मेहनती नहीं आलसी और कुंभकर्ण है मोदी सरकार
नई दिल्ली। केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली मोदी सरकार और उनके समर्थकों को भले ही लगता है कि वह कड़ी मेहनत और काफी प्रभावशाली तरीके से काम कर रहे हैं। लेकिन गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की ओर से जो बात कही गई उससे तो सिर्फ सही लगता है कि वह इस सरकार को आलसी मानती है।

सिर्फ इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट को तो यहां तक लगता है कि सरकार कुंभकर्ण है और हर मुद्दे पर सिर्फ सोना ही जानती है। आपको मालूम ही होगा कि कुंभकर्ण रामायण का वह चरित्र है जिसके बारे में माना जाता है कि वह छह माह तक सिर्फ सोता था।
न सिर्फ कुंभकर्ण बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने 19वीं सदी के एक चरित्र रिप वैन विंकल के साथ भी मोदी सरकार की तुलना की है।
क्यों कहा कुंभकर्ण
जस्टिस दीपक मिश्रा और आरएफ नारीमन की बेंच ने केंद्र सरकार की तुलना पर्यावरण और वानिकी मंत्रालय की वजह से इन दोनों चरित्र से की।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक मंत्रालय को दो माह का समय दिए जाने के बावजूद उसने अलकनंदा और भागीरथी नदी पर बन रहे 24 हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स के जैविकीय प्रभाव पर कोई रिपोर्ट अभी तक सुप्रीम कोर्ट को नहीं सौंपी है। कोर्ट की ओर से इन सारे प्रोजेक्ट्स को सिर्फ इस एक रिपोर्ट की वजह से रोक दिया गया है।
बेंच की ओर से कहा गया है,'अब तक रिपोर्ट आ जानी चाहिए। यह केंद्र सरकार की गलती है। आपका रवैया बिल्कुल कुंभकर्ण की तरह है। हम इस बात को अभी तक समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर सरकार की ओर से अभी तक हमारे पास रिपोर्ट क्यों नहीं आई है। आपका इरादा क्या है। हमने आपको बहुत समय दे दिया है। आप बिल्कुल रिप वैन विंकल की तरह हैं।'
कैसे कायम होगा संतुलन
बेंच की ओर से कहा गया है कि सरकार का रवैया बिल्कुल संतुलित होना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक इन नदियों पर बनने वाले या प्रस्तावित हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स के बावजूद मनुष्यों को मछलियों और दूसरे जरूरी प्राणियों के साथ रहना है।
साथ ही हमें बिजली उत्पादन का भी ध्यान रखना होगा। लेकिन सवाल है कि हम इसमें संतुलन कैसे बनाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये से साफ है कि अब पर्यावरण मंत्रालय की ओर से हुई कोई भी लापरवाही वह बर्दाश्त नहीं करेगा।












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