समलैंगिक विवाह की 20 याचिकाओं पर SC का फैसला सुरक्षित, पढ़ें अब तक क्या हुआ
सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह से जुड़ी याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। लगातार 10 दिन तक चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है।

समलैंगिक विवाह से जुड़ी याचिकाओं पर लगातार 10 दिन की सुनवाई के बाद गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। दरअसल, सभी राज्यों को 18 अप्रैल को पत्र लिखे गए थे। उनमें से आंध्र प्रदेश, यूपी, महाराष्ट्र, मणिपुर, असम, सिक्किम से जवाब मिले। लेकिन, राजस्थान इसमें विरोधी के रुप में पेश हुआ। जबकि सभी राज्यों ने इस मसले पर बहस की बात रखी थी।
दरअसल, समलैंगिक विवाह को वैधानिक मान्यता देने की मांग पिछले कुछ समय से देशभर की कई अदालतों में याचिकाएं दायर की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने 20 याचिकाओं पर 18 अप्रैल को सुनवाई शुरू की। जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति रवींद्र भट, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा शामिल रहे। हालांकि, समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिलेगी या नहीं यह कोर्ट तय करेगा। लेकिन, इस मसले पर कई स्तर पर विरोध सामने आए हैं।
पढ़ें अब तक क्या हुआ
- 10वां दिन यानी 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह से जुड़ी याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा।
- 9वें दिन यानी 10 मई को कोर्ट ने सुनवाई की। जिसमें केंद्र ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिखी और जवाब मांगा। जिसमें 7 राज्यों जवाब आया, जिसमें 6 बहस के पक्ष में थे और एक राज्य राजस्थान विरोध के पक्ष में था।
- 8 वें दिन की सुनवाई 9 मई को हुई। कोर्ट ने कहा कि भारत का संविधान लकीर का फकीर नहीं। संविधान पुरानी परंपराओं को तोड़ता आया है। याद रहे कि संविधान ने जाति व्यवस्था और छुआछूत जैसी चीजों को खत्म किया है।
- 7वें दिन की सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि केंद्र समलैंगिक विवाह की समस्याएं सुलझाने के लिए कमेटी बनाने को तैयार है। यह कमेटी समलैंगिक जोडों की शादी को कानूनी मान्यता देने के मुद्दे में नहीं दाखिल होगी। इसमें सिर्फ समलैंगिक जोडे सिर्फ अपने सुझाव या तर्क पेश कर सकते हैं।
- छठे दिन की सुनवाई 27 अप्रैल को हुई थी। जिसमें कोर्ट ने पूछा था कि समलैंगिक विवाह में सरकार का क्या सोचना है? सरकार कैसे लोगों की सुरक्षा और कल्याण के लिए काम कर रही है?
- 5वें दिन की सुनवाई 26 अप्रैल को हुई। जिसमें केंद्र ने कोर्ट से कहा था कि नई परिभाषा के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। समलैंगिक विवाह को कोर्ट की मान्यता मतलब होगा एक कानून को दोबारा लिखना।
- चौथे दिन की सुनवाई 25 अप्रैल को हुई थी। समलैंगिक विवाह को मान्यता पर केंद्र ने तर्क दिया कि पर्सनल लॉ को छुए बिना विशेष विवाह अधिनियम की अलग व्याख्या करना सुप्रीम कोर्ट के लिए संभव नहीं है।
- तीसरे दिन यानी 20 अप्रैल को सुनवाई के दौरान कोर्ट में समलैंगिक जोड़े के बच्चे को गोद लेने पर बहस हुई। कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक विवाह सिर्फ फिजिकल रिलेशन नहीं, बल्कि भावनात्मक तौर पर स्थिर रिश्ते की तरह देखें।
- दूसरे दिन यानी 19 अप्रैल को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने मांग रखी कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बहस में शामिल किया जाए।
- पहले दिन यानी 18 अप्रैल को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि पर्सनल लॉ के क्षेत्र में जाए बिना 1954 स्पेशल मैरिज एक्ट के जरिए समलैंगिक विवाह को अधिकार दिए जा सकते हैं या नहीं।












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