अविवाहित महिलाओं को भी मिल सकता है गर्भपात का समान अधिकार, SC करेगा MTP कानून की व्याख्या
नई दिल्ली, 7 अगस्त: एक अविवाहित महिला ने 24 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी। जिस पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए अविवाहित महिलाओं के गर्भपात पर सकारात्मक रुख दिखाया। सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा 3 (2) (बी) के लाभ को अविवाहित महिलाओं तक बढ़ाने के तरीकों पर विचार किया, ताकि वे गर्भावस्था की चिकित्सा समाप्ति की भी मांग कर सकें जो 20 हफ्ते की अवधि से अधिक और 24 हफ्ते से कम है। कोर्ट ने ये भी कहा कि भारतीय कानून के तहत गर्भपात के मामले में विवाहित और अविवाहित महिला के बीच भेदभाव करना, जिससे किसी एक भी महिला को गर्भपात की अनुमति नहीं मिलती है यह उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने कहा कि वो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम और संबंधित नियमों की व्याख्या करेगी कि क्या अविवाहित महिलाओं को चिकित्सकीय सलाह पर 24 हफ्ते तक गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में हुई प्रगति को देखते हुए (एमटीपी अधिनियम और नियम) कानून की व्याख्या होनी चाहिए। मौजूदा नियम के मुताबिक विवाहित महिलाओं, विशेष श्रेणियों के लिए गर्भावस्था की समाप्ति की ऊपरी सीमा 24 सप्ताह है। जिसमें बलात्कार पीड़ित और अन्य कमजोर महिलाओं जैसे- विकलांग और नाबालिग शामिल हैं, जबकि अविवाहित महिलाओं के लिए सहमति अवधि 20 हफ्ते है।
पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि वो इस कवायद में अदालत की मदद करें। मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जब कानून के तहत अपवाद प्रदान किए गए हैं, तो अविवाहित महिलाओं को 24 हफ्ते की गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए क्यों शामिल नहीं किया जा सकता है। संसदीय मंशा से लगता है कि 'पति' शब्द को 'साथी' से बदल दिया गया है। यह दर्शाता है कि उन्होंने अविवाहित महिलाओं को भी 24 हफ्ते के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने वालों की श्रेणी में माना है।












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