हिंदू, मुस्लिम, ईसाई महिलाओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कैसे किया UCC का समर्थन? 6 मामले देखिए
यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर इस समय देश में भले ही बड़ी राजनीतिक बस छिड़ी हो, लेकिन कई ऐसे मौके आए हैं, जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने संविधान के आर्टिकल 44 को लागू नहीं कर पाने के लिए सरकारों की खिंचाई की है।
हैरानी की बात ये है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धर्मों के आधार पर पर्सनल लॉ के बहाने आज भी भेदभाव को कानूनी मान्यता मिली हुई है। इसलिए, कभी हिंदू, कभी ईसाई तो कभी मुस्लिम महिलाओं को भेदभाव वाले कानूनों की वजह से उत्पीड़न की पीड़ा भुगतनी पड़ती है।

एक ही देश में इन कानूनी भेदभावों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने कई बार आदेशों और टिप्पणियों के माध्यम से अपना बात रखी है। लेकिन, हैरानी की बात है कि संविधान लागू होने के 73 साल बाद भी सरकारों ने अबतक संविधान निर्माताओं की भावनाओं पर गंभीरता दिखाने की कोशिश नहीं की है।
शाह बानो केस
देश में जब भी यूनिफॉर्म सिविल कोड की चर्चा होती है तो शाह बानो केस को संविधान की भावना का मजाक उड़ाने के लिए सबसे सटीक उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता है। 1985 के मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम केस में एक महिला के अधिकारों को रौंदकर चलाए जा रह पर्सनल लॉ के मुद्दे ने पूरे देश को पहली बार झकझोरने का काम किया था। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि अहमद खान की पहली पत्नी शाह बानो को इद्दत के बाद भी भरण-पोषण का खर्च दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में आर्टिकल 44 को 'मृत पत्र' बनाए रखने पर खेद जाहिर किया गया था। राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, 'देश के नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड सुनिश्चित करना सरकार की ड्यूटी है और निस्संदेह उसके पास इसके लिए विधायी क्षमता है।'
दियेंग्दोह बनाम एसएस चोपड़ा केस
शाह बानो से पहले 1984 में एक ईसाई महिला Jordan Diengdoh का केस सामने आया था। उसने एक सिख पुरुष के साथ भारतीय ईसाई विवाह कानून, 1872 के तहत शादी की थी। बाद में उसने भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 के तहत शादी को रद्द करने की अर्जी दी। लेकिन, इस कानून में इसके प्रावधान की कमी के चलते उसे सिर्फ अलग रहने का आदेश प्राप्त हो सका। इसकी वजह से भी सुप्रीम कोर्ट को यूसीसी की आवश्यकता की ओर ध्यान दिलाना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'वर्तनाम मामला भी ऐसा है, जो यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए तत्काल और निश्चित जरूरत की ओर ध्यान दिलाता है। वर्तमान केस के तथ्यों से यूनिफॉर्म सिविल कोड के बिना पूरी तरह से असंतोषजनक स्थिति उजागर होती है।'
सरला मुद्गल बनाम भारत संघ
एक सामान्य धारणा बनी हुई है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं होने से सिर्फ मुस्लिम महिलाओं को ही भुगतना पड़ रहा है। लेकिन, तथ्य ये है कि कई बार हिंदू महिलाओं को भी इसका गंभीर खामियाजा भुगतना पड़ता है। 1995 में एक हिंदू महिला को इसलिए अपने पति के खिलाफ अदालत जाना पड़ा, क्योंकि उसके पति ने इस्लाम धर्म अपनाकर दूसरी शादी की कोशिश की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि पहले विवाह को खत्म किए बिना दूसरी शादी शून्य मानी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने तब भी कहा कि यूसीसी के अभाव में एक हिंदू पति दूसरी शादी करने के लिए कानूनी शिकंजे से बचने के लिए यह हथकंडा अपना सकता है।
तब सर्वोच्च अदालत ने कहा था, 'आर्टिकल 44 इस अवधारणा पर आधारित है कि सभ्य समाज में धर्म और पर्सनल लॉ के बीच कोई जरूरी संबंध नहीं है। आर्टिकल 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि आर्टिकल 44 धर्म को सामाजिक संबंधों और पर्सनल लॉ से अलग करने की कोशिश करता है। विवाह, उत्तराधिकार और धर्मनिरपेक्ष चरित्र के ऐसे मामलों को आर्टिकल 25, 26 और 27 के तहत मिली गारंटी के भीतर नहीं लाया जा सकता है।'
शबनम हाशमी बनाम भरत संघ
2014 में एक सोशल ऐक्टिविस्ट ने बच्चे को गोद लेने और इसे उसके अधिकार के रूप में सुनिश्चित करने के लिए अदालत का रुख किया था। लेकिन, मुस्लिम पर्सनल लॉ गोद लेने और उस बच्चे को बायोलॉजिकल चाइल्ड की तरह के अधिकार देने की अनुमति नहीं देता। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति एक बच्चे को जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) ऐक्ट,2000 के तहत गोद ले सकता है, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो।
ट्रिपल तलाक केस
2017 में शायरा बानो और अन्य बनाम भारत संघ बनाम अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक या तलाक-ए-बिद्दत की कुप्रथा को समाप्त करने का रास्ता साफ कर दिया। इस मामले में अदालत ने एक बार फिर से देश में आर्टिकल 44 की आवश्यकता की ओर ध्यान दिलाया था।
संविधान का 'मूलभूत ढांचा'
1973 का केसवानंद भारती बनाम केरल राज्य संविधान के 'मूलभूत ढांचा' पर आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से भी मशहूर है। हालांकि, इस केस के माध्यम से विधायिका के अधिकार पर संविधान के 'मूलभूत ढांचे' की प्रमुखता स्थापित कर दी गई थी। लेकिन, इसमें भी संविधान के आर्टिकल 44 का जिक्र आया था।
भारतीय संसदीय और न्यायिक व्यवस्था पर आए इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ' यह वांछनीय ही बना हुआ है, सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पाई है। निश्चित तौर पर, कोई भी अदालत सरकार को यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती, चाहे यह देश की अखंडता और एकता के हित में अनिवार्य रूप से वांछनीय हो।'
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