सुशांत के परिवार ने धमकियों से परेशान होकर 9 पन्नों की चिट्ठी जारी की, कहा- बेटे की निर्मम हत्या हुई, उसे पागल बताया जा रहा

नई दिल्ली। बॉलीवुड के दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के परिवार ने 9 पन्नों की एक चिट्ठी जारी की है। इसमें कहा गया है कि सुशांत को मानसिक रोगी बताने की कोशिश की जा रही है और रिया चक्रवर्ती के महंगे वकीलों के जरिए मामले को घुमाने की कोशिश हो रही है। सुशांत के परिवार ने ये चिट्ठी शिवसेना के मुखपत्र सामना में उनके परिवार को लेकर लिखी गई विवादित बातों के बाद जारी की है। सामना में शिवसेना नेता संजय राउत ने सुशांत के उनके परिवार के साथ संबंधों को लेकर सवाल उठाए थे। 9 पन्नों की इस चिट्ठी की शुरुआत फिराक जलालपुरी की पंक्तियों से गई है। इसमें लिखा है, 'तू इधर-उधर की ना बात कर, ये बता काफिला क्यों लुटा, मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।'

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    'हंसते-खेलते पांच बच्चे थे'

    'हंसते-खेलते पांच बच्चे थे'

    इसमें लिखा है, 'कुछ साल पहले की ही बात है। ना कोई सुशांत को जानता था, ना उसके परिवार को। आज सुशांत की हत्या को लेकर करोड़ों लोग व्यथित हैं और सुशांत के परिवार पर चौतरफा हमला हो रहा है। टीवी-अखबार पर अपना नाम चमकाने की गरज से कई फर्जी दोस्त-भाई-मामा बन अपनी-अपनी हांक रहे हैं। ऐसे में बताना जरूरी हो गया है कि आखिर 'सुशांत का परिवार' होने का मतलब क्या है? सुशांत के माता-पिता कमाकर खाने वाले लोग थे। उनके हंसते-खेलते पांच बच्चे थे। उनकी परवरिश ठीक हो इसलिए नब्बे के दशक में गांव से शहर आ गए। रोटी कमाने और बच्चों को पढ़ाने में जुट गए। एक आम भारतीय माता-पिता की तरह उन्होंने मुश्किलें खुद झेली। बच्चों को किसी बात की कमी नहीं होने दी।'

    सुशांत और उनकी बहनों के बारे में लिखा

    सुशांत और उनकी बहनों के बारे में लिखा

    इसमें आगे लिखा है, ' हौसले वाले थे सो कभी सपनों पर पहरा नहीं लगाया। कहते थे कि जो कुछ दो हाथ-पैर का आदमी कर सकता है, तुम भी कर सकते हो। पहली बेटी में जादू था। कोई आया और चुपके से उसे परियों के देश ले गया। दूसरी राष्ट्रीय टीम के लिए क्रिकेट खेली। तीसरी ने कानून की पढ़ाई की तो चौथी ने फैशन डिजाइन में डिप्लोमा किया। पांचवा सुशांत था। ऐसा, जिसके लिए सारी माएं मन्नत मांगती हैं। पूरी उम्र, सुशांत के परिवार ने ना कभी किसी से कुछ लिया, ना कभी किसी का अहित किया।'

    'ठगों-बदमाशों-लालचियों का झुंड घेर लेता है'

    'ठगों-बदमाशों-लालचियों का झुंड घेर लेता है'

    सुशांत के परिवार ने 9 पन्नों की इस चिट्ठी में आगे लिखा है, 'सुशांत के परिवार को पहला झटका तब लगा जब मां असमय चल बसी। फैमिली मीटिंग में फैसला हुआ कि कोई ये ना कहे कि मां चली गई और परिवार बिखर गया, सो कुछ बड़ा किया जाए। सुशांत के सिनेमा में हीरो बनने की बात उसी दिन चली। अगले आठ-दस साल में वो हुआ, जो लोग सपनों में देखते हैं। लेकिन अब जो हुआ है वो दुश्मन के साथ भी ना हो। एक नामी आदमी को ठगों-बदमाशों-लालचियों का झुंड घेर लेता है। इलाके के रखवाले को कहा जाता है कि बचाने में मदद करें। अंग्रेजों के वारिस हैं, एक हिंदुस्तानी मरे इन्हें क्या परवाह है?'

    'कहते हैं- तुम्हारा बच्चा पागल था'

    'कहते हैं- तुम्हारा बच्चा पागल था'

    इसमें आगे लिखा है, 'चार महीने बाद सुशांत के परिवार का भय सही साबित होता है। अंग्रेजों के दूसरे वारिस मिलते हैं। दिव्यचक्षु से देखकर बता देते हैं कि ये तो जी ऐसे हुआ है। व्यवहारिक आदमी है। पीड़ित से कुछ मिलता नहीं तो मुलजिम की तरफ हो लेते हैं। अंग्रेजों के एक और बड़े वारिस तो जलियावाला-फेम जनरल डायर को भी मात दे देते हैं। सुशांत के परिवार को कहते हैं कि तुम्हारा बच्चा पागल था, सुसाइड कर गया, होता रहता है, कोई बात नहीं। ऐसा करो कि पांच-दस मोटे-मोटे लालों का नाम लिखवा दो, हम उनका भूत बना देंगे।'

    'शोक मनाने का भी समय नहीं मिलता'

    'शोक मनाने का भी समय नहीं मिलता'

    चिट्ठी में आगे लिखा है, 'सुशांत के परिवार को शोक मनाने का भी समय नहीं मिलता है। हत्यारों को ढूंढने के बजाय रखवाले उसके मृत शरीर की फोटो प्रदर्शनी लगाने लगते हैं। उनकी लापरवाही से सुशांत मरा। इतने से मन नहीं भरा तो उसके मानसिक बीमारी की कहानी चला उसके चरित्र को मारने में जुट जाते हैं। सुशांत के परिवार ने मोटे लालों का नाम नहीं लिया तो क्या हुआ? अंग्रेजों के वारिस हैं, कुछ भी कर सकते हैं सो फैशन परेड में जुट गए। सुशांत के परिवार का सब्र का बांध तब टूटा जब महीना बीतते-बीतते महंगे वकील और नामी पीआर एजेंसी से लैस 'हनी ट्रैप' गैंग डंके की चोट पर वापस लौटता है।'

    'परिवार को धमकी मिल रही'

    'परिवार को धमकी मिल रही'

    इसमें लिखा है, 'सुशांत को लूटने मारने से तसल्ली नहीं हुई सो उसकी स्मृति को भी अपमानित करने लगता है। सवाल सुशांत की निर्मम हत्या का है। सवाल ये भी है कि क्या महंगे वकील कानूनी पेचीदगियों से न्याय की भी हत्या कर देंगे? इससे भी बड़ा सवाल अपने को एलिट समझने वाले, अंग्रेजियत में डूबे, पीड़ितों को हिकारत से देखने वाले नकली रखवालों पर लोग क्यों भरोसा करें? सुशांत के परिवार, जिसमें चार बहनें और एक बूढ़ा बाप है, को सबक सिखाने की धमकी दी जा रही है। एक एक कर सबके चरित्र पर कीचड़ उछाला जा रहा है। सुशांत से उनके संबंधों पर सवाल उठाया जा रहा है।'

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