गे सेक्स अपराध या अपराध नहीं, आज सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट आज देश में गे सेक्स पर एक अहम और एतिहासिक फैसला देने वाला है। सुप्रीम कोर्ट आज यह तय करेगा कि देश में गे सेक्स अपराध है या नहीं। एलजीबीटी और गे एक्टिविस्ट की ओर से दायर एक क्यूरेटिव पेटिशन पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा।

एक्टिविस्ट्स की ओर से देश में होमोसेक्सुऐलिटी या समलैंगिकता को अपराध बताने वाले एक फैसले के खिलाफ यह याचिका दायर की गई थी।
चीफ जस्टिस तीरथ एस ठाकुर की बेंच इस याचिका पर सुनवाई करेगी जिसे नाज फाउंडेशन की ओर से दायर किया गया था। नाज फाउंडेशन की ओर से यह याचिका 11 दिसंबर 2013 को दायर की गई थी।
इस याचिका के दायर होने के बाद होमोसेक्सुऐलिटी को आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध घोषित करने वाले फैसले पर रोक लग गई थी।
आपको बता दें कि क्यूरेटिव पेटिशन कोर्ट के सामने किसी भी फैसले के खिलाफ दायर होने वाला आखिरी विकल्प होता है। बहुत ही कम ऐसे मौके होते हैं जब जज इस तरह की याचिकाओं की सुनवाई खुले कोर्ट में करते हैं।
नाज फाउंडेशन का कहना है कि 11 दिसंबर 2013 को आए फैसले में एक गलती है क्योंकि यह एक पुराने कानून के आधार पर दिया गया था।
इस याचिका के मुताबिक 27 मार्च 2012 को इस फैसले को सुरक्षित रख लिया गया और फिर 21 माह बाद फैसला सुनाया गया।
इतने लंबे समय में कई बदलाव आए जिनमें कई कानूनों में हुआ बदलाव भी शामिल था जिन पर फैसला सुनाते समय बेंच ने कोई ध्यान नहीं दिया।
एक्टिविस्ट्स के मुताबिक एलजीबीटी कम्यूनिटी के हजारों सदस्यों को पिछले चार वर्षों में अपनी सेक्सुऐलिटी को स्वीकार करने में कोई भी समस्या नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में दो जुलाई 2009 को आए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए कहा था कि आईपीसी की धारा 377 को असंवैधानिक तौर पर नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। ऐसे में दिल्ली हाई कोर्ट का इस मामले में दिया गया फैसला सही नहीं अस्थिर है।
इसके बाद देश में प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया और इसे देखते हुए उस समय की केंद्र सरकार की ओर से एक रिव्यू पेटिशन सुप्रीम कोर्ट में फाइल की गई थी। इस याचिका में सरकार की ओर से हजारों कार्यकताओं को उनका हक और उन्हें इंसाफ की मांग की गई थी।
एक्टिवस्ट्स का कहना है कि गे सेक्स को अपराध बताकर उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले कहा था कि उसे ऐसी कोई वजह नजर नहीं आती है कि दिसंबर 2013 को जो फैसला दिया गया
है उसमें किसी तरह का कोई हस्तक्षेप किया जाए। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक सुनवाई से जुड़ी याचिका को भी खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट हमेशा इस फैसले से जुड़ी रिव्यू पेटिशंस को खारिज करता आया है ऐसे में आज का दिन न सिर्फ देश बल्कि सुप्रीम कोर्ट के लिए कई मायनों में एतिहासिक साबित हो सकता है अगर फैसला एलजीबीटी कम्यूनिटी के पक्ष में हुआ।












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