा लिया जाय। बंधकों के रिश्तेदार प्रधानमंत्री आवास के सामने रोषपूर्ण प्रदर्शन करने लगे। विपक्षी दल उनके रिश्तेदारों की भावना भड़काने लगे। इस राष्ट्रीय संकट के समय सभी दलों को एकजुट रहना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मीडिया में भी इन प्रदर्शनों को प्रमुखता से दिखाया जाता। ऐसा माहौल बना दिया गया कि सैकड़ों भारतीय का जीवन खतरे में है और सरकार कुछ नहीं कर रही। जब कि सरकार इस समस्या के हल के लिए लगातार वार्ता कर रही थी।

क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का गठन
रॉ के पूर्व प्रमुख अमरजीत सिंह दुल्लत ने अपनी किताब (कश्मीर : द वाजपेयी ईयर्स) में कंधार कांड का विस्तार से जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है, इस विमान अपहरणकांड में पाकिस्तानी शासक परवेज मुशर्रफ का हाथ होना तय था। ऐसी घटना बिना आइएसआइ के सहयोग के हो नहीं सकती थी। जब इस घटना की खबर मिली तो कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार (1999) की अध्यक्षता में एक क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप बनाया गया ताकि इस मामले को मॉनिटर किया जा सके। मैं रॉ का प्रमुख था इसलिए इस ग्रुप का हिस्सा था। घटना का विश्लेषण शुरू हुआ। लेकिन यह बातचीत जल्द ही आरोप प्रत्यारोप में बदल गयी। कुछ अफसर यह कहने लगे कि विमान को भारतीय सीमा से बाहर निकलने ही क्यों दिया गया। अपहृत विमान को लाहौर में उतारा गया। सूचना के मुताबिक लाहौर में अपहरणकर्ताओं को हथियारों एक झोला मिला था। जब विमान दुबई में था तब भारत ने कमांडो ऑपेशन की तैयारी शुरू कर दी थी। लेकिन संयुक्त अरब आमिरात की सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई। हमने अमेरिका से भी इस बात की गुजारिश की वह संयुक्त अरब आमिरात दबाव बना कर कमांडो ऑपरेशन के लिए राजी कर ले। लेकिन यह भी नहीं हुआ। कुछ भी हमारे पक्ष नहीं हो रहा था।

कंधार संकट के एक प्रमुख वार्ताकार थे अजीत डोभाल
अमरजीत सिंह दुल्लत लिखते हैं, अपहरणकर्ताओं ने विमान यात्रियों की रिहाई के लिए भारत के सामने मांग रखी। शुरू में उनकी दो शर्तें थीं। भारत के जेल में बंद 34 आतंकियों को जेल से रिहा किया जाए। इसके अलावा 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर का नगद भुगतान किया जाय। इसके बाद अपहरणकर्ताओं के बातचीत के लिए काबिल अफसरों को काबुल भेजा गया। आइबी के निदेशक अजीत डोभाल (पीएम के मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार), नेहचल संधू, रॉ के सीडी सहाय और विदेश मंत्रालय के अधिकारी विवेक काटजू वार्ता के लिए कंधार पहुंचे। कंधार में तालिबान के सैनिकों और टैंकों ने विमान को चारों तरफ से घेरा रखा था। पांच दिनों तक वार्ता चली। भारतीय अधिकारियों ने अपनी सूझबूझ से अपहरणकर्ताओं की मांग को कम से कम कर दिया। नगद पैसे की बात खत्म हो गयी। 35 के बदले सिर्फ तीन आतंकियों की रिहाई पर सहमति बन गयी। मसूद अजहर, उमर सईद शेख और मुश्ताक अहमद जरगर को भारतीय जेलों से रिहा कर विमान से कंधार लाया। इसके बाद अपहरणकर्ताओं ने भारतीय यात्रियों को मुक्त कर दिया। 24 दिसम्बर से शुरू हुआ ये खौफनाक घटनाक्रम 31 दिसम्बर 1999 को खत्म हो गया।












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